वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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में सम्भोग के लिये उसका शृङ्गार एवं शयनव्यवस्था इस तरह प्रयत्नपूर्वक करा दे जिससे उन
दोनों को यह पता चले कि यह सम्पादन उसी ने किया है। यदि कनिष्ठा सौभाग्यवश
अनादरपूर्वक बोले या मान दिखाये तो उसे कदापि सहन न करे ॥ ४ ॥
भर्तारि प्रमाद्यन्तीमुपेक्षेत। यत्र मन्येत्तार्थमियं स्वयमपि प्रतिपत्स्यत इति
तत्रैनामादरत एवानुशिष्यात् ॥ ५ ॥
पतिविषयक प्रमाद पर उपेक्षा—यदि कनिष्ठा पतिविषयक कोई प्रमाद करे तो उसकी
उपेक्षा कर दे। यदि यह समझे कि पति को प्राप्त करने के लिये यह स्वयं ही संभल जायेगी तो
उसे आदरपूर्वक स्वयं समझा दे ॥ ५ ॥
नायकसम्भवे च रहसि विशेषानधिकान् दर्शयेत् ॥ ६ ॥
वैशिष्ट्यप्रदर्शन—ऐसे एकान्त में उसे कामकला की शिक्षा दे जहाँ से पति भी सुन
सके ॥ ६ ॥
तदपत्येष्वविशेषः। परिजनवर्गेऽधिकानुकम्पा। मित्रवर्गे प्रीतिः। आत्मज्ञातिषु
नात्यादरः। तज्ज्ञातिषु चातिसम्भ्रमः ॥ ७ ॥
सन्तति, परिजन एवं पुरजनों से प्रेम—कनिष्ठा के बच्चों से अत्यधिक प्रेम करे, उसके
परिजनों (सेवकों) पर अनुग्रह रखे, उसकी सखियों से प्रीति रखे और उसके भाई-भतीजों को
अपनों से अधिक आदर दे ॥ ७ ॥
बह्वीभिस्त्वधिविन्ना अव्यवहितया संसृज्येत् ॥ ८ ॥
कई सपत्नियों में द्वितीय से संसर्ग—यदि कई सपत्नयाँ हों, तो ज्येष्ठा को अपने से
दूसरी के साथ संसर्ग रखना चाहिये ॥ ८ ॥
यां तु नायकोऽधिकां चिकीर्षेत्तां भूतपूर्वसुभगया प्रोत्साह्य कलहयेत् ॥ ९ ॥
कलह की योजना—पति जिस (नवप्रिया) पत्नी को अब सर्वाधिक प्रेम करता हो,
उसके साथ उस (पूर्वप्रिया) पत्नी को भड़काकर लड़वा दे जिसे पति पहले सर्वाधिक प्रेम
करता था ॥ ९ ॥
ततश्चानुकम्पेत ॥ १० ॥
तत्पश्चात् कलह बढ़ाने के लिये नवोढ़ा को आश्वासन दे दे ॥ १० ॥
ताभिरेकत्वेनाधिकां चिकीर्षितां स्वयमविवदमाना दुर्जनीकुर्यात् ॥ ११ ॥
पतिप्रिया की निकृष्टता-सिद्धि—यदि पति किसी पत्नी को अधिक प्रेम और महत्त्व
देना चाहे, तो ज्येष्ठा को चाहिये कि स्वयं विवाद में न पड़ते हुए, उसे अन्य सपत्नियों से लड़ा-
लड़ाकर निकृष्ट (दुष्ट) सिद्ध करा दे ॥ ११ ॥
नायकेन तु कलहितामेनां पक्षपातावलम्बनोपबृंहितामाश्वासयेत् ॥ १२ ॥
कलहकारिणी को आश्वासन—जब पति का नवप्रिया से कलह हो जाये, और वह
पति को रूक्ष वचन कह दे, तो उसे आश्वासन दे दे ॥ १२ ॥
कलहं च वर्धयेत् ॥ १३ ॥
कलहवर्धन—ज्येष्ठा को चाहिये कि सपत्नियों में कलह बढ़ाती रहे ॥ १३ ॥