वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ वात्स्यायन-कामसूत्र
पुरुष-स्वभाव—पुरुष धार्मिक मर्यादा और शिष्टाचार को देखकर परकीया की कामना
करता हुआ भी पीछे हट जाता है ॥ १३ ॥
तथाबुद्धिश्चाभियुज्यमानोऽपि न सिध्यति ॥ १४ ॥
विचारशील की प्राप्ति असम्भव—धार्मिक मर्यादा और शिष्टाचार का ध्यान रखने वाला
पुरुष परकीया द्वारा अभियोग करने पर भी प्राप्त नहीं हो पाता ॥ १४ ॥
निष्कारणमभियुङ्क्ते। अभियुज्यापि पुनर्नाभियुङ्क्ते। सिद्धायां च माध्यस्थ्यं
गच्छति ॥ १५ ॥
पुरुष-स्वभाव की विचित्रता—पुरुष कभी तो अकारण (बिना काम के) अभियोग
करने लगता है और कभी स्त्री के सिद्ध हो जाने पर भी उससे उदासीन हो जाता है ॥ १५ ॥
सुलभामवमन्यते। दुर्लभामाकाङ्क्षत इति प्रायोवादः ॥ १६ ॥
सुलभ की अवमानना और दुर्लभ की आकांक्षा—प्रायः देखा जाता है कि पुरुष
सहजता से प्राप्त हो जाने वाली स्त्री को महत्त्व नहीं देता और अभियोगों द्वारा कठिनता से मिलने
वाली स्त्री की आकांक्षा करता है ॥ १६ ॥
तत्र व्यावर्तनकारणानि ॥ १७ ॥
व्याववृत्तिकारण—जिन कारणों से स्त्री परपुरुष की कामना करती हुई भी स्वयं पीछे हट
जाती हैं, उन्हें कहते हैं ॥ १७ ॥
पत्यावनुरागः ॥ १८ ॥
पतिविषयक प्रेम—परपुरुष की कामना करती हुई स्त्री, पति के अनुराग का ध्यान कर
पीछे हट जाती है ॥ १८ ॥
अपत्यापेक्षा ॥ १९ ॥
सन्तति की अपेक्षा—बच्चों के प्रति वात्सल्य भी उसे परपुरुष से विरत कर देता
है ॥ १९ ॥
अतिक्रान्तवयस्त्वम् ॥ २० ॥
प्रौढ़ावस्था का ध्यान—यौवन बीत जाने पर वह स्वयं पीछे हट जाती है ॥ २० ॥
दुःखाभिभवः ॥ २१ ॥
शोकाकुलता—शोकाकुल स्त्री भी स्वयं पीछे हट जाती है ॥ २१ ॥
विरहानुपलम्भः ॥ २२ ॥
विरह की असमर्थता—पति के विरह को सहने में असमर्थ स्त्री भी स्वयं पीछे हट
जाती है ॥ २२ ॥
अवज्ञयोपमन्त्रयत इति क्रोधः ॥ २३ ॥
अवज्ञा की शंका—कहीं अनादर के लिये तो नहीं बुला रहा है, इस भय से भी स्वयं
पीछे हट जाती है ॥ २३ ॥
अप्रतर्क्य इति सङ्कल्पवर्जनम् ॥ २४ ॥
अवश्यता का अनुमान—यह पुरुष वश में नहीं आ सकेगा, ऐसा मानकर भी परपुरुष
का सङ्कल्प छोड़ देती है ॥ २४ ॥