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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

४. भार्याधिकारिक अधिकरण १११
परिवार के सभी सदस्यों के साथ प्रीतिपूर्ण व्यवहार करना चाहिये ॥ ३९ ॥
नायकस्यानिवेद्य न कस्मैचिद्दानम् ॥ ४० ॥
पति की अनुमति के बिना किसी को कोई वस्तु न दे ॥ ४० ॥
स्वकर्मसु भृत्यजननियमनमुत्सवेषु चास्य पूजनमित्येकचारिणीवृत्तम् ॥ ४१ ॥
नौकरों को उनके काम में लगाये रहे, और त्यौहार, उत्सव आदि पर उनका सम्मान भी
करे। इस प्रकार एकचारिणीवृत्त पूर्ण हुआ ॥ ४१ ॥
प्रवासे मङ्गलमात्राभरणा देवतोपवासपरा वार्तायां स्थिता गृहानवेक्षेत ॥ ४२ ॥
सात्त्विक जीवनयापन—पति के विदेश जाने पर मात्र माङ्गलिक आभूषण धारण करे,
शेष सभी को उतार दे, देवताओं की पूजा और उपवास में लगी रहे, और पति की शिक्षाओं का
पालन करती हुई घर की व्यवस्था देखे ॥ ४२ ॥
शय्या च गुरुजनमूले। तदभिमता कार्यनिष्पत्तिः। नायकाभिमतानां
चार्थानामर्जने प्रतिसंस्कारे च यत्नः ॥ ४३ ॥
गुरुजनों के समीप शयन—पति के विदेश जाने पर पत्नी को सास-ससुर के समीप ही
सोना चाहिये, उनके सुझाव और परामर्श से ही कार्य करना चाहिये तथा पति के प्रिय पदार्थों को
एकत्र करने एवं उनकी रक्षा करने का प्रयत्न करना चाहिये ॥ ४३ ॥
नित्यनैमित्तकेषु कर्मसूचितो व्ययः। तदारब्धानां च कर्मणां समापने
मतिः ॥ ४४ ॥
अनधिक व्यय—नित्य एवं नैमित्तिक कार्यों में समुचित या पति द्वारा निर्धारित ही व्यय
करे। पति ने जिन कार्यों का समारम्भ किया हो, उन्हें यथासमय पूर्ण करने की निरन्तर चेष्टा
करती रहे ॥ ४४ ॥
ज्ञातिकुलस्थानभिगमनमन्यत्र व्यसनोत्सवाभ्याम्। तत्रापि नायकपरिजना-
धिष्ठिताया नातिकालमवस्थानमपरिवर्तितप्रवासवेषता च ॥ ४५ ॥
अत्यावश्यक होने पर ही बहिर्गमन—अपने माता-पिता के घर भी व्यसन (मृत्यु
आदि) और उत्सव (विवाह आदि) के अतिरिक्त न जाये। वहाँ भी ससुरकुल का एक व्यक्ति
(देवर या ननद) साथ ले जाये और अधिक समय न लगाये तथा उत्सव में भी प्रोषित पतिकाओं
जैसी सरल एवं सात्त्विक वेशभूषा ही धारण करे ॥ ४५ ॥
गुरुजनानुज्ञातानां करणमुपवासानाम्। परिचारकैः शुचिभिराज्ञाधिष्ठि-
तैरनुमतेन क्रयविक्रयकर्मणा सारस्यापूरणं तनूकरणं च शक्त्या व्ययानाम् ॥ ४६ ॥
उपवास एवं अर्थ-व्यवस्था—सास-ससुर की अनुमति से ही व्रतोपवास करें। ईमानदार
और आज्ञाकारी नौकरों के माध्यम से क्रय-विक्रय कर धनाभाव को पूरा करे और व्यय में
यथासम्भव कमी लाये ॥ ४६ ॥
आगते च प्रकृतिस्थाया एव प्रथमतः दर्शनं दैवतपूजनमुपहाराणां
चाहरणमिति प्रवासचर्या ॥ ४७ ॥
प्रोषितपतिका के रूप में ही दर्शन—पति के प्रवास से लौटने पर पहली बार पत्नी

११२ वात्स्यायन-कामसूत्र
प्रोषितपतिका के ही रूप में दिखे; उसकी वापसी पर पत्नी देवपूजन करे और भेंट चढ़ाये। यह
प्रवासचर्या पूर्ण हुई ॥ ४० ॥
भवतश्चात्र श्लोकौ—
तद्वृत्तमनुवर्तेत नायकस्य हितैषिणी।
कुलयोषा पुनर्भूवार् वेश्या वाप्येकचारिणी ॥
धर्ममर्थं तथा कामं लभन्ते स्थानमेव च।
निःसपत्नं च भर्तारं नार्यः सद्वृत्तमाश्रिताः ॥ ४८ ॥
इस विषय में दो आनुवंश्य श्लोक प्राप्त होते हैं—
एकचारिणी भार्या का चाहे वह कुलवधू हो, पुनर्भू हो अथवा वेश्या हो, यह कर्तव्य है कि
वह अपने पति की हितैषिणी बनकर सदाचार का पालन करे। स्त्रियाँ सदाचार पर चलकर ही
धर्म, अर्थ, काम, प्रतिष्ठा और सपत्नी (सौत) विहीन पति प्राप्त करती हैं ॥ ४८ ॥
एकचारिणीवृत्त प्रकरण नामक प्रथम अध्याय सम्पन्न ॥
द्वितीय अध्याय
ज्येष्ठादिवृत्तप्रकरण
जाड्यदौःशील्यदौर्भाग्येभ्यः प्रजानुत्पत्तेराभीक्ष्ण्येन दारिकोत्पत्तेर्नायक-
चापलाद्वा सपत्न्यधिवेदनम् ॥ १ ॥
द्वितीय विवाह का कारण—मूर्खता, चरित्रहीनता, दुर्भाग्य, सन्तानहीनता, बार बार
लड़कियों का उत्पन्न होना या पति की चञ्चलता के कारण पत्नी को सपत्नी की वेदना भोगनी
पड़ती है ॥ १ ॥
तदादित एव भक्तिशीलवैदग्ध्यख्यापनेन परिजिहीर्षेत्। प्रजानुत्पत्तौ च
स्वयमेव सापत्नके चोदयेत् ॥ २ ॥
विदग्ध भार्या का कर्तव्य—भार्या को चाहिये कि वह प्रारम्भ से ही पतिभक्ति,
सच्चरित्रता और विदग्धता का आचरण कर पति को दूसरा विवाह करने का अवसर ही न दे।
यदि सन्तान उत्पन्न न हो, तो स्वयं ही पति को दूसरा विवाह करने के लिये प्रेरित करे ॥ २ ॥
अधिविद्यमाना च यावच्छक्तियोगादात्मनोऽधिकत्वे स्थितिं कारयेत् ॥ ३ ॥
ज्येष्ठा का दायित्व—ज्येष्ठा को चाहिये कि अपने को यथाशक्ति अधिक हो बनाकर रखे
अर्थात् अपनी स्थिति को सुदृढ़ बनाये ॥ ३ ॥
आगतां चैनां भगिनीवदीक्षेत। नायकविदितं च प्रादोषिकं विधिमतीव
यत्नादस्याः कारयेत्। सौभाग्यजं वैकृतमुत्सेकं वास्या नाद्रियेत ॥ ४ ॥
कनिष्ठा के साथ व्यवहार—नवपरिणीता को अपनी बहिन के समान समझे। प्रथम रात्रि

४. भार्याधिकारिक अधिकरण ११३
में सम्भोग के लिये उसका शृङ्गार एवं शयनव्यवस्था इस तरह प्रयत्नपूर्वक करा दे जिससे उन
दोनों को यह पता चले कि यह सम्पादन उसी ने किया है। यदि कनिष्ठा सौभाग्यवश
अनादरपूर्वक बोले या मान दिखाये तो उसे कदापि सहन न करे ॥ ४ ॥
भर्तारि प्रमाद्यन्तीमुपेक्षेत। यत्र मन्येत्तार्थमियं स्वयमपि प्रतिपत्स्यत इति
तत्रैनामादरत एवानुशिष्यात् ॥ ५ ॥
पतिविषयक प्रमाद पर उपेक्षा—यदि कनिष्ठा पतिविषयक कोई प्रमाद करे तो उसकी
उपेक्षा कर दे। यदि यह समझे कि पति को प्राप्त करने के लिये यह स्वयं ही संभल जायेगी तो
उसे आदरपूर्वक स्वयं समझा दे ॥ ५ ॥
नायकसम्भवे च रहसि विशेषानधिकान् दर्शयेत् ॥ ६ ॥
वैशिष्ट्यप्रदर्शन—ऐसे एकान्त में उसे कामकला की शिक्षा दे जहाँ से पति भी सुन
सके ॥ ६ ॥
तदपत्येष्वविशेषः। परिजनवर्गेऽधिकानुकम्पा। मित्रवर्गे प्रीतिः। आत्मज्ञातिषु
नात्यादरः। तज्ज्ञातिषु चातिसम्भ्रमः ॥ ७ ॥
सन्तति, परिजन एवं पुरजनों से प्रेम—कनिष्ठा के बच्चों से अत्यधिक प्रेम करे, उसके
परिजनों (सेवकों) पर अनुग्रह रखे, उसकी सखियों से प्रीति रखे और उसके भाई-भतीजों को
अपनों से अधिक आदर दे ॥ ७ ॥
बह्वीभिस्त्वधिविन्ना अव्यवहितया संसृज्येत् ॥ ८ ॥
कई सपत्नियों में द्वितीय से संसर्ग—यदि कई सपत्नयाँ हों, तो ज्येष्ठा को अपने से
दूसरी के साथ संसर्ग रखना चाहिये ॥ ८ ॥
यां तु नायकोऽधिकां चिकीर्षेत्तां भूतपूर्वसुभगया प्रोत्साह्य कलहयेत् ॥ ९ ॥
कलह की योजना—पति जिस (नवप्रिया) पत्नी को अब सर्वाधिक प्रेम करता हो,
उसके साथ उस (पूर्वप्रिया) पत्नी को भड़काकर लड़वा दे जिसे पति पहले सर्वाधिक प्रेम
करता था ॥ ९ ॥
ततश्चानुकम्पेत ॥ १० ॥
तत्पश्चात् कलह बढ़ाने के लिये नवोढ़ा को आश्वासन दे दे ॥ १० ॥
ताभिरेकत्वेनाधिकां चिकीर्षितां स्वयमविवदमाना दुर्जनीकुर्यात् ॥ ११ ॥
पतिप्रिया की निकृष्टता-सिद्धि—यदि पति किसी पत्नी को अधिक प्रेम और महत्त्व
देना चाहे, तो ज्येष्ठा को चाहिये कि स्वयं विवाद में न पड़ते हुए, उसे अन्य सपत्नियों से लड़ा-
लड़ाकर निकृष्ट (दुष्ट) सिद्ध करा दे ॥ ११ ॥
नायकेन तु कलहितामेनां पक्षपातावलम्बनोपबृंहितामाश्वासयेत् ॥ १२ ॥
कलहकारिणी को आश्वासन—जब पति का नवप्रिया से कलह हो जाये, और वह
पति को रूक्ष वचन कह दे, तो उसे आश्वासन दे दे ॥ १२ ॥
कलहं च वर्धयेत् ॥ १३ ॥
कलहवर्धन—ज्येष्ठा को चाहिये कि सपत्नियों में कलह बढ़ाती रहे ॥ १३ ॥

११४ वात्स्यायन-कामसूत्र
मन्दं वा कलहमुपलभ्य स्वयमेव सन्धुक्षयेत् ॥ १४ ॥
कलह के मन्द पड़ने पर स्वयं भड़का दे ॥ १४ ॥
यदि नायकोऽस्यामद्यापि सानुनय इति मन्येत तदा स्वयमेव सन्धौ प्रयततेति
ज्येष्ठावृत्तम् ॥ १५ ॥
शान्ति-प्रयास—यदि यह समझ ले कि पति अब भी नवप्रिया पर प्रेम रखता है, तो स्वयं
दोनों में मेल कराने का प्रयत्न करे—इस प्रकार ज्येष्ठावृत्त पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥
कनिष्ठा तु मातृवत् सपत्नीं पश्येत् ॥ १६ ॥
कनिष्ठावृत्त-प्रकरण—कनिष्ठा, ज्येष्ठा को माता के समान पूज्य समझे ॥ १६ ॥
ज्ञातिदायमपि तस्या अविदितं नोपयुञ्जीत ॥ १७ ॥
उसकी अनुमति के बिना माता पिता द्वारा दी गयी वस्तु का भी उपभोग न करे ॥ १७ ॥
आत्मवृत्तान् ताँस्तदधिष्ठितान् कुर्यात् ॥ १८ ॥
सब कुछ बता दे—अपनी सद्-असद् सभी बातें ज्येष्ठा को बता दे ॥ १८ ॥
अनुज्ञाता पतिमधिशयीत ॥ १९ ॥
ज्येष्ठा की अनुमति से ही पति के साथ शयन कहे ॥ १९ ॥
न वा तस्या वचनमन्यस्याः कथयेत् ॥ २० ॥
रहस्योद्घाटन न करे—ज्येष्ठा द्वारा कही गयी बातें या उसकी चरित्रविषयक बातें कभी
किसी से न कहे ॥ २० ॥
तदपत्यानि स्वेभ्योऽधिकानि पश्येत् ॥ २१ ॥
सन्तान पर प्राणन्यौछावर—ज्येष्ठा की सन्तान को अपनी सन्तान से अधिक प्रेम
करे ॥ २१ ॥
रहसि पतिमधिकमुपचरेत् ॥ २२ ॥
ऐकान्तिक उपचार—संयोग के समय पति का भरपूर मनोरञ्जन करे ॥ २२ ॥
आत्मनश्च सपत्नीविकारजं दुःखं नाचक्षीत ॥ २३ ॥
सपत्नियों की अनिन्दा—सपत्नियों से मिलने वाले तिरस्कारजन्य दुःख को पति से
कदापि न कहे ॥ २३ ॥
पत्युश्च सविशेषकं गूढं मानं लिप्सेत् ॥ २४ ॥
पति से सम्मान—एकान्त में पति से सर्वाधिक प्रेम और सम्मान पाने का सदैव प्रयास
करे ॥ २४ ॥
अनेन खलु पथ्यदानेन जीवामीति ब्रूयात् ॥ २५ ॥
पति से कहे कि आपका प्रेम और सम्मान ही मेरे जीवन का एकमात्र सहारा है ॥ २५ ॥
तत्तु श्लाघया रागेण वा बहिर्नाचक्षीत ॥ २६ ॥
सम्मान का अकथन—पति से प्राप्त सम्मान को आत्मश्लाघा (आत्मप्रशंसा) या
अनुरागवश भी कभी किसी से न कहे ॥ २६ ॥

४. भार्याधिकारिक अधिकरण ११५
भिन्नरहस्या हि भर्तुरवज्ञां लभते ॥ २७ ॥
सम्मान-कथन में दोष—पति का रहस्य प्रकट करने वाली स्त्रियाँ सदैव पति द्वारा
तिरस्कृत होती है ॥ २७ ॥
ज्येष्ठाभयाच्च निगूढसम्मानार्थिनी स्यादिति गोनर्दीयः ॥ २८ ॥
ज्येष्ठा के भय से पति से प्राप्त प्रेम एवं सम्मान का आनन्द एकान्त में ही लेना चाहिये—
यह इस अधिकरण के व्याख्याता एवं विशेषज्ञ आचार्य गोनर्दीय का मत है ॥ २८ ॥
दुर्भगामनपत्यां च ज्येष्ठामनुकम्पेत नायकेन चानुकम्पयेत् ॥ २९ ॥
निःसन्तान पर अनुकम्पा—यदि ज्येष्ठा दुर्भगा (उपेक्षिता) या सन्तानरहित हो, तो उस
पर सदैव अनुग्रह रखे, और पति से भी अनुग्रह रखने का निवेदन करे ॥ २९ ॥
प्रसह्य त्वेनामेकचारिणीवृत्तमनुतिष्ठेदिति कनिष्ठावृत्तम् ॥ ३० ॥
इस प्रकार कनिष्ठा अपने स्नेहिल व्यवहार से दुर्भगा (उपेक्षिता) का अतिक्रमण कर
एकचारिणी के आचरण का पालन करे। यह कनिष्ठावृत्त पूर्ण हुआ ॥ ३० ॥
विधवा त्विन्द्रियदौर्बल्यादातुरा भोगिनं गुणसम्पन्नं च या पुनर्विन्देत् सा
पुनर्भूः ॥ ३१ ॥
पुनर्भू-वृत्तप्रकरण—अपनी कामवासनाओं को नियन्त्रित न रख पाने वाली विधवा,
जब कामपीड़ित होकर गुणसम्पन्न एवं भोगी व्यक्ति को पतिरूप में प्राप्त कर ले तो उसे पुनर्भू
कहा जाता है ॥ ३१ ॥
यतस्तु स्वेच्छया पुनरपि निष्क्रमणं निर्गुणोऽयमिति तदान्यं काङ्क्षेदिति
बाभ्रवीयाः ॥ ३२ ॥
पुनर्भू के गृहत्याग की रीति—पुनर्भू स्वेच्छा से वर्तमान पति का घर छोड़कर अन्य के
घर बैठना चाहे, तो 'यह गुणविहीन है' ऐसा कहकर दूसरे को पतिरूप में स्वीकारे—यह
आचार्य बाभ्रव्य के अनुयायियों (शिष्यों) का मत है ॥ ३२ ॥
सौख्यार्थिनी सा किलान्यं पुनर्विन्देत ॥ ३३ ॥
यदि अधिक इन्द्रिय-सुख चाहे, तो उसे भी छोड़कर अन्य पुरुष को प्राप्त कर ले ॥ ३३ ॥
गुणेषु सोपभोगेषु सुखसाकल्यं तस्मात्ततो विशेष इति गोनर्दीयः ॥ ३४ ॥
यदि पुनर्भू छोड़े गये दूसरे और तीसरे नायक से चौथे नायक में समस्त भोगों की सुलभता
देखे, तो चौथे स्थान पर भी जा सकती है—यह आचार्य गोनर्दीय का अभिमत है, लेकिन इससे
आगे उसे नहीं बढ़ना चाहिये ॥ ३४ ॥
आत्मनश्चित्तानुकूल्यादिति वात्स्यायनः ॥ ३५ ॥
वात्स्यायन की व्यवस्था—जो भी पुरुष अपनी चित्तवृत्ति के अनुकूल हो, वहीं पुनर्भू
को बैठ जाना चाहिये—यह महर्षि वात्स्यायन की व्यवस्था है ॥ ३५ ॥
सा बान्धवैर्नायकादापानकोद्यानश्रद्धादानमित्रपूजनादिव्ययसहिष्णु कर्म
लिप्सेत ॥ ३६ ॥
उत्तम पुनर्भू की इच्छा—उत्तम प्रकृति की पुनर्भू अपने नायक या बान्धवों की परिचर्या

११६ वात्स्यायन-कामसूत्र
करके इतना धन अवश्य चाहे जिससे मद्यपान, विहार, दान-दक्षिणा और मित्रों के स्वागत-
सत्कार आदि का कार्य चल सके ॥ ३६ ॥
आत्मनः सारेण वालङ्कारं तदीयमात्मीयं वा बिभृयात् ॥ ३७ ॥
मध्यम और अधम पुनर्भू की इच्छा—मध्यम और अधम प्रकृति की पुनर्भू मद्यपान
आदि का खर्च अपने निजी धन से चलाये और अपने ही आभूषण धारण करे। यदि अपने
आभूषण न हों तो नायक द्वारा दिये गये आभूषण ही पहने ॥ ३७ ॥
प्रीतिदायेष्वनियमः ॥ ३८ ॥
नायक द्वारा प्रेमपूर्वक जो उपहार दिया है, उसके विषय में कोई निश्चित नियम
नहीं है ॥ ३८ ॥
स्वेच्छया च गृहान्निर्गच्छन्ती प्रीतिदायादन्यन्नायकदत्तं जीयेत। निष्कास्यमाना
तु न किञ्चिद्दद्यात् ॥ ३९ ॥
प्रेमोपहारों के अतिरिक्त सभी सम्पदा पर नायक का अधिकार—यदि पुनर्भू स्वेच्छा
से नायक का घर छोड़कर, अन्य नायक के घर बैठे, तो प्रेमोपहारों के अतिरिक्त नायक द्वारा
प्रदत्त अन्य सभी सुविधाओं और सम्पदाओं को उसे वापस कर दे, और यदि नायक स्वयं घर से
निकाले, तो जो उसके पास है, उसमें से कुछ भी वापस न करे ॥ ३९ ॥
सा प्रभविष्णुरिव तस्य भवनमाप्नुयात् ॥ ४० ॥
स्वामिनीवत् रहे—पुनर्भू जिस नायक के भी घर बैठे, वहाँ स्वामिनी बनकर रहे ॥ ४० ॥
कुलजासु तु प्रीत्या वर्तेत ॥ ४१ ॥
धर्मपत्नी से व्यवहार—नायक की धर्मपत्नियों के साथ प्रीतिपूर्ण व्यवहार रखे ॥ ४१ ॥
दाक्षिण्येन परिजने सर्वत्र सपरिहासा मित्रेषु प्रतिपत्तिः। कलासु कौशल-
मधिकस्य च ज्ञानम् ॥ ४२ ॥
परिजनों एवं मित्रों के साथ व्यवहार—नायक के पारिवारिक सदस्यों के साथ
शालीनता और शिष्टता का व्यवहार करे और मित्रों के साथ हास-परिहासपूर्वक वार्तालाप करे।
कलाओं में कुशलता और अभिज्ञता का परिचय दे ॥ ४२ ॥
कलहस्थानेषु च नायकं स्वयमुपालभेत ॥ ४३ ॥
कलह के स्थान पर केवल उपालम्भ—कलह के कारणों पर नायक को केवल
उपालभ ही दे ॥ ४३ ॥
रहसि च कलया चतुःषष्ट्यानुवर्तेत। सपत्नीनां च स्वयमुपकुर्यात्। तासाम-
पत्येष्व्वाभरणदानम्। तेषु स्वामिवदुपचारः। मण्डनकानि वेषानादरेण कुर्वीत।
परिजने मित्रवर्गे चाधिकं विश्राणनम्। समाजापानकोद्यानयात्राविहारशीलता चेति
पुनर्भूवृत्तम् ॥ ४४ ॥
परामर्श—एकान्त में नायक की इच्छानुरूप चौंसठ कामकलाओं का प्रदर्शन करे।
अपनी सपत्नियों (नायक की धर्मपत्नियों) का स्वेच्छा से उपकार करे। उनके बच्चों को
आभूषण आदि दे। अभिभाविका के समान उनकी सेवा-शुश्रूषा (लालन-पालन) करे। आदर-
सत्कारपूर्वक उन्हें वस्त्राभूषणों से सज्जित करे। नायक के पारिवारिक सदस्यों और मित्रों के

४. भार्याधिकारिक अधिकरण ११७
प्रति उदारता दिखाये। उत्सव, मद्यपान, गोष्ठी और उद्यान-विहार के प्रति अधिकाधिक रुचि
दिखाये। इस प्रकार पुनर्भूवृत्त पूर्ण हुआ॥ ४४॥
दुर्भगा तु सापत्नकपीडिता या तासामधिकमिव पत्यावुपचरेत् तामाश्रयेत्।
प्रकाम्यानि च कलाविज्ञानानि दर्शयेत्। दौर्भाग्याद्रहस्यानामभावः॥ ४५॥
दुर्भगावृत्त—दुर्भगा तो सपत्नियों से पीड़ित होती है, अतः उसे ऐसी सपत्नी का आश्रय
लेना चाहिये जिसे पति अधिक प्रेम एवं सम्मान देता हो। दर्शनीय कलाओं को उसे दिखाये,
क्योंकि वैदग्ध्य ही दुर्भगता की निवृत्ति का कारण है॥ ४५॥
नायकापत्यानां धात्रेयिकानि कुर्यात्॥ ४६॥
सन्तति का लालन-पालन—धाय के समान नायक की सन्तति का लालन-पालन
करे॥ ४६॥
तन्मित्राणि चोपगृह्य तैर्भक्तिमात्मनः प्रकाशयेत्॥ ४७॥
नायक के मित्रों को अनुकूल बनाकर, उनके माध्यम से नायक के प्रति अपनी पतिभक्ति
प्रकटित करे॥ ४७॥
धर्मकृत्येषु च पुरश्चारिणी स्याद् व्रतोपवासयोश्च॥ ४८॥
धार्मिक कृत्यों में पुरश्चारिणी—धार्मिक कार्यकलापों, व्रतोपवासों में सदैव पुरश्चारिणी
रहे॥ ४८॥
परिजने दाक्षिण्यम्। न चाधिकमात्मानं पश्येत्॥ ४९॥
परिजनों से विनम्र एवं शालीन व्यवहार—नायक के पारिवारिक सदस्यों के प्रति
विनम्रता, शिष्टता एवं शालीनता दिखाये और कभी भी अपने को बड़ा न समझे॥ ४९॥
शयने तत्सात्म्येनात्मनोऽनुरागप्रत्यानयनम्॥ ५०॥
प्रेम की पुनः प्राप्ति का प्रयास—नायक के साथ शयन का अवसर मिलने पर, उसकी
प्रकृति के अनुरूप ढलकर अनुराग को पुनः प्राप्त करे॥ ५०॥
न चोपालभेत, वामतां च न दर्शयेत्॥ ५१॥
उपालम्भ और विपरीतता से दूर—न कभी नायक को उपालम्भ दे और न कभी
विपरीतता ही दिखाये॥ ५१॥
यया च कलहितः स्यात् कामं तामावर्तयेत्॥ ५२॥
अनुकूल करने के साधन—नायक जिस पत्नी से लड़ गया हो, उसे अपनी ओर
मिलाने की चेष्टा करे॥ ५२॥
यां च प्रच्छन्नां कामयेत् तामनेन सह सङ्गमयेद् गोपयेच्च॥ ५३॥
नायक जिस तरुणी को मन में चाहता हो, उसे उस प्रिया से मिलवा दे, लेकिन इसे गुप्त
ही रखे, किसी से न कहे॥ ५३॥
यथा च पतिव्रतात्वमशाठ्यं नायको मन्येत तथा प्रतिविदध्यादिति दुर्भगा-
वृत्तम्॥ ५४॥

११८ वात्स्यायन-कामसूत्र
नायक जिस प्रकार भी उसे पतिव्रता एवं विदग्ध समझे, वही करे। दुर्भागावृत्त पूर्ण
हुआ॥ ५४ ॥
अन्तःपुराणां च वृत्तमेतेष्वेव प्रकरणेषु लक्षयेत् ॥ ५५ ॥
अन्तःपुर वृत्त—अन्तःपुर की रानियों के आचरण को भी इसी प्रकरण में देख लें॥ ५५ ॥
माल्यानुलेपनवासांसि चासां कञ्चुकीया महत्तरिका वा राज्ञो
निवेदयेयुर्देवीभिः प्रहितमिति ॥ ५६ ॥
राजा का आचरण—अन्तःपुर की कञ्चुकियों और महत्तरिकाओं को चाहिये कि वे
रानियों के माल्य, अनुलेपन और वस्त्र लेकर राजा से निवेदन करे कि उस रानी ने यह भेजा
है॥ ५६ ॥
तदादाय राजा निर्माल्यमासां प्रतिप्राभृतकं दद्यात् ॥ ५७ ॥
राजा उन वस्तुओं को लेकर, अपनी धारण की गयी वस्तु को उन उन रानियों के पास भेज
दें, जिन्होंने माल्यादि भिजवाये थे॥ ५७ ॥
अलंकृतश्च स्वलंकृतानि चापराह्ने सर्वाण्यन्तःपुराण्यैकध्येन पश्येत् ॥ ५८ ॥
स्वयं सज संवरकर राजा अपराह्नकाल में शृङ्गारित एवं वस्त्राभूषणों से अलंकृत रानियों
का सहसा अवलोकन करे॥ ५८ ॥
तासां यथाकालं यथार्हं च स्थानमानानुवृत्तिः सपरिहासाश्च कथाः
कुर्यात् ॥ ५९ ॥
मिलन की व्यवस्था—राजा अवस्था और योग्यता के अनुरूप उनके साथ मिलन करे,
उनका सम्मान करे और हास-परिहास एवं कथावार्ताएँ भी करे॥ ५९ ॥
तदनन्तरं पुनर्भूवस्तथैव पश्येत् ॥ ६० ॥
तत्पश्चात् पुनर्भू स्त्रियों के साथ भी इसी प्रकार का आचरण करे॥ ६०॥
ततो वेश्या आभ्यन्तरिका नाटकीयाश्च ॥ ६१ ॥
तदनन्तर अन्तपुर में रहने वाली एकनिष्ठ वेश्याओं और रङ्गमञ्च की अभिनेत्रियों का
अवलोकन करे॥ ६१॥
तासां यथोक्तकक्षाणि स्थानानि ॥ ६२ ॥
इनके स्थान भी पूर्वोक्त कक्षाओं में ही होने चाहिये॥ ६२ ॥
वासकपाल्यस्तु यस्या वासको यस्याश्चातीतो यस्याश्च ऋतुस्तत्परिचारिकानु-
गता दिवा शय्योत्थितस्य राज्ञस्ताभ्यां प्रहितमङ्गुलियकाङ्कमनुलेपनमृतुं वासकं च
निवेदयेयुः ॥ ६३ ॥
सम्भोग के लिये निवेदन-व्यवस्था—वासकपाली (अन्तःपुर में राजा के भोगविलास
का प्रबन्ध करने वाली) को चाहिये कि जिस अन्तःपुरिका की सम्भोग की पारी हो, जिसकी
पारी किसी कारणवश निकल गयी हो, और ऋतुमती हुई हो, उन सबकी परिचारिकाओं को
साथ लेकर, दिन में भोजन के पश्चात् राजा के सोकर उठने पर, उन उन रानियों द्वारा भेजी गयी
नामांकित अँगूठी, कुंकुम के अनुलेपन तथा वासक भेंट करें॥ ६३॥

४. भार्याधिकारिक अधिकरण १११
तत्र राजा यद् गृह्णीयात्तस्या वासकमाज्ञापयेत् ॥ ६४ ॥
इनमें से राजा जिसके प्रतीक को स्वीकार कर लें, उसी की परिचारिका को यह सूचना दे
दी जाये कि आज राजा शयनकक्ष में रतिविलास हेतु पधारेंगे ॥ ६४ ॥
उत्सवेषु च सर्वांसामनुरूपेण पूजापानाकं च। सङ्गीतदर्शनेषु च॥ ६५ ॥
उत्सवों में सम्मान—अन्तःपुर में आयोजित होने वाले उत्सवों में, राजा कुल और
अवस्था के अनुरूप सभी का सम्मान करें और मद्यपान की व्यवस्था करें। सङ्गीतगोष्ठियों में भी
यही व्यवस्था होनी चाहिये ॥ ६५ ॥
अन्तःपुरचारिणीनां बहिरनिष्क्रमो बाह्यानां चाप्रवेशः। अन्यत्र विदितशौचा-
भ्यः। अपरिक्लिष्टश्च कर्मयोग इत्यान्तःपुरिकम् ॥ ६६ ॥
आवागमन नियन्त्रित—अन्तःपुरिकाओं को बाहर न निकलने दिया जाये और सन्दिग्ध
चरित्र वाले स्त्री-पुरुषों को अन्तःपुर में प्रवेश न करने दिया जाये। जिनके पवित्र आचरण की
परीक्षा कर ली गयी है, वे भले ही अन्तःपुर में चले जायें। रानियों के साथ राजा पवित्रता और
कलात्मकता से ही सम्भोग करें। इस प्रकार आन्तःपुरिकवृत्त पूर्ण हुआ ॥ ६६ ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
पुरुषस्तु बहून् दारान् समाहृत्य समो भवेत्।
न चावज्ञां चरेदासु व्यलीकान्न सहेत च ॥ ६७ ॥
बहुत पत्नियों के साथ सामान्य व्यवहार—इस विषय में कुछ आनुवंश्य श्लोक उद्धृत
करते हैं—
जो पुरुष कई पत्नियों का स्वामी हो, उसे चाहिये कि सबके साथ समान व्यवहार करे।
न कभी किसी की अवज्ञा करे और न कभी किसी के अपराध को ही सहन करे ॥ ६७ ॥
एकस्यां या रतिक्रीडा वैकृतं वा शरीरजम्।
विस्रम्भाद्वाप्युपालम्भास्तमन्यासु न कीर्तयेत् ॥ ६८ ॥
उसे एक पत्नी के साथ की गयी कलात्मक रतिक्रीड़ा या शरीरजन्य विकारों को, विश्वास
में आकर या उपालम्भ के माध्यम से, अन्य पत्नी से कदापि नहीं कहना चाहिये ॥ ६८ ॥
न दद्यात् प्रसरं स्त्रीणाँ सपत्न्याः कारणे क्वचित्।
तथोपालभमानां च दोषैस्तामेव योजयेत् ॥ ६९ ॥
कलह का अवसर न दे—समुचित कारण होने पर भी सपत्नियों को कलह का अवसर
ही न दे, और जो पत्नी आकर उपालम्भ दे, शिकायत करें, उसी का दोष बताये ॥ ६९ ॥
अन्यां रहसि विस्रम्भैरन्यां प्रत्यक्षपूजनैः।
बहुमानैस्तथा चान्यामित्येवं रञ्जयेत् स्त्रियः ॥ ७० ॥
तदनुरूप व्यवहार—सलज्ज को एकान्त में विश्वास देकर, सपत्नियों में स्थान चाहने
वाली को प्रत्यक्ष सम्मान देकर, मनस्विनी पत्नी को अत्यधिक सम्मान देकर सभी पत्नियों को
अनुरक्त रखे ॥ ७० ॥
उद्यानगमनैर्भोगैर्दानैस्तज्जातिपूजनैः ।
रहस्यैः प्रीतियोगैश्चेत्येकैकामनुरञ्जयेत् ॥ ७१ ॥

१२० वात्स्यायन-कामसूत्र
अनुकूलवृत्ति से प्रसादन—वनविहार (पिकनिक), भोगविलास, वस्त्राभूषणदान, भाई
'भतीजों का स्वागत-सत्कार और ऐकान्तिक प्रेमक्रीड़ा—इनके द्वारा एक एक का स्वतन्त्र
अनुरञ्जन करे ॥ ७१ ॥
युवतिश्च जितक्रोधा यथाशास्त्रप्रवर्तिनी ।
करोति वश्यं भर्तारं सपत्नीश्चाधितिष्ठति ॥ ७२ ॥
अधिकरण के अनुष्ठान का फल—जो युवती अपने क्रोध को नियन्त्रित करके शास्त्र
के अनुसार आचरण करती है, वह अपने पति को वशीभूत करके सभी सपत्नियों में श्रेष्ठ पद प्राप्त
कर लेती है ॥ ७२ ॥
ज्येष्ठादिवृत्तप्रकरण नामक द्वितीय अध्याय सम्पन्न ॥
●
५.
पारदारिक नामक पञ्चम अधिकरण
प्रथम अध्याय
स्त्रीपुरुषशीलावस्थापनप्रकरण
व्याख्यातकारणाः परपरिग्रहोपगमाः ॥ १ ॥
प्रकरणशुद्धि का स्मरण—परकीया के साथ सम्बन्ध स्थापित करने के कारण पहले ही
(नायिकाविमर्श में) दिये जा चुके हैं ॥ १ ॥
तेषु साध्यत्वमनत्ययं गम्यत्वमायतिं वृत्तिं चादित एव परीक्षेत ॥ २ ॥
परकीयागमन से पूर्व विचारणीय बातें—परकीया से सम्बन्ध स्थापित करने से पहले
इन बातों का भलीप्रकार विचार कर लेना चाहिये—अभीष्ट स्त्री मुझे प्राप्त हो सकेगी या नहीं ?
उसे प्राप्त करने में प्राणों का सङ्कट तो उपस्थित नहीं हो जायेगा ? वह गमन के योग्य है या नहीं ?
उससे सम्बन्ध स्थापित हो जाने के पश्चात् मेरा प्रभाव कैसा होगा ? मुझे सम्बन्ध रखने से क्या
लाभ होगा ? ॥ २ ॥
यदा तु स्थानात्स्थानान्तरं कामं प्रतिपद्यमानं पश्येत्तदात्मशरीरोपघातत्राणार्थं
परपरिग्रहानभ्युपगच्छेत् ॥ ३ ॥
प्रमुखतम कारण—जब एक अवस्था से दूसरी अवस्था में बढ़ते हुए काम को देखे,
और यह समझ ले कि इस स्त्री के विना मैं रह नहीं सकता, तो प्राणरक्षा के लिये परकीया के
साथ भी गमन करे ॥ ३ ॥
दश तु कामस्य स्थानानि ॥ ४ ॥
दश कामदशाएँ—व्यवहार के लिये काम की दश दशाएँ हैं ॥ ४ ॥

५. पारदारिक अधिकरण १२१
चक्षुःप्रीतिर्मनःसङ्गः सङ्कल्पोत्पत्तिर्निद्राच्छेदस्तनुता विषयेभ्यो व्यावृति-
र्लज्जाप्रणाश उन्मादो मूर्च्छा मरणमिति तेषां लिङ्गानि ॥ ५ ॥
कामदशाओं का क्रमशः वर्णन—नेत्रों में प्रेम का छलक उठना, चित्त का आसक्त
होना, प्राप्ति का संकल्प उत्पन्न होना, नींद का उड़ जाना, दुर्बल होते जाना, चित्त का विषयों से
हट जाना, लज्जा का नष्ट हो जाना, उन्माद, मूर्च्छा आना और मृत्यु—ये कामदशाओं के
परिचायक हैं ॥ ५ ॥
तत्राकृतितो लक्षणतश्च युवत्याः शीलं सत्यं शौचं साध्यतां चण्डवेगतां च
लक्षयेदित्याचार्याः ॥ ६ ॥
शीलादि की परीक्षा—कामशास्त्र के आचार्यों का मत है कि परकीया से सम्बन्ध
स्थापित करने से पूर्व उसकी आकृति और लक्षणों से युवती के शील, सत्य, शौच, साध्यता और
चण्डवेगता का भलीभाँति परीक्षण कर लेना चाहिये ॥ ६ ॥
व्यभिचारादाकृतिलक्षणयोगानामिङ्गिताकाराभ्यामेव प्रवृत्तिर्बोद्धव्या योषित
इति वात्स्यायनः ॥ ७ ॥
वात्स्यायन का अभिमत—स्त्री के शरीर और उसके विभिन्न अंगों पर जो चिह्नादि देखे
जाते हैं, उनसे स्त्री के शीलादि का पता नहीं चलता, अतएव सङ्केत और चेष्टाओं से ही उसकी
प्रवृत्ति समझनी चाहिये ॥ ७ ॥
यं कञ्चिदुज्ज्वलं पुरुषं दृष्ट्वा स्त्री कामयते। तथा पुरुषोऽपि योषितम्।
अपेक्षया तु न प्रवर्तते इति गोणिकापुत्रः ॥ ८ ॥
गोणिकापुत्र का मत—किसी भी उज्ज्वल वर्ण-वेश वाले पुरुष को देखकर स्त्रियाँ
अनुरक्त हो जाती हैं। इसी प्रकार पुरुष भी उज्ज्वल वर्ण-वेश वाली युवती को देखकर आसक्त
हो जाते हैं, किन्तु कारणवश परस्पर अनुरक्त होते हुए भी एक-दूसरे में प्रवृत्त नहीं हो पाते ॥ ८ ॥
तत्र स्त्रियं प्रति विशेषः ॥ ९ ॥
स्त्री में अनुराग का आधिक्य—यद्यपि स्त्री और पुरुष, दोनों में ही अन्य पर अनुरक्त
होने की भावना मिलती है, किन्तु स्त्रियों में परपुरुष पर आसक्ति अधिक देखी जाती है ॥ ९ ॥
न स्त्री धर्ममधर्मं चापेक्षते कामयत एव। कार्यापेक्षया तु नाभियुङ्क्ते ॥ १० ॥
स्त्री-स्वभाव की विशेषता—स्त्री धर्म-अधर्म की चिन्ता नहीं करती, वह केवल
कामना करती है, किन्तु मिलन में दोष देखकर वह फिर नहीं मिलती ॥ १० ॥
स्वभावाच्च पुरुषेणाभियुज्यमाना चिकीर्षयन्त्यपि व्यावर्तते ॥ ११ ॥
स्वतः हटने की प्रवृत्ति—पुरुष द्वारा मिलन का उपाय करने पर और स्वयं चाहने पर भी
वह स्वतः पीछे हट जाती है ॥ ११ ॥
पुनःपुनरभियुक्ता सिध्यति ॥ १२ ॥
बार-बार प्रयत्न से सिद्धि—पुरुष के बार-बार अभियोग करने पर ही वह उससे
सम्बन्ध स्थापित करती है ॥ १२ ॥
पुरुषस्तु धर्मस्थितिमार्यसमयं चापेक्ष्य कामयमानोऽपि व्यावर्तते ॥ १३ ॥

१२२ वात्स्यायन-कामसूत्र
पुरुष-स्वभाव—पुरुष धार्मिक मर्यादा और शिष्टाचार को देखकर परकीया की कामना
करता हुआ भी पीछे हट जाता है ॥ १३ ॥
तथाबुद्धिश्चाभियुज्यमानोऽपि न सिध्यति ॥ १४ ॥
विचारशील की प्राप्ति असम्भव—धार्मिक मर्यादा और शिष्टाचार का ध्यान रखने वाला
पुरुष परकीया द्वारा अभियोग करने पर भी प्राप्त नहीं हो पाता ॥ १४ ॥
निष्कारणमभियुङ्क्ते। अभियुज्यापि पुनर्नाभियुङ्क्ते। सिद्धायां च माध्यस्थ्यं
गच्छति ॥ १५ ॥
पुरुष-स्वभाव की विचित्रता—पुरुष कभी तो अकारण (बिना काम के) अभियोग
करने लगता है और कभी स्त्री के सिद्ध हो जाने पर भी उससे उदासीन हो जाता है ॥ १५ ॥
सुलभामवमन्यते। दुर्लभामाकाङ्क्षत इति प्रायोवादः ॥ १६ ॥
सुलभ की अवमानना और दुर्लभ की आकांक्षा—प्रायः देखा जाता है कि पुरुष
सहजता से प्राप्त हो जाने वाली स्त्री को महत्त्व नहीं देता और अभियोगों द्वारा कठिनता से मिलने
वाली स्त्री की आकांक्षा करता है ॥ १६ ॥
तत्र व्यावर्तनकारणानि ॥ १७ ॥
व्याववृत्तिकारण—जिन कारणों से स्त्री परपुरुष की कामना करती हुई भी स्वयं पीछे हट
जाती हैं, उन्हें कहते हैं ॥ १७ ॥
पत्यावनुरागः ॥ १८ ॥
पतिविषयक प्रेम—परपुरुष की कामना करती हुई स्त्री, पति के अनुराग का ध्यान कर
पीछे हट जाती है ॥ १८ ॥
अपत्यापेक्षा ॥ १९ ॥
सन्तति की अपेक्षा—बच्चों के प्रति वात्सल्य भी उसे परपुरुष से विरत कर देता
है ॥ १९ ॥
अतिक्रान्तवयस्त्वम् ॥ २० ॥
प्रौढ़ावस्था का ध्यान—यौवन बीत जाने पर वह स्वयं पीछे हट जाती है ॥ २० ॥
दुःखाभिभवः ॥ २१ ॥
शोकाकुलता—शोकाकुल स्त्री भी स्वयं पीछे हट जाती है ॥ २१ ॥
विरहानुपलम्भः ॥ २२ ॥
विरह की असमर्थता—पति के विरह को सहने में असमर्थ स्त्री भी स्वयं पीछे हट
जाती है ॥ २२ ॥
अवज्ञयोपमन्त्रयत इति क्रोधः ॥ २३ ॥
अवज्ञा की शंका—कहीं अनादर के लिये तो नहीं बुला रहा है, इस भय से भी स्वयं
पीछे हट जाती है ॥ २३ ॥
अप्रतर्क्य इति सङ्कल्पवर्जनम् ॥ २४ ॥
अवश्यता का अनुमान—यह पुरुष वश में नहीं आ सकेगा, ऐसा मानकर भी परपुरुष
का सङ्कल्प छोड़ देती है ॥ २४ ॥

५. पारदारिक अधिकरण १२३
गमिष्यतीत्यनायतिरन्यत्र प्रसक्तमतिरिति च ॥ २५ ॥
अनिश्चतता की सम्भावना—यह पुरुष किसी अन्य से प्रेम कर लेगा अथवा किसी
अन्य से भी प्रेम कर रहा है—यह सोचकर भी स्वयं पीछे हट जाती है ॥ २५ ॥
असंवृत्ताकार इत्युद्वेगः ॥ २६ ॥
रहस्योद्घाटन का भय—यह पुरुष मेरा रहस्य प्रकट कर देगा—इस भय से भी स्वयं
पीछे हट जाती है ॥ २६ ॥
मित्रेषु निसृष्टभाव इति तेष्वपेक्षा ॥ २७ ॥
मित्रों का यथोक्तकारी—यह मित्रों से अपनी प्रत्येक बात बता देता है और उनके
परामर्श से ही कार्य करता है—यह जानकर भी स्वयं पीछे हट जाती है ॥ २७ ॥
शुष्काभियोगीत्याशङ्का ॥ २८ ॥
निरर्थक उपायों की आशङ्का—यह मात्र केवल अभियोग करता है—इस आशङ्का से
भी स्वयं पीछे हट जाती है ॥ २८ ॥
तेजस्वीति साध्वसम् ॥ २९ ॥
तेजस्विता का भय—यह तेजस्वी (प्रभावशाली) व्यक्ति है—इस भय से भी स्वयं पीछे
हट जाती है ॥ २९ ॥
चण्डवेगः समर्थो वेति भयं मृग्याः ॥ ३० ॥
प्रचण्ड काम की शङ्का—मृगी (छोटी योनि वाली) स्त्री, पुरुष को चण्डवेग और अश्व
जाति का समझकर भी भयभीत हो उठती है ॥ ३० ॥
नागरकः कलासु विचक्षण इति व्रीडा ॥ ३१ ॥
कलानिष्णात्त से सङ्कोच—यह रसिक है, कलाओं में निष्णात है और मैं अविदग्ध
(ग्रामीण)—इस सङ्कोच से भी स्त्री परपुरुष से विमुख हो जाती है ॥ ३१ ॥
सखित्वेनोपचरित इति च ॥ ३२ ॥
पुरातन मैत्रीभाव—मैंने अब तक इसके साथ मैत्री सम्बन्ध निभाया है—यह भाव भी
स्त्री को परपुरुष में प्रवृत्त होने से रोकता है ॥ ३२ ॥
अदेशकालज्ञ इत्यसूया ॥ ३३ ॥
नायक की विवेकहीनता—यह देश और काल को नहीं समझता—इस घृणा से भी
अपनी इच्छा छोड़ देती है ॥ ३३ ॥
परिभवस्थानमित्यबहुमानः ॥ ३४ ॥
निन्द्य से बचना—यह निन्दा का पात्र है—ऐसा समझकर उसका अनादर कर
देती है ॥ ३४ ॥
आकारितोऽपि नावबुध्यत इत्यवज्ञा ॥ ३५ ॥
अविदग्ध से दूरी—यह पुरुष सङ्केत को नहीं समझता, अतः अविदग्ध (मूर्ख) है—यह
जानकर भी उसकी अवज्ञा कर देती है ॥ ३५ ॥
काम० १० शशो मन्दवेग इति च हस्तिन्याः ॥ ३६ ॥

१२४ वात्स्यायन-कामसूत्र
मन्दकाम की शङ्का—यह शश जाति का और मन्दवेग है, यह समझकर हस्तिनी जाति
की और चण्डवेग स्त्री पीछे हट जाती है॥ ३६॥
मत्तोऽस्य मा भूदनिष्टमित्यनुकम्पा॥ ३७॥
अनिष्ट की आशङ्का—मेरे कारण इसका कुछ अनिष्ट न हो जाये—इस अनुकम्पा से भी
स्त्री विरत हो जाती है॥ ३७॥
आत्मनि दोषदर्शनान्निर्वेदः॥ ३८॥
अपने दोषों पर दृष्टि—अपने में दोष देखकर भी स्त्री परपुरुष से विरक्त हो जाती
है॥ ३८॥
विदिता सती स्वजनबहिष्कृता भविष्यामीति भयम्॥ ३९॥
बहिष्कार का भय—अवैध सम्बन्धों का पता लग जाने पर परिवार द्वारा बहिष्कृत कर
दी जाऊँगी—इस भय से भी स्त्री परपुरुष में प्रवृत्त नहीं होती॥ ३९॥
पलित इत्यनादरः॥ ४०॥
परपुरुष की वृद्धता—परपुरुष को वृद्ध देखकर भी उसका अनादर कर देती है॥ ४०॥
पत्या प्रयुक्तः परीक्षत इति विमर्शः॥ ४१॥
पति द्वारा परीक्षा की शङ्का—कहीं इसे मेरे पति ने ही मेरी परीक्षा के लिये न भेजा
हो—यह सोचकर भी वह परपुरुष से विमुख हो जाती है॥ ४१॥
धर्मापेक्षा चेति॥ ४२॥
धर्म की मर्यादा का ध्यान—धर्म की मर्यादा को समझकर भी स्त्री कुमार्ग से निवृत्त हो
जाती है॥ ४२॥
तेषु यदात्मनि लक्षयेत् तदादित एव परिच्छिन्द्यात्॥ ४३॥
प्रतिकार के उपाय—इनमें से जिन कारणों को पुरुष (उपपति) अपने में देखे, उन्हें
पहले ही दूर कर दे॥ ४३॥
आर्यत्वयुक्तानि रागवर्धनात्॥ ४४॥
श्रेष्ठता को अनुराग से हटाये—श्रेष्ठता (आर्यत्व) से उत्पन्न कारणों को अनुराग
बढ़ाकर हटाये॥ ४४॥
अशक्तिजान्युपायप्रदर्शनात्॥ ४५॥
दोषदर्शन का उपाय—मिलन में जिन दोषों को देखकर स्त्री विमुख हो रही हो, उन
दोषों को दूर करने का उपाय पुरुष उसे बता दे॥ ४५॥
बहुमानकृतान्यतिपरिचयात्॥ ४६॥
बहुमानजन्य कारणों का उपाय—बहुमान से उत्पन्न कारणों को अतिपरिचय से दूर
कर दे॥ ४६॥
परिभवकृतान्यतिशौण्डीर्याद्, वैचक्षणयाच्च॥ ४७॥
परिभवजन्य कारणों का उपाय—परिभव की भावना से उत्पन्न कारणों को व्यवहार-
कुशलता और कामशास्त्र की निपुणता दिखाकर दूर कर दें॥ ४७॥

५. पारदारिक अधिकरण १२५
तत्परिभवजानि प्रणत्या ॥ ४८ ॥
अपने प्रति जो अविश्वास की भावना हो, उसे विनम्रता से दूर कर दे ॥ ४८ ॥
भययुक्तान्याश्वासनादिति ॥ ४९ ॥
भयनिवारण—भय से उत्पन्न कारणों को आश्वासन देकर दूर कर दे ॥ ४९ ॥
पुरुषास्त्वमी प्रायेण सिद्धाः—कामसूत्रज्ञः कथाख्यानकुशलो बाल्यात्प्रभृति
संसृष्टः प्रवृद्धयौवनः क्रीडनकर्मादिनागतविश्वासः प्रेषणस्य कर्तोचितसम्भाषणः
प्रियस्य कर्तान्यस्य भूतपूर्वो दूतो मर्मज्ञ उत्तमया प्रार्थितः सख्या प्रच्छन्नं संसृष्टः
सुभगाभिख्यातः सहसंवृद्धः प्रातिवेश्यः कामशीलस्तथाभूतश्च परिचारको
धात्रेयिकापरिग्रहो नववरकः प्रेक्षोद्यानत्यागशीलो वृष इति सिद्धप्रतापः साहसिकः
शूरो विद्यारूपगुणोपभोगैः पत्युरतिशयिता महार्हवेषोप-चारश्चेति ॥ ५० ॥
स्त्रीसिद्धपुरुष प्रकरण—प्रायः निम्नलिखित पुरुष परकीया को सिद्ध करने में निपुण
होते हैं—कामसूत्र का ज्ञाता, कथा और आख्यान कहने में निपुण, बाल्यकाल का सहचर, भरपूर
यौवन सम्पन्न, खेलने का विश्वासी (खिलाड़ी), यथोक्तकारी (जैसा कहो, वैसा ही मान लेने
वाला), सन्तुलित बोलने वाला, मनोवाञ्छित वस्तु लाकर देने वाला, जो पहले किसी अन्य प्रेमी
का दूत रहा हो, जो किसी सुन्दर स्त्री का प्रेम प्राप्त कर चुका हो, जो सखी से गुप्तरूप से मिल
चुका हो, जो अपनी सुन्दरता के लिये प्रसिद्ध हो, जिसका स्त्री (नायिका) के साथ लालन-
पालन हुआ हो, कामी पड़ौसी, कामी नौकर, धाय की लड़की का पति, नया दामाद, जो
नृत्यनाट्य देखने और वनविहार (पिकनिक) आदि में रुचि रखता हो, त्यागशील (स्त्रियों को
भेंट देने वाला), हृष्टपुष्ट एवं साहसी, शूरवीर, जो विद्या रूप गुण और उपभोगों में स्त्री के पति
से बढ़कर हो, सुन्दर वेश वाला, कामकलाओं में निपुण और मर्मज्ञ हो ॥ ५० ॥
यथात्मानः सिद्धतां पश्येदेवं योषितोऽपि ॥ ५१ ॥
अयत्नसाध्ययोषित्-प्रकरण—जिस प्रकार पुरुष अपने उपायों की सफलता पर विचार
करता है कि मैं सफल हो सकता हूँ या नहीं, उसी प्रकार उसे वांछित स्त्री (परकीया या
नायिका) के विषय में भी विचार करना चाहिये कि यह सिद्ध हो सकती है अथवा नहीं ॥ ५१ ॥
अयत्नसाध्या योषितस्त्विमाः—अभियोगमात्रसाध्याः। द्वारदेशावस्थायिनी।
प्रासादाद्राजमार्गावलोकिनी। तरुणप्रातिवेश्यगृहे गोष्ठीयोजिनी। सततप्रेक्षिणी।
प्रेक्षिता पार्श्वविलोकिनी। निष्कारणं सपत्न्याधिविन्ना। भर्तुर्द्वेषिणी विद्विष्टा च।
परिहारहीना। निरपत्या ॥ ५२ ॥
विना प्रयत्न के सिद्ध होने वाली स्त्रियाँ—ये स्त्रियाँ विना विशेष प्रयत्न के, केवल
साधारण अभियोग से ही सिद्ध हो जाती हैं—सदैव द्वार पर खड़ी रहने वाली, भवन की छत से
सड़क पर सदैव झाँकने वाली, तरुण पड़ोसी से जाकर गप्पें लड़ाने वाली, आने जाने वालों को
निरन्तर देखते रहने वाली, देखे जाने पर तिरछी निगाह से देखने वाली, जिसके पति ने अकारण
दूसरा विवाह कर लिया हो, पति से द्वेष करने वाली, जिसका पति उससे द्वेष रखता हो, जिसे
कोई नियन्त्रित करने वाला न हो और जो सन्तानरहित हो ॥ ५२ ॥

१२६ वात्स्यायन-कामसूत्र
ज्ञातिकुलनित्या। विपन्नापत्या। गोष्ठीयोजिनी। प्रीतियोजिनी। कुशीलव-
भार्या। मृतपतिका बाला। दरिद्रा बहुपभोगा। ज्येष्ठभार्या बहुदेवरका। बहुमानिनी
न्यूनभर्तृका। कौशलाभिमानिनी भर्तृमौर्ख्येणोद्विग्ना। अविशेषतया लोभेन ॥ ५३ ॥
जो सदैव पितृगृह में ही रहती हो, जिसके बच्चे होकर मर जाते हों, जिसे गप्पें मारने में
रुचि हो, जो सबसे मित्रता जोड़ती फिरती हो, नृत्यनाट्य करने वालों की स्त्रियाँ, बालविधवा,
दरिद्र होकर भी भोगविलासों की आकांक्षा रखने वाली, अनेक देवरों वाली, जो अपने रूप गुण
के अभिमान में पति को हीन मानने वाली हो, जो अपने कलाकौशल का अत्यधिक अभिमान
रखती हो और पति की मूर्खता से पीड़ित हो तथा जो पति पर मुग्ध न होकर किसी अन्य को
चाहती हो ॥ ५३ ॥
कन्याकाले यत्नेन वारिता कथञ्चिदलभ्याभियुक्ता च सा तदानीम्। समान-
बुद्धिशीलमेधाप्रतिपत्तिसात्म्या। प्रकृत्या पक्षपातिनी। अनपराधे विमानिता।
तुल्यरूपाभिश्चाधः कृता। प्रोषितपतिकेति। ईर्ष्यालुपूतिचोक्षकलीबदीर्घसूत्रका-
पुरुषकुब्जवामनविरूपमणिकारग्राम्यदुर्गन्धिरोगिवृद्धभार्याश्चेति ॥ ५४ ॥
जिसे मनोवाञ्छित पति न मिला हो, जिसकी बुद्धि शील मेधा और प्रतिपत्ति नायक के
समान हो, जो स्वभावतः पक्षपात रखती हो, जो निरपराध होकर भी अपमानित की गयी हो, जो
समानता रखने वाली सपत्नियों द्वारा अपमानित की गयी हो, जिसका पति विदेश गया हुआ हो,
जिसका पति प्रेम न रखकर ईर्ष्या करता हो, जिसका पति मलिन या निम्न जाति का हो, नपुंसक
हो, आलसी हो, कायर हो, कुबड़ा हो, बौना हो, कुरूप हो, जौहरी हो, गँवार हो, रोगी हो,
दुर्गन्ध वाला हो और बुड्ढा हो—ऐसी स्त्रियाँ प्रायः व्यभिचारिणी बन जाती हैं ॥ ५४ ॥
श्लोकावत्र भवतः—
इच्छा स्वभावतो जाता क्रियया परिवृंहिता।
बुद्ध्या संशोधितोद्वेगा स्थिरा स्यादनपायिनी ॥ ५५ ॥
उपसंहार—इस विषय में दो आनुवंश्य श्लोक उद्धृत करते हैं—
पुरुष सुन्दर स्त्री को चाहता है और स्त्री सुन्दर पुरुष को—यह इच्छा स्वभावतः उत्पन्न
होती है। ये सहज कामनाएँ परिचय और अभियोगों द्वारा बढ़ायी जा सकती हैं और बुद्धि से
उद्वेगों का संशोधन कर इस प्रकार की कामनाएँ स्थायी बनायी जा सकती हैं ॥ ५५ ॥
सिद्धतामात्मनो ज्ञात्वा लिङ्गान्यनुन्नीय योषिताम्।
व्यावत्तिकारणोच्छेदी नरो योषित्सु सिध्यति ॥ ५६ ॥
अपनी सफलता को जानकर, स्त्री के सङ्केतों एवं चेष्टाओं का अनुमान करके,
अतिपरिचय, अनुराग आदि से प्रतिबन्धकों को दूर करके पुरुष परकीया स्त्रियों को सिद्ध करने
में सफल हो जाता है ॥ ५६ ॥
स्त्री-पुरुषशीलावस्थापन प्रकरण नामक प्रथम अध्याय सम्पन्न ॥

५. पारदारिक अधिकरण १२७
द्वितीय अध्याय
परिचयकारणाभियोगप्रकरण
यथा कन्या स्वयमभियोगसाध्या न तथा दूत्या। परस्त्रियस्तु सूक्ष्मभावा
दूतीसाध्या न तथात्मनेत्याचार्याः ॥ १ ॥
जिस प्रकार कन्या स्वयं अपने उपायों से सिद्ध की जा सकती है, उस तरह दूती द्वारा
नहीं। सूक्ष्म भावों से सम्पन्न परकीया जिस प्रकार दूती द्वारा सिद्ध की जा सकती है, उस तरह
अपने उपायों से नहीं—यह कामशास्त्र के आचार्यों का मत है ॥ १ ॥
सर्वत्र शक्तिविषये स्वयं साधनमुपपन्नतरकं दुरुपपादत्वात्तस्य दूतीप्रयोग इति
वात्स्यायनः ॥ २ ॥
यदि सम्भव हो, तो सर्वत्र स्वयं उपाय करना दूती की अपेक्षा श्रेष्ठ है। यदि स्वयं उपाय
करना सम्भव न हो, तो दूती का प्रयोग करना चाहिये—यह आचार्य वात्स्यायन का मत
है ॥ २ ॥
प्रथमसाहसा अनियन्त्रणसम्भाषाश्च स्वयं प्रतार्याः। तद्विपरीताश्च दूत्येति
प्रायोवादः ॥ ३ ॥
जिस स्त्री का चरित्र प्रथम बार खण्डित हुआ हो और जिससे स्वयं बात की जा सकती
हो, उसे स्वयं ही सिद्ध कर लेना चाहिये। इसके विपरीत, यदि नायिका का चरित्र अनेक बार
खण्डित हो चुका हो और उससे वार्तालाप सम्भव न हो, तो उसे दूती के माध्यम से सिद्ध करना
चाहिये ॥ ३ ॥
स्वयमभियोक्ष्यमाणस्त्वादावेव परिचयं कुर्यात् ॥ ४ ॥
यदि नायक स्वयं उपाय करना चाहे, तो पहले नायिका से परिचय करे, सम्बन्ध बढ़ाये।
परिचय का आशय है भली प्रकार दर्शन, भेंट या जान-पहचान। यह स्वयं भी हो सकता है और
दूती के माध्यम से भी ॥ ४ ॥
तस्याः स्वाभाविकं दर्शनं प्रायत्नकं च ॥ ५ ॥
दर्शनभेद—दर्शन दो प्रकार का होता है—स्वाभाविक और प्रायत्निक। जो दर्शन सहज
भाव से हो, वह स्वाभाविक है और जो उपायों द्वारा सम्भव हो, वह प्रायत्निक है ॥ ५ ॥
स्वाभाविकमात्मनो भवनसन्निकर्षे प्रायत्निकं मित्रज्ञातिमहामात्रवैद्यभवन-
सन्निकर्षे विवाहयज्ञोत्सवव्यसनोद्यानगमनादिषु ॥ ६ ॥
अपने भवन के निकट आती-जाती नायिका को देख लेना स्वाभाविक दर्शन है। मित्र,
जाति, महामन्त्री और वैद्य के घर के निकट अथवा विवाह, उत्सव, यज्ञ, दुःख (सङ्कट),
वनविहार (पिकनिक) आदि में देखना प्रायत्निक है ॥ ६ ॥
दर्शने चास्याः सततं साकारं प्रेक्षणं केशसंयमनं नखाच्छुरणमाभरणप्रह्लादन-
मधरौष्ठविमर्दनं तास्ताश्च लीला वयस्यैः सह प्रेक्षमाणायास्तत्सम्बद्धाः परापदे-
शिन्यश्च कथास्त्यागोपभोगप्रकाशनं सख्युरुत्सङ्गनिषण्णस्य साङ्गभङ्गं जृम्भण-

१२८ वात्स्यायन-कामसूत्र
मेकभ्रूक्षेपणं मन्दवाक्यता तद्वाक्यश्रवणं तामुद्दिश्य बालेनान्यजनेन वा सहान्यो-
पदिष्टा द्व्यर्था कथा तस्यां स्वयं मनोरथावेदनमन्यापदेशेन तामेवोद्दिश्य
बालचुम्बनमालिङ्गनं च जिह्वया चास्य ताम्बूलदानं प्रदेशिन्या हनुदेशघट्टनं
तत्तद्यथायोगं यथावकाशं च प्रयोक्तव्यम् ॥ ७ ॥
बाह्य परिचय—नायिका का दर्शन मुख और नेत्रों की भावसूचक चेष्टाओं के साथ ही
करना चाहिये। उसे देखते समय बार बार अपने बालों को ठीक करे या सहलाये, नखों से
खुजाये, आभूषणों को ठीक करे, अपने अधर को मसले और अपने समवयस्क मित्रों के साथ
उसके देखते हुए ही उन उन लीलाओं को करे। अन्य के बहाने उसकी बात करे, अपनी
त्यागशीलता और भोगविलासों को प्रकट करे, मित्र की गोद में लेटकर अँगड़ाई और जम्हाई
लेता हुआ उसकी ओर भौंहें नचाये। धीरे से बोले और उसकी बातें सुनने का प्रयत्न करे। उसको
लक्ष्य करके बालक का चुम्बन और आलिङ्गन करे, बालक को जीभ से पान दे, तर्जनी अंगुलि
से उसके कपोलों को गुदगुदाये। समय और स्थान देखकर इन योगों में जिनका प्रयोग कर सके,
उनका प्रयोग करे ॥ ७ ॥
तस्याश्चाङ्कगतस्य बालस्य लालनं बालक्रीडनकानां चास्य दानं ग्रहणं तेन
सन्निकृष्टत्वात्कथायोजनं तत्संभाषणक्षमेण जनेन च प्रीतिमासाद्य कार्यं तदनुबन्धं च
गमनागमनस्य योजनं संश्रये चास्यास्तामपश्यतो नाम कामसूत्रसङ्कथा ॥ ८ ॥
नायिका की गोद में बैठे बालक को प्यार करे, उसे खेलने के लिये खिलौने दे और फिर
उन्हें ले ले। पास आकर उससे बातें करे। जो व्यक्ति उस नायिका से बातें कर सकता हो, उससे
सम्बन्ध स्थापित कर ले और अपना प्रयोजन सिद्ध करने का प्रयास करे। किसी काम का बहाना
निकालकर नायिका के घर आवागमन प्रारम्भ कर दे। एकान्त में बैठकर कामसूत्र की ऐसी
कथा-वार्ताएँ करे जिन्हें नायिका सुन सके, किन्तु यह न समझ पाये कि यह मुझे देखकर या
लक्ष्य कर ही ये रससिक्त कथा-वार्ताएँ कर रहा है ॥ ८ ॥
प्रसूते तु परिचये तस्या हस्ते न्यासं निक्षेपं च निदध्यात्। तत्प्रतिदिनं प्रतिक्षणं
चैकदेशतो गृह्णीयात्। सौगन्धिकं पूगफलानि च ॥ ९ ॥
आभ्यन्तर परिचय—परिचय बढ़ जाने पर उस नायिका के हाथ में न्यास और निक्षेप
कर दे। तत्पश्चात् प्रतिदिन या प्रतिक्षण अंशरूप में उससे ग्रहण करता चले। इत्र, सुपारी आदि
वस्तुएँ प्रतिदिन दी जाती हैं ॥ ९ ॥
तामात्मनो दारैः सह विस्रम्भगोष्ठ्यां विविक्तासने च योजयेत् ॥ १० ॥
उसे अपने घर की स्त्रियों के साथ एकान्त में वार्तालाप और खान पान में लगा दे ॥ १० ॥
नित्यदर्शनार्थं विश्वासनार्थं च ॥ ११ ॥
सदैव ऐसे प्रयत्न करे कि नायिका प्रतिदिन दीखती रहे तथा प्रेम और विश्वास बढ़ता
रहे ॥ ११ ॥
सुवर्णकारमणिकारवैकटिकनीलीकुसुम्भरञ्जकादिषु च कामार्थिन्यां
सहात्मनो वश्यैश्चैषां तत्सम्पादने स्वयं प्रयतेत ॥ १२ ॥

५. पारदारिक अधिकरण १२९
सुनार, रत्नकार, वैकटिक (रत्नपरिशोधक या रत्नों का शोधन करने वाले अथवा उन्हें
सुन्दर आकार देने वाले), नीलगार, रंगरेज, बढ़ई आदि से यदि नायिका का कोई काम पड़े, तो
नायक अपने परिचितों द्वारा उस कार्य को कराने का दायित्व स्वयं ले ले ॥ १२ ॥
तदनुष्ठाननिरतस्य लोकविदितो दीर्घकालं सन्दर्शनयोगः ॥ १३ ॥
ऐसे कार्य करते हुए नायक को नायिका के निकट आने का अवसर मिलता है और
निकटवर्ती लोग वास्तविकता को बहुत देर से समझ पाते हैं ॥ १३ ॥
तस्मिंश्चान्येषामपि कर्मणामनुसन्धानम् ॥ १४ ॥
नायिका का एक कार्य पूर्ण न होने पाये कि दूसरे कार्य को खोज ले ॥ १४ ॥
येन कर्मणा द्रव्येण कौशलेन चार्थिनी स्यात्तस्य प्रयोगमुत्पत्तिमागममुपायं
विज्ञानं चात्मायत्तं दर्शयेत् ॥ १५ ॥
उस नायिका को जिस कार्य, द्रव्य और कौशल की इच्छा हो, उसके प्रयोग, उत्पत्ति,
आगम, उपाय और विज्ञान को अपने अधीन दिखा दे ॥ १५ ॥
पूर्वप्रवृत्तेषु लोकचरितेषु द्रव्यगुणपरीक्षासु च तया तत्परिजनेन च सह
विवादः ॥ १६ ॥
पुरातन रीतिरिवाजों एवं वस्तुओं के गुणों की परीक्षा में उसके तथा उसके परिजनों के
साथ वादविवाद करे। इससे सङ्कोच दूर होता है ॥ १६ ॥
तत्र निर्दिष्टानि पणितानि तेष्वेनां प्राश्निकत्वेन योजयेत् ॥ १७ ॥
इस वादविवाद में वस्तु का जो मूल्य लगाया जाये, उसके पूछने के लिये नायिका को
लगा दे ॥ १७ ॥
तया तु विवदमानोऽत्यन्ताद्भुतमिति ब्रूयादिति परिचयकारणानि ॥ १८ ॥
नायिका के साथ विवाद करता हुआ उसे विदुषी और बुद्धिमती बताये। ये परिचय के
कारण हैं ॥ १८ ॥
कृतपरिचयां दर्शितेङ्गिताकारां कन्यामिवोपायतोऽभियुञ्जीतेति। प्रायेण तत्र
सूक्ष्मा अभियोगाः। कन्यानामसम्पयुक्तत्वात्। इतरासु तानेव स्फुटमुपदध्यात्।
.सम्पयुक्तत्वात् ॥ १९ ॥
अभियोगप्रकरण—जिस स्त्री से भलीभाँति परिचय हो गया हो, जिसने अनुकूल सङ्केत
और चेष्टाएँ दिखा दी हों, उसे कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण में कहे गये कन्या को सिद्ध करने
के उपायों द्वारा ही प्राप्त करना चाहिये। क्योंकि कन्याएँ सम्भोग की हुई नहीं होतीं, इसलिये उन्हें
प्राप्त करने के लिये सूक्ष्म उपाय ही किये जाते हैं। किन्तु जो कन्याओं के अतिरिक्त हैं,
विवाहिताएँ हैं और सम्भोग कर चुकी होती हैं अथवा विवाह से पूर्व भी अनेक व्यक्तियों से
सम्भोग करा चुकी हैं, उन्हें प्राप्त करने के लिये प्रकट उपाय करने चाहियें ॥ १९ ॥
सन्दर्शिताकारायां निर्भिन्नसद्भावायां समुपभोगव्यतिकरे तदीयान्यु-
पयुञ्जीत ॥ २० ॥
जिस परकीया ने मुख और नेत्रों की प्रसन्नता और लालिमा से अपना हृदयस्थ अनुराग

१३० वात्स्यायन-कामसूत्र
प्रकट कर दिया हो, जिसका स्नेह सद्भाव प्रकट हो चुका हो, उसकी वस्तुओं का उपभोग प्रेमी
करे और प्रेमी की वस्तुओं का उपभोग वह स्वयं करे अर्थात् प्रेमी और प्रेमिका एक दूसरे की
वस्तुओं को उपभोग करें ॥ २० ॥
तत्र महार्हगन्धमुत्तरीयं कुसुमं स्यादङ्गुलीयकं च। तद्धस्ताद् गृहीतताम्बूलया
गोष्ठीगमनोद्यतस्य केशहस्तपुष्पयाचनम् ॥ २१ ॥
उपभोग की वस्तुओं का आदान-प्रदान प्रारम्भ होने पर नायक, नायिका से बहुमूल्य
सुगन्धित वस्तु (इत्र या सेंट), उत्तरीय (शाल या दुपट्टा), पुष्प और अँगूठी ग्रहण कर ले। जब
वह अपने हाथ से पान खा ले, तो गोष्ठी में जाने के लिये तैयार होकर उसके केशपाश (जूड़े)
में खोंसे गये सुगन्धित फूल (गजरा) माँगे ॥ २१ ॥
तत्र महार्हगन्धं स्पृहणीयं स्वनखदशनपदचिह्नितं साकारं दद्यात् ॥ २२ ॥
जब नायक बहुमूल्य सुगन्धित वस्तु (इत्र आदि) व अन्य मनोवांछित वस्तुएँ नायिका को
दे, तो उन पर अपने नखों एवं दाँतों के चिह्न अङ्कित कर दे ॥ २२ ॥
अधिकैरधिकैश्चाभियोगैः साध्वसविच्छेदनम् ॥ २३ ॥
नायक को चाहिये कि उत्तरोत्तर अधिकाधिक उपाय करता हुआ उसके भय को दूर कर
दे ॥ २३ ॥
क्रमेण च विविक्तदेशे गमनमालिङ्गनं चुम्बनं ताम्बूलस्य ग्रहणं दानान्ते
द्रव्याणां परिवर्तनं गुह्यदेशाभिमर्शनं चेत्यभियोगाः ॥ २४ ॥
आन्तरिक अभियोग—क्रमशः एकान्त में मिलना, आलिङ्गन, चुम्बन, पान लेना और
देना, वस्तुओं का परिवर्तन और नायिका के गुह्याङ्गों का स्पर्श—ये अभियोग होने
चाहिये ॥ २४ ॥
यत्र चैकाभियुक्ता न तत्रापरामभियुञ्जीत ॥ २५ ॥
अभियोगहेतु अनुपयुक्त स्थल—जिस स्थान पर एक परकीया से मिलन हो चुका हो,
उस स्थान पर दूसरी परकीया से नहीं मिलना चाहिये ॥ २५ ॥
तत्र या वृद्धानुभूतविषया प्रियोपग्रहैश्च तामुपगृह्णीयात् ॥ २६ ॥
गृहस्वामिनी की अनुकूलता अनिवार्य—जहाँ परकीया के साथ रमण करना हो, वहाँ
यदि कोई खेली खायी वृद्धा हो, तो दे दिलाकर उसे अवश्य अनुकूल बना लेना चाहिये ॥ २६ ॥
श्लोकावत्र भवतः—
अन्यत्र दृष्टसञ्चारस्तद्भर्ता यत्र नायकः।
न तत्र योषितं काञ्चित् सुप्रापामपि लङ्घयेत् ॥ २७ ॥
अनुपयुक्त घर—जिस घर में नायिका के पति ने किसी अन्य स्त्री का व्यभिचार देखा या
सुना हो, वहाँ सरलता से प्राप्त होने वाली किसी स्त्री के साथ भी नहीं मिलना चाहिये ॥ २७ ॥
शङ्कितां रक्षितां भीतां सश्वश्रूकां च योषितम्।
न तर्कयेत मेधावी जानन् प्रत्ययमात्मनः ॥ २८ ॥