वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४४ वात्स्यायन-कामसूत्र
विधवानाथाप्रव्रजिताभिः सह सूत्राध्यक्षस्य ॥ ८ ॥
सूत का प्रभारी—विधवा, अनाथ और संन्यासिनी स्त्रियों के साथ सूत्राध्यक्ष समागम
कर सकता है ॥ ८ ॥
मर्मज्ञत्वाद् रात्रावटने चाटन्तीभिर्नागरस्य ॥ ९ ॥
नगराध्यक्ष—रात को पहरा देने वाला नगराध्यक्ष (कोतवाल), रहस्य जानने के कारण,
रात को घूमने वाली स्त्रियों के साथ समागम कर सकता है ॥ ९ ॥
क्रयविक्रये पण्याध्यक्षस्य ॥ १० ॥
बाजार का अधिकारी—पण्याध्यक्ष क्रय-विक्रय करने वाली स्त्रियों के साथ समागम
कर सकता है ॥ १० ॥
अष्टमीचन्द्रकौमुदीसुवसन्तकादिषु पत्तनगरखर्वटयोषितामीश्वरभवने
सटान्तःपुरिकाभिः प्रायेण क्रीडा ॥ ११ ॥
मुख्य अधिकारियों के उपाय—बहुला अष्टमी, कौमुदी महोत्सव, सुवसन्तक आदि
बड़े उत्सवों पर राजधानी, नगर और कस्बों की स्त्रियाँ राजभवन में अन्तःपुर में रहने वाली
स्त्रियों के साथ प्रायः क्रीड़ाएँ करती हैं ॥ ११ ॥
तत्र चापानकान्ते नगरस्त्रियो यथापरिचयमन्तःपुरिकाणां पृथक्पृथग्भोगा-
वासकान् प्रविश्य कथाभिरासित्वा पूजिताः प्रपीताश्चोपप्रदोषं निष्क्रामयेयुः ॥ १२ ॥
इन क्रीड़ाओं में मदिरापान के पश्चात् नगर की स्त्रियाँ अपने अपने परिचय के अनुसार
विभिन्न आमोदभवनों (रंगमहलों) में प्रवेश करके गप्पें मारती हैं, और उन राजरानियों से
स्वागत सत्कार एवं खान पान प्राप्त करके सन्ध्या के समय महलों से निकलती हैं ॥ १२ ॥
तत्र प्रणिहिता राजदासी प्रयोज्यायाः पूर्वसंसृष्टा तां तत्र सम्भाषेत ॥ १३ ॥
राजदूती का प्रयास—उन क्रीड़ाओं में राजा द्वारा नियुक्त दासी, जो राजा की
मनोवाञ्छित स्त्री से पहले ही मिल चुकी हो, उससे वार्तालाप करे ॥ १३ ॥
रामणीयकदर्शनेन योजयेत् ॥ १४ ॥
उसे राजभवन की रमणीय वस्तुएँ दिखाने में लगा दे ॥ १४ ॥
प्रागेव स्वभवनस्थां ब्रूयात्। अमुष्यां क्रीडायां तव राजभवनस्थानानि
रामणीयकनि दर्शयिष्यामीति काले च योजयेत्। बहिःप्रवालकुट्टिमं ते
दर्शयिष्यामि ॥ १५ ॥
राजदासी को चाहिये कि उस स्त्री में उत्सुकता उत्पन्न करने के लिये राजभवन में प्रवेश
से पूर्व, उसके घर पर ही यह कह दे कि इस क्रीड़ा में मैं तुम्हें राजभवन की रमणीय वस्तुएँ
दिखाऊँगी। जब वह राजभवन में आ जाये, तब उसे दिखाना प्रारम्भ कर दे। जब वह राजभवन
देख चुके, तब कहे कि अब तुम्हें बाहर प्रवालकुट्टिम (मूँगों का फर्श) दिखाऊँगी! ॥ १५ ॥
मणिभूमिकां वृक्षवाटिकां मृद्वीकामण्डपं समुद्रगृहप्रासादान् गूढभित्ति-
सञ्चारांश्चित्रकर्माणि क्रीडामृगान् यन्त्राणि शकुनान् व्याघ्रसिंहपञ्जरादीनि च यानि
पुरस्ताद्वर्णितानि स्युः ॥ १६ ॥