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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 248 में से

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पृष्ठ 164

१३८ वात्स्यायन-कामसूत्र
नायक की पूर्वप्रवृत्ति और उसके दर्शन से सम्बन्धित कथावार्ताओं को सङ्कोचवश स्वयं
न कहकर भी दूती से सुनने की इच्छा रखती है ॥ २८ ॥
नायकमनोरथेषु च कथ्यमानेषु सपरिभवं नाम हसति। न च
निर्वदतीति ॥ २९ ॥
नायक के मनोरथ कहे जाने पर तिरस्कारपूर्वक हँस देती है, लेकिन यह भी नहीं कहती
कि उसका मनोरथ अवश्य पूर्ण होगा ॥ २९ ॥
दूत्येनां दर्शिताकारां नायकाभिज्ञानैरुपबृंहयेत् ॥ ३० ॥
अनुकूलित आकार का फल—पूर्वोक्त रीति से जिसके भावव्यञ्जक व्यापारों को देख
लिया हो, उसे दूती नायक की पुरानी बातों पर अनुरक्त करे ॥ ३० ॥
असंस्तुतां तु गुणकथनैरनुरागकथाभिश्चावर्जयेत् ॥ ३१ ॥
जिस नायिका का नायक के साथ परिचय न हो, उसे तो नायक के गुणों और उसकी
प्रेमकथाओं को सुना सुनाकर ही अनुरक्त करे ॥ ३१ ॥
नासंस्तुतादृष्टाकारयोर्दूत्यमस्तीत्यौद्दालकिः ॥ ३२ ॥
दूतीकर्म पर मतवैभिन्न्य—जो नायिका अपरिचित है और जिसके भावव्यञ्जक व्यापारों
की परीक्षा नहीं की गयी है, उसके साथ दूतीकर्म नहीं हो सकता—यह महर्षि श्वेतकेतु का मत
है ॥ ३२ ॥
असंस्तुतयोरपि संसृष्टाकारयोरस्तीति बाभ्रवीयाः ॥ ३३ ॥
अपरिचित होने पर भी यदि नायिका की अनुकूल चेष्टाएँ देख ली गयी हों, तो उसके साथ
दूतीकर्म हो सकता है—ऐसा बाभ्रव्य आचार्य के अनुयायियों (शिष्यों) का मत है ॥ ३३ ॥
संस्तुतयोरप्यसंसृष्टाकारयोरस्तीति गोणिकापुत्रः ॥ ३४ ॥
अपरिचित और बिना अनुकूल चेष्टाओं वाली नायिका के साथ भी दूतीकर्म हो सकता
है—यह इस अधिकरण के विशेषज्ञ आचार्य गोणिकापुत्र का मत है ॥ ३४ ॥
असंस्तुतयोरदृष्टाकारयोरपि दूतीप्रत्ययादिति वात्स्यायनः ॥ ३५ ॥
दूती के विश्वास पर पूर्णतः अपरिचित और विना अनुकूल चेष्टाओं वाली नायिका के साथ
भी दूतीकर्म होता है—ऐसी महर्षि वात्स्यायन की व्यवस्था है ॥ ३५ ॥
तासां मनोहराण्युपायनानि ताम्बूलमनुलेपनं स्रजमङ्गुलीयकं वासो वा तेन
प्रहितं दर्शयेत् ॥ ३६ ॥
वस्तुप्रेषण—अपरिचित होने पर भी नायक उसे मनोहर भेंट, पान, अनुलेप, माला,
अँगूठी आदि भेजे ॥ ३६ ॥
तेषु नायकस्य यथार्थं नखदशनपदानि तानि तानि च चिह्नानि स्युः ॥ ३७ ॥
उन उपहार की वस्तुओं पर नायक के नखों और दाँतों के चिह्न अङ्कित हों ॥ ३७ ॥
वाससि च कुङ्कुमाङ्कमञ्जलिं निदध्यात् ॥ ३८ ॥
नायिका को उपहार में भेजे जाने वाले वस्त्रों पर केसर के थापे लगा दे ॥ ३८ ॥