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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 248 में से

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पृष्ठ 141

४. भार्याधिकारिक अधिकरण ११५
भिन्नरहस्या हि भर्तुरवज्ञां लभते ॥ २७ ॥
सम्मान-कथन में दोष—पति का रहस्य प्रकट करने वाली स्त्रियाँ सदैव पति द्वारा
तिरस्कृत होती है ॥ २७ ॥
ज्येष्ठाभयाच्च निगूढसम्मानार्थिनी स्यादिति गोनर्दीयः ॥ २८ ॥
ज्येष्ठा के भय से पति से प्राप्त प्रेम एवं सम्मान का आनन्द एकान्त में ही लेना चाहिये—
यह इस अधिकरण के व्याख्याता एवं विशेषज्ञ आचार्य गोनर्दीय का मत है ॥ २८ ॥
दुर्भगामनपत्यां च ज्येष्ठामनुकम्पेत नायकेन चानुकम्पयेत् ॥ २९ ॥
निःसन्तान पर अनुकम्पा—यदि ज्येष्ठा दुर्भगा (उपेक्षिता) या सन्तानरहित हो, तो उस
पर सदैव अनुग्रह रखे, और पति से भी अनुग्रह रखने का निवेदन करे ॥ २९ ॥
प्रसह्य त्वेनामेकचारिणीवृत्तमनुतिष्ठेदिति कनिष्ठावृत्तम् ॥ ३० ॥
इस प्रकार कनिष्ठा अपने स्नेहिल व्यवहार से दुर्भगा (उपेक्षिता) का अतिक्रमण कर
एकचारिणी के आचरण का पालन करे। यह कनिष्ठावृत्त पूर्ण हुआ ॥ ३० ॥
विधवा त्विन्द्रियदौर्बल्यादातुरा भोगिनं गुणसम्पन्नं च या पुनर्विन्देत् सा
पुनर्भूः ॥ ३१ ॥
पुनर्भू-वृत्तप्रकरण—अपनी कामवासनाओं को नियन्त्रित न रख पाने वाली विधवा,
जब कामपीड़ित होकर गुणसम्पन्न एवं भोगी व्यक्ति को पतिरूप में प्राप्त कर ले तो उसे पुनर्भू
कहा जाता है ॥ ३१ ॥
यतस्तु स्वेच्छया पुनरपि निष्क्रमणं निर्गुणोऽयमिति तदान्यं काङ्क्षेदिति
बाभ्रवीयाः ॥ ३२ ॥
पुनर्भू के गृहत्याग की रीति—पुनर्भू स्वेच्छा से वर्तमान पति का घर छोड़कर अन्य के
घर बैठना चाहे, तो 'यह गुणविहीन है' ऐसा कहकर दूसरे को पतिरूप में स्वीकारे—यह
आचार्य बाभ्रव्य के अनुयायियों (शिष्यों) का मत है ॥ ३२ ॥
सौख्यार्थिनी सा किलान्यं पुनर्विन्देत ॥ ३३ ॥
यदि अधिक इन्द्रिय-सुख चाहे, तो उसे भी छोड़कर अन्य पुरुष को प्राप्त कर ले ॥ ३३ ॥
गुणेषु सोपभोगेषु सुखसाकल्यं तस्मात्ततो विशेष इति गोनर्दीयः ॥ ३४ ॥
यदि पुनर्भू छोड़े गये दूसरे और तीसरे नायक से चौथे नायक में समस्त भोगों की सुलभता
देखे, तो चौथे स्थान पर भी जा सकती है—यह आचार्य गोनर्दीय का अभिमत है, लेकिन इससे
आगे उसे नहीं बढ़ना चाहिये ॥ ३४ ॥
आत्मनश्चित्तानुकूल्यादिति वात्स्यायनः ॥ ३५ ॥
वात्स्यायन की व्यवस्था—जो भी पुरुष अपनी चित्तवृत्ति के अनुकूल हो, वहीं पुनर्भू
को बैठ जाना चाहिये—यह महर्षि वात्स्यायन की व्यवस्था है ॥ ३५ ॥
सा बान्धवैर्नायकादापानकोद्यानश्रद्धादानमित्रपूजनादिव्ययसहिष्णु कर्म
लिप्सेत ॥ ३६ ॥
उत्तम पुनर्भू की इच्छा—उत्तम प्रकृति की पुनर्भू अपने नायक या बान्धवों की परिचर्या