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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 173, कुल 248 में से

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पृष्ठ 173

५. पारदारिक अधिकरण १४७
परगृहप्रवेश में दोष—समर्थ लोगों को इस प्रकार कदापि दूसरे के घर में प्रवेश नहीं
करना चाहिये। राजा छिपकर भी कभी किसी के घर में न जाये ॥ २८ ॥
आभीरं हि कोट्टराजं परभवनगतं भ्रातृप्रयुक्तो रजको जघान। काशिराजं
जयसेनमश्वाध्यक्ष इति ॥ २९ ॥
कोट्टराज और जयसेन के उदाहरण—परगृह में प्रविष्ट कोट्टराज आभीर को भाई
द्वारा भेजे गये धोबी ने मार डाला था। इसी प्रकार काशिराज जयसेन को अश्वाध्यक्ष ने मार
डाला था ॥ २९ ॥
प्रकाशकामितानि तु देशप्रवृत्तियोगात् ॥ ३० ॥
सार्वजनिक प्रयोग—राजाओं को तो प्रायः सार्वजनिक प्रयोग ही देखने चाहिये। अब
उन्हें कहते हैं—सार्वजनिक भोग तो देशाचार के अनुरूप ही होता है ॥ ३० ॥
प्रत्ता जनपदकन्या दशमेऽहनि किञ्चिद्दौपायनिकमुपगृह्य प्रविशन्त्यन्तः-
पुरमुपभुक्ता एव विसृज्यन्त इत्यान्ध्राणाम् ॥ ३१ ॥
आन्ध्र की प्रथा— आन्ध्र देश की प्रथा है कि नवविवाहित कन्या को दसवें दिन कुछ
उपहार देकर राजभवन में भेज दिया जाता है और उपभोग करके ही छोड़ते हैं ॥ ३१ ॥
महामात्रेश्वराणामन्तःपुराणि निशि सेवार्थ राजानमुपगच्छन्ति वात्सगुल-
मकानाम् ॥ ३२ ॥
वत्सगुल्म की प्रथा—दक्षिण के वत्सगुल्म देश में, राज्य के महामन्त्री, सेनापति
आदि की स्त्रियाँ रात को सेवा के लिये राजा के पास जाती हैं ॥ ३२ ॥
रूपवतीर्जनपदयोषितः प्रीत्यपदेशेन मासं मासार्धं वातिवासयन्त्यन्तःपुरिका
वैदर्भाणाम् ॥ ३३ ॥
विदर्भ की प्रथा—विदर्भ देश की यह प्रथा है कि वहाँ राजरानियाँ प्रजावर्ग की सुन्दर
स्त्रियों को प्रेम के बहाने महीना महीना, पन्द्रह-पन्द्रह दिन अपने पास रख लेती हैं ॥ ३३ ॥
दर्शनीयाः स्वभार्याः प्रीतिदायमेव महामात्रराजभ्यो ददत्यपरान्तका-
नाम् ॥ ३४ ॥
अपरान्त की प्रथा—अपरान्त देश की यह प्रथा है कि वे अपनी सुन्दर पत्नी को
महामन्त्री और राजा को उपहार रूप में दे देते हैं ॥ ३४ ॥
राजक्रीडार्थं नगरस्त्रियो जनपदस्त्रियश्च सङ्घश एकशश्च राजकुलं प्रविशन्ति
सौराष्ट्रकाणामिति ॥ ३५ ॥
सौराष्ट्र की प्रथा— सौराष्ट्र देश की यह प्रथा है कि राजधानी और बाहर की स्त्रियाँ
समूह के रूप में और एक एक करके राजक्रीड़ा के लिये राजभवन जाती हैं ॥ ३५ ॥
श्लोकावत्र भवतः—
एते चान्ये च बहवः प्रयोगाः पारदारिकाः ।
देशे देशे प्रवर्त्तन्ते राजभिः संप्रवर्तिताः ॥ ३६ ॥