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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 248 में से

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पृष्ठ 168

१४२ वात्स्यायन-कामसूत्र
मूकदूती— भले-बुरे का ज्ञान न रखने वाली अवयस्क परिचारिका को उस नायिका के
घर खेलने भेजे। उसके साथ नायिका का अच्छा परिचय हो जाने पर माला या कर्णपत्र में गूढ़
प्रेमपत्र रखकर नखक्षत एवं दन्तक्षत बनाये। इस प्रकार कार्य करने वाली मूकदूती होती है।
इसका प्रत्युत्तर उस नायिका से ही माँगे ॥ ६१ ॥
पूर्वप्रस्तुतार्थलिङ्गसम्बद्धमन्यजनाग्रहणीयं लौकिकार्थं द्व्यर्थं वा
वचनमुदासीना या श्रावयेत् सा वातदूती। तस्या अपि तयैव प्रत्युत्तरप्रार्थनमिति
तासां विशेषः ॥ ६२ ॥
वातदूती— नायक-नायिका के पूर्ववर्ती वृत्तान्त के बोधक, लौकिक या द्व्यर्थक वचनों
को, जिन्हें अन्य न समझ सकें, जो उदासीन होकर सुनाये और उससे उसी भाषा में उत्तर भी ले
ले, उसे वातदूती कहते हैं ॥ ३२ ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
विधवेक्षणिका दासी भिक्षुकी शिल्पकारिका।
प्रविशत्याशु विश्वासं दूतीकार्यं च बिन्दति ॥ ६३ ॥
इस विषय में आनुवंश्य श्लोक उद्धृत करते हैं—
विधवा, शकुन बताने वाली, दासी, भिक्षुणी, महावर लगाने एवं बाल सँवारने वाली
नाइन—ये शीघ्र ही प्रविष्ट होकर विश्वासपात्र बन जाती हैं और फिर दूती का काम करने
लगती हैं ॥ ६३ ॥
संक्षेपेण दूतीकर्माण्यह—
विद्वेषं ग्राहयेत् पत्यौ रमणीयानि वर्णयेत्।
चित्रान् सुरतसम्भोगानन्यासामपि दर्शयेत् ॥ ६४ ॥
दूतीकर्म : सारसंक्षेप— दूतियाँ पतियों से विद्वेष करा दें, जिस नायक से उसे मिलाना
चाहें, उसके रूप आदि की प्रशंसा करें। अन्य स्त्रियों के समक्ष भी सुरत और सम्भोगों के
अश्लील चित्र दिखायें ॥ ६४ ॥
नायकस्यानुरागं च पुनश्च रतिकौशलम्।
प्रार्थनां चाधिकस्त्रीभिरवष्टम्भं च वर्णयेत् ॥ ६५ ॥
नायक के अनुराग और रतिकौशल का वर्णन करे। नायिका से भी अधिक रूपवती,
धनवती और शीलवती स्त्रियों की प्रार्थना को बताये कि ये स्त्रियाँ भी उस पर अनुरक्त हैं। साथ
ही, नायक के दृढ़ निश्चय को भी प्रकटित करे ॥ ६५ ॥
असङ्कल्पितमप्यर्थमुत्सृष्टं दोषकारणात्।
पुनरावर्तयत्येव दूती वचनकौशलात् ॥ ६६ ॥
जिसके विषय में कभी सोचा भी न गया हो, जो दोषों के कारण त्याग दिया गया हो, दूती
अपने वाक्चातुर्य से ऐसे नायकों को भी सुन्दरियों का प्रेमी बना देती है ॥ ६६ ॥
दूतीकर्म प्रकरण नामक चतुर्थ अध्याय सम्पन्न॥