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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

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पृष्ठ 144

११८ वात्स्यायन-कामसूत्र
नायक जिस प्रकार भी उसे पतिव्रता एवं विदग्ध समझे, वही करे। दुर्भागावृत्त पूर्ण
हुआ॥ ५४ ॥
अन्तःपुराणां च वृत्तमेतेष्वेव प्रकरणेषु लक्षयेत् ॥ ५५ ॥
अन्तःपुर वृत्त—अन्तःपुर की रानियों के आचरण को भी इसी प्रकरण में देख लें॥ ५५ ॥
माल्यानुलेपनवासांसि चासां कञ्चुकीया महत्तरिका वा राज्ञो
निवेदयेयुर्देवीभिः प्रहितमिति ॥ ५६ ॥
राजा का आचरण—अन्तःपुर की कञ्चुकियों और महत्तरिकाओं को चाहिये कि वे
रानियों के माल्य, अनुलेपन और वस्त्र लेकर राजा से निवेदन करे कि उस रानी ने यह भेजा
है॥ ५६ ॥
तदादाय राजा निर्माल्यमासां प्रतिप्राभृतकं दद्यात् ॥ ५७ ॥
राजा उन वस्तुओं को लेकर, अपनी धारण की गयी वस्तु को उन उन रानियों के पास भेज
दें, जिन्होंने माल्यादि भिजवाये थे॥ ५७ ॥
अलंकृतश्च स्वलंकृतानि चापराह्ने सर्वाण्यन्तःपुराण्यैकध्येन पश्येत् ॥ ५८ ॥
स्वयं सज संवरकर राजा अपराह्नकाल में शृङ्गारित एवं वस्त्राभूषणों से अलंकृत रानियों
का सहसा अवलोकन करे॥ ५८ ॥
तासां यथाकालं यथार्हं च स्थानमानानुवृत्तिः सपरिहासाश्च कथाः
कुर्यात् ॥ ५९ ॥
मिलन की व्यवस्था—राजा अवस्था और योग्यता के अनुरूप उनके साथ मिलन करे,
उनका सम्मान करे और हास-परिहास एवं कथावार्ताएँ भी करे॥ ५९ ॥
तदनन्तरं पुनर्भूवस्तथैव पश्येत् ॥ ६० ॥
तत्पश्चात् पुनर्भू स्त्रियों के साथ भी इसी प्रकार का आचरण करे॥ ६०॥
ततो वेश्या आभ्यन्तरिका नाटकीयाश्च ॥ ६१ ॥
तदनन्तर अन्तपुर में रहने वाली एकनिष्ठ वेश्याओं और रङ्गमञ्च की अभिनेत्रियों का
अवलोकन करे॥ ६१॥
तासां यथोक्तकक्षाणि स्थानानि ॥ ६२ ॥
इनके स्थान भी पूर्वोक्त कक्षाओं में ही होने चाहिये॥ ६२ ॥
वासकपाल्यस्तु यस्या वासको यस्याश्चातीतो यस्याश्च ऋतुस्तत्परिचारिकानु-
गता दिवा शय्योत्थितस्य राज्ञस्ताभ्यां प्रहितमङ्गुलियकाङ्कमनुलेपनमृतुं वासकं च
निवेदयेयुः ॥ ६३ ॥
सम्भोग के लिये निवेदन-व्यवस्था—वासकपाली (अन्तःपुर में राजा के भोगविलास
का प्रबन्ध करने वाली) को चाहिये कि जिस अन्तःपुरिका की सम्भोग की पारी हो, जिसकी
पारी किसी कारणवश निकल गयी हो, और ऋतुमती हुई हो, उन सबकी परिचारिकाओं को
साथ लेकर, दिन में भोजन के पश्चात् राजा के सोकर उठने पर, उन उन रानियों द्वारा भेजी गयी
नामांकित अँगूठी, कुंकुम के अनुलेपन तथा वासक भेंट करें॥ ६३॥