वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० वात्स्यायन-कामसूत्र
निसृष्टार्था दूती—जो दूती नायक और नायिका के अभिलषित प्रयोजन को समझकर
अपनी बुद्धि से कार्य सम्पादित करती है, वह निसृष्टार्था दूती कहलाती है ॥ ४६ ॥
सा प्रायेण संस्तुतसम्भाषणयोः ॥ ४७ ॥
इसका विषय—यह दूती प्रायः उन्हीं नायक नायिकाओं का कार्य करती है जिनमें
परस्पर परिचय और सम्भाषण हो ॥ ४७ ॥
नायिकया प्रयुक्ता असंस्तुतसम्भाषणयोरपि ॥ ४८ ॥
नायिका द्वारा भेजी गयी दूती परिचय और वार्तालाप के बिना भी कार्य सम्पादित
करती है ॥ ४८ ॥
कौतुकाच्चानुरूपौ युक्ताविमौ परस्परस्येत्यसंस्तुतयोरपि ॥ ४९ ॥
यदि यह निसृष्टार्था दूती परस्पर अनुरूप और उपयुक्त नायक नायिकाओं को मिलाना
चाहे तो उन्हें भी मिला सकती है ॥ ४९ ॥
कार्यैकदेशमभियोगैकदेशं चोपलभ्य शेषं संपादयतीति परिमितार्था ॥ ५० ॥
परिमितार्था दूती—नायक-नायिका के मिलन के एक अंश (अभियोग के एक भाग)
को जानकर, शेष का स्वयं उपाय कर ले, वह परिमितार्था दूती कहलाती है ॥ ५० ॥
सा दृष्टपरस्पराकारयोः प्रविरलदर्शनयोः ॥ ५१ ॥
इसका विषय—जहाँ नायक नायिका ने एक दूसरे की अनुकूल चेष्टाएँ देख ली हों,
लेकिन वे एक दूसरे को कम ही दिखायी देते हों, वहाँ पर परिमितार्था दूती मिलन का कार्य
करती है ॥ ५१ ॥
सन्देशमात्रं प्रापयतीति पत्रहारी ॥ ५२ ॥
पत्रहारी दूती—जो दूती नायक और नायिका का सन्देश या पत्र ले जाने का कार्य करती
है, वह पत्रहारी दूती कहलाती है ॥ ५२ ॥
सा प्रगाढसद्भावयोः संसृष्टयोश्च देशकालसम्बोधनार्थम् ॥ ५३ ॥
इसका विषय—यह दूती उन नायक-नायिकाओं के मिलन के स्थल एवं समय निश्चित
करने के लिए होती है जो परस्पर-प्रेमपाश में बँध चुके हों और कई बार मिल चुके हों ॥ ५३ ॥
दौत्येन प्रहितान्यया स्वयमेव नायकमभिगच्छेदजानती नाम तेन सहोपभोगं
स्वप्ने वा कथयेत् । गोत्रस्खलितं भार्यां चास्य निन्देत् । तद्व्यपदेशेन स्वयमीर्ष्यां
दर्शयेत् । नखदशनचिह्नितं वा किञ्चिद् दद्यात् । भवतेऽहमादौ दातुं सङ्कल्पितेति
चाभिदधीत । मम भार्यायाः का रमणीयेति विविक्ते पर्यनुयुञ्जीत सा
स्वयंदूती ॥ ५४ ॥
स्वयंदूती (प्रथम)—जब कोई नायिका किसी स्त्री को दूतकर्म के लिए भेजती है और
वह स्वयं ही नायक की कामना करने लगे, तो उसे स्वयंदूती कहते हैं। वह नायक से अपरिचित
होती हुई भी स्वप्न में उसके साथ सम्भोग की बातें कहे, अपने इस पतन और उसकी स्त्री
(नायिका) की निन्दा करे, किसी बहाने से उस नायिका से ईर्ष्या दिखाये, अथवा नखों और
!दाँतों से चिह्न बनाकर कुछ वस्तु उस नायक को दे और उससे कहे कि मेरे माता पिता ने पहले