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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 248 में से

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पृष्ठ 137

४. भार्याधिकारिक अधिकरण १११
परिवार के सभी सदस्यों के साथ प्रीतिपूर्ण व्यवहार करना चाहिये ॥ ३९ ॥
नायकस्यानिवेद्य न कस्मैचिद्दानम् ॥ ४० ॥
पति की अनुमति के बिना किसी को कोई वस्तु न दे ॥ ४० ॥
स्वकर्मसु भृत्यजननियमनमुत्सवेषु चास्य पूजनमित्येकचारिणीवृत्तम् ॥ ४१ ॥
नौकरों को उनके काम में लगाये रहे, और त्यौहार, उत्सव आदि पर उनका सम्मान भी
करे। इस प्रकार एकचारिणीवृत्त पूर्ण हुआ ॥ ४१ ॥
प्रवासे मङ्गलमात्राभरणा देवतोपवासपरा वार्तायां स्थिता गृहानवेक्षेत ॥ ४२ ॥
सात्त्विक जीवनयापन—पति के विदेश जाने पर मात्र माङ्गलिक आभूषण धारण करे,
शेष सभी को उतार दे, देवताओं की पूजा और उपवास में लगी रहे, और पति की शिक्षाओं का
पालन करती हुई घर की व्यवस्था देखे ॥ ४२ ॥
शय्या च गुरुजनमूले। तदभिमता कार्यनिष्पत्तिः। नायकाभिमतानां
चार्थानामर्जने प्रतिसंस्कारे च यत्नः ॥ ४३ ॥
गुरुजनों के समीप शयन—पति के विदेश जाने पर पत्नी को सास-ससुर के समीप ही
सोना चाहिये, उनके सुझाव और परामर्श से ही कार्य करना चाहिये तथा पति के प्रिय पदार्थों को
एकत्र करने एवं उनकी रक्षा करने का प्रयत्न करना चाहिये ॥ ४३ ॥
नित्यनैमित्तकेषु कर्मसूचितो व्ययः। तदारब्धानां च कर्मणां समापने
मतिः ॥ ४४ ॥
अनधिक व्यय—नित्य एवं नैमित्तिक कार्यों में समुचित या पति द्वारा निर्धारित ही व्यय
करे। पति ने जिन कार्यों का समारम्भ किया हो, उन्हें यथासमय पूर्ण करने की निरन्तर चेष्टा
करती रहे ॥ ४४ ॥
ज्ञातिकुलस्थानभिगमनमन्यत्र व्यसनोत्सवाभ्याम्। तत्रापि नायकपरिजना-
धिष्ठिताया नातिकालमवस्थानमपरिवर्तितप्रवासवेषता च ॥ ४५ ॥
अत्यावश्यक होने पर ही बहिर्गमन—अपने माता-पिता के घर भी व्यसन (मृत्यु
आदि) और उत्सव (विवाह आदि) के अतिरिक्त न जाये। वहाँ भी ससुरकुल का एक व्यक्ति
(देवर या ननद) साथ ले जाये और अधिक समय न लगाये तथा उत्सव में भी प्रोषित पतिकाओं
जैसी सरल एवं सात्त्विक वेशभूषा ही धारण करे ॥ ४५ ॥
गुरुजनानुज्ञातानां करणमुपवासानाम्। परिचारकैः शुचिभिराज्ञाधिष्ठि-
तैरनुमतेन क्रयविक्रयकर्मणा सारस्यापूरणं तनूकरणं च शक्त्या व्ययानाम् ॥ ४६ ॥
उपवास एवं अर्थ-व्यवस्था—सास-ससुर की अनुमति से ही व्रतोपवास करें। ईमानदार
और आज्ञाकारी नौकरों के माध्यम से क्रय-विक्रय कर धनाभाव को पूरा करे और व्यय में
यथासम्भव कमी लाये ॥ ४६ ॥
आगते च प्रकृतिस्थाया एव प्रथमतः दर्शनं दैवतपूजनमुपहाराणां
चाहरणमिति प्रवासचर्या ॥ ४७ ॥
प्रोषितपतिका के रूप में ही दर्शन—पति के प्रवास से लौटने पर पहली बार पत्नी