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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 248 में से

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पृष्ठ 140

११४ वात्स्यायन-कामसूत्र
मन्दं वा कलहमुपलभ्य स्वयमेव सन्धुक्षयेत् ॥ १४ ॥
कलह के मन्द पड़ने पर स्वयं भड़का दे ॥ १४ ॥
यदि नायकोऽस्यामद्यापि सानुनय इति मन्येत तदा स्वयमेव सन्धौ प्रयततेति
ज्येष्ठावृत्तम् ॥ १५ ॥
शान्ति-प्रयास—यदि यह समझ ले कि पति अब भी नवप्रिया पर प्रेम रखता है, तो स्वयं
दोनों में मेल कराने का प्रयत्न करे—इस प्रकार ज्येष्ठावृत्त पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥
कनिष्ठा तु मातृवत् सपत्नीं पश्येत् ॥ १६ ॥
कनिष्ठावृत्त-प्रकरण—कनिष्ठा, ज्येष्ठा को माता के समान पूज्य समझे ॥ १६ ॥
ज्ञातिदायमपि तस्या अविदितं नोपयुञ्जीत ॥ १७ ॥
उसकी अनुमति के बिना माता पिता द्वारा दी गयी वस्तु का भी उपभोग न करे ॥ १७ ॥
आत्मवृत्तान् ताँस्तदधिष्ठितान् कुर्यात् ॥ १८ ॥
सब कुछ बता दे—अपनी सद्-असद् सभी बातें ज्येष्ठा को बता दे ॥ १८ ॥
अनुज्ञाता पतिमधिशयीत ॥ १९ ॥
ज्येष्ठा की अनुमति से ही पति के साथ शयन कहे ॥ १९ ॥
न वा तस्या वचनमन्यस्याः कथयेत् ॥ २० ॥
रहस्योद्घाटन न करे—ज्येष्ठा द्वारा कही गयी बातें या उसकी चरित्रविषयक बातें कभी
किसी से न कहे ॥ २० ॥
तदपत्यानि स्वेभ्योऽधिकानि पश्येत् ॥ २१ ॥
सन्तान पर प्राणन्यौछावर—ज्येष्ठा की सन्तान को अपनी सन्तान से अधिक प्रेम
करे ॥ २१ ॥
रहसि पतिमधिकमुपचरेत् ॥ २२ ॥
ऐकान्तिक उपचार—संयोग के समय पति का भरपूर मनोरञ्जन करे ॥ २२ ॥
आत्मनश्च सपत्नीविकारजं दुःखं नाचक्षीत ॥ २३ ॥
सपत्नियों की अनिन्दा—सपत्नियों से मिलने वाले तिरस्कारजन्य दुःख को पति से
कदापि न कहे ॥ २३ ॥
पत्युश्च सविशेषकं गूढं मानं लिप्सेत् ॥ २४ ॥
पति से सम्मान—एकान्त में पति से सर्वाधिक प्रेम और सम्मान पाने का सदैव प्रयास
करे ॥ २४ ॥
अनेन खलु पथ्यदानेन जीवामीति ब्रूयात् ॥ २५ ॥
पति से कहे कि आपका प्रेम और सम्मान ही मेरे जीवन का एकमात्र सहारा है ॥ २५ ॥
तत्तु श्लाघया रागेण वा बहिर्नाचक्षीत ॥ २६ ॥
सम्मान का अकथन—पति से प्राप्त सम्मान को आत्मश्लाघा (आत्मप्रशंसा) या
अनुरागवश भी कभी किसी से न कहे ॥ २६ ॥