वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३० वात्स्यायन-कामसूत्र
प्रकट कर दिया हो, जिसका स्नेह सद्भाव प्रकट हो चुका हो, उसकी वस्तुओं का उपभोग प्रेमी
करे और प्रेमी की वस्तुओं का उपभोग वह स्वयं करे अर्थात् प्रेमी और प्रेमिका एक दूसरे की
वस्तुओं को उपभोग करें ॥ २० ॥
तत्र महार्हगन्धमुत्तरीयं कुसुमं स्यादङ्गुलीयकं च। तद्धस्ताद् गृहीतताम्बूलया
गोष्ठीगमनोद्यतस्य केशहस्तपुष्पयाचनम् ॥ २१ ॥
उपभोग की वस्तुओं का आदान-प्रदान प्रारम्भ होने पर नायक, नायिका से बहुमूल्य
सुगन्धित वस्तु (इत्र या सेंट), उत्तरीय (शाल या दुपट्टा), पुष्प और अँगूठी ग्रहण कर ले। जब
वह अपने हाथ से पान खा ले, तो गोष्ठी में जाने के लिये तैयार होकर उसके केशपाश (जूड़े)
में खोंसे गये सुगन्धित फूल (गजरा) माँगे ॥ २१ ॥
तत्र महार्हगन्धं स्पृहणीयं स्वनखदशनपदचिह्नितं साकारं दद्यात् ॥ २२ ॥
जब नायक बहुमूल्य सुगन्धित वस्तु (इत्र आदि) व अन्य मनोवांछित वस्तुएँ नायिका को
दे, तो उन पर अपने नखों एवं दाँतों के चिह्न अङ्कित कर दे ॥ २२ ॥
अधिकैरधिकैश्चाभियोगैः साध्वसविच्छेदनम् ॥ २३ ॥
नायक को चाहिये कि उत्तरोत्तर अधिकाधिक उपाय करता हुआ उसके भय को दूर कर
दे ॥ २३ ॥
क्रमेण च विविक्तदेशे गमनमालिङ्गनं चुम्बनं ताम्बूलस्य ग्रहणं दानान्ते
द्रव्याणां परिवर्तनं गुह्यदेशाभिमर्शनं चेत्यभियोगाः ॥ २४ ॥
आन्तरिक अभियोग—क्रमशः एकान्त में मिलना, आलिङ्गन, चुम्बन, पान लेना और
देना, वस्तुओं का परिवर्तन और नायिका के गुह्याङ्गों का स्पर्श—ये अभियोग होने
चाहिये ॥ २४ ॥
यत्र चैकाभियुक्ता न तत्रापरामभियुञ्जीत ॥ २५ ॥
अभियोगहेतु अनुपयुक्त स्थल—जिस स्थान पर एक परकीया से मिलन हो चुका हो,
उस स्थान पर दूसरी परकीया से नहीं मिलना चाहिये ॥ २५ ॥
तत्र या वृद्धानुभूतविषया प्रियोपग्रहैश्च तामुपगृह्णीयात् ॥ २६ ॥
गृहस्वामिनी की अनुकूलता अनिवार्य—जहाँ परकीया के साथ रमण करना हो, वहाँ
यदि कोई खेली खायी वृद्धा हो, तो दे दिलाकर उसे अवश्य अनुकूल बना लेना चाहिये ॥ २६ ॥
श्लोकावत्र भवतः—
अन्यत्र दृष्टसञ्चारस्तद्भर्ता यत्र नायकः।
न तत्र योषितं काञ्चित् सुप्रापामपि लङ्घयेत् ॥ २७ ॥
अनुपयुक्त घर—जिस घर में नायिका के पति ने किसी अन्य स्त्री का व्यभिचार देखा या
सुना हो, वहाँ सरलता से प्राप्त होने वाली किसी स्त्री के साथ भी नहीं मिलना चाहिये ॥ २७ ॥
शङ्कितां रक्षितां भीतां सश्वश्रूकां च योषितम्।
न तर्कयेत मेधावी जानन् प्रत्ययमात्मनः ॥ २८ ॥