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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

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पृष्ठ 150

१२४ वात्स्यायन-कामसूत्र
मन्दकाम की शङ्का—यह शश जाति का और मन्दवेग है, यह समझकर हस्तिनी जाति
की और चण्डवेग स्त्री पीछे हट जाती है॥ ३६॥
मत्तोऽस्य मा भूदनिष्टमित्यनुकम्पा॥ ३७॥
अनिष्ट की आशङ्का—मेरे कारण इसका कुछ अनिष्ट न हो जाये—इस अनुकम्पा से भी
स्त्री विरत हो जाती है॥ ३७॥
आत्मनि दोषदर्शनान्निर्वेदः॥ ३८॥
अपने दोषों पर दृष्टि—अपने में दोष देखकर भी स्त्री परपुरुष से विरक्त हो जाती
है॥ ३८॥
विदिता सती स्वजनबहिष्कृता भविष्यामीति भयम्॥ ३९॥
बहिष्कार का भय—अवैध सम्बन्धों का पता लग जाने पर परिवार द्वारा बहिष्कृत कर
दी जाऊँगी—इस भय से भी स्त्री परपुरुष में प्रवृत्त नहीं होती॥ ३९॥
पलित इत्यनादरः॥ ४०॥
परपुरुष की वृद्धता—परपुरुष को वृद्ध देखकर भी उसका अनादर कर देती है॥ ४०॥
पत्या प्रयुक्तः परीक्षत इति विमर्शः॥ ४१॥
पति द्वारा परीक्षा की शङ्का—कहीं इसे मेरे पति ने ही मेरी परीक्षा के लिये न भेजा
हो—यह सोचकर भी वह परपुरुष से विमुख हो जाती है॥ ४१॥
धर्मापेक्षा चेति॥ ४२॥
धर्म की मर्यादा का ध्यान—धर्म की मर्यादा को समझकर भी स्त्री कुमार्ग से निवृत्त हो
जाती है॥ ४२॥
तेषु यदात्मनि लक्षयेत् तदादित एव परिच्छिन्द्यात्॥ ४३॥
प्रतिकार के उपाय—इनमें से जिन कारणों को पुरुष (उपपति) अपने में देखे, उन्हें
पहले ही दूर कर दे॥ ४३॥
आर्यत्वयुक्तानि रागवर्धनात्॥ ४४॥
श्रेष्ठता को अनुराग से हटाये—श्रेष्ठता (आर्यत्व) से उत्पन्न कारणों को अनुराग
बढ़ाकर हटाये॥ ४४॥
अशक्तिजान्युपायप्रदर्शनात्॥ ४५॥
दोषदर्शन का उपाय—मिलन में जिन दोषों को देखकर स्त्री विमुख हो रही हो, उन
दोषों को दूर करने का उपाय पुरुष उसे बता दे॥ ४५॥
बहुमानकृतान्यतिपरिचयात्॥ ४६॥
बहुमानजन्य कारणों का उपाय—बहुमान से उत्पन्न कारणों को अतिपरिचय से दूर
कर दे॥ ४६॥
परिभवकृतान्यतिशौण्डीर्याद्, वैचक्षणयाच्च॥ ४७॥
परिभवजन्य कारणों का उपाय—परिभव की भावना से उत्पन्न कारणों को व्यवहार-
कुशलता और कामशास्त्र की निपुणता दिखाकर दूर कर दें॥ ४७॥