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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 142, कुल 248 में से

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पृष्ठ 142

११६ वात्स्यायन-कामसूत्र
करके इतना धन अवश्य चाहे जिससे मद्यपान, विहार, दान-दक्षिणा और मित्रों के स्वागत-
सत्कार आदि का कार्य चल सके ॥ ३६ ॥
आत्मनः सारेण वालङ्कारं तदीयमात्मीयं वा बिभृयात् ॥ ३७ ॥
मध्यम और अधम पुनर्भू की इच्छा—मध्यम और अधम प्रकृति की पुनर्भू मद्यपान
आदि का खर्च अपने निजी धन से चलाये और अपने ही आभूषण धारण करे। यदि अपने
आभूषण न हों तो नायक द्वारा दिये गये आभूषण ही पहने ॥ ३७ ॥
प्रीतिदायेष्वनियमः ॥ ३८ ॥
नायक द्वारा प्रेमपूर्वक जो उपहार दिया है, उसके विषय में कोई निश्चित नियम
नहीं है ॥ ३८ ॥
स्वेच्छया च गृहान्निर्गच्छन्ती प्रीतिदायादन्यन्नायकदत्तं जीयेत। निष्कास्यमाना
तु न किञ्चिद्दद्यात् ॥ ३९ ॥
प्रेमोपहारों के अतिरिक्त सभी सम्पदा पर नायक का अधिकार—यदि पुनर्भू स्वेच्छा
से नायक का घर छोड़कर, अन्य नायक के घर बैठे, तो प्रेमोपहारों के अतिरिक्त नायक द्वारा
प्रदत्त अन्य सभी सुविधाओं और सम्पदाओं को उसे वापस कर दे, और यदि नायक स्वयं घर से
निकाले, तो जो उसके पास है, उसमें से कुछ भी वापस न करे ॥ ३९ ॥
सा प्रभविष्णुरिव तस्य भवनमाप्नुयात् ॥ ४० ॥
स्वामिनीवत् रहे—पुनर्भू जिस नायक के भी घर बैठे, वहाँ स्वामिनी बनकर रहे ॥ ४० ॥
कुलजासु तु प्रीत्या वर्तेत ॥ ४१ ॥
धर्मपत्नी से व्यवहार—नायक की धर्मपत्नियों के साथ प्रीतिपूर्ण व्यवहार रखे ॥ ४१ ॥
दाक्षिण्येन परिजने सर्वत्र सपरिहासा मित्रेषु प्रतिपत्तिः। कलासु कौशल-
मधिकस्य च ज्ञानम् ॥ ४२ ॥
परिजनों एवं मित्रों के साथ व्यवहार—नायक के पारिवारिक सदस्यों के साथ
शालीनता और शिष्टता का व्यवहार करे और मित्रों के साथ हास-परिहासपूर्वक वार्तालाप करे।
कलाओं में कुशलता और अभिज्ञता का परिचय दे ॥ ४२ ॥
कलहस्थानेषु च नायकं स्वयमुपालभेत ॥ ४३ ॥
कलह के स्थान पर केवल उपालम्भ—कलह के कारणों पर नायक को केवल
उपालभ ही दे ॥ ४३ ॥
रहसि च कलया चतुःषष्ट्यानुवर्तेत। सपत्नीनां च स्वयमुपकुर्यात्। तासाम-
पत्येष्व्वाभरणदानम्। तेषु स्वामिवदुपचारः। मण्डनकानि वेषानादरेण कुर्वीत।
परिजने मित्रवर्गे चाधिकं विश्राणनम्। समाजापानकोद्यानयात्राविहारशीलता चेति
पुनर्भूवृत्तम् ॥ ४४ ॥
परामर्श—एकान्त में नायक की इच्छानुरूप चौंसठ कामकलाओं का प्रदर्शन करे।
अपनी सपत्नियों (नायक की धर्मपत्नियों) का स्वेच्छा से उपकार करे। उनके बच्चों को
आभूषण आदि दे। अभिभाविका के समान उनकी सेवा-शुश्रूषा (लालन-पालन) करे। आदर-
सत्कारपूर्वक उन्हें वस्त्राभूषणों से सज्जित करे। नायक के पारिवारिक सदस्यों और मित्रों के