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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 248 में से

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पृष्ठ 146

१२० वात्स्यायन-कामसूत्र
अनुकूलवृत्ति से प्रसादन—वनविहार (पिकनिक), भोगविलास, वस्त्राभूषणदान, भाई
'भतीजों का स्वागत-सत्कार और ऐकान्तिक प्रेमक्रीड़ा—इनके द्वारा एक एक का स्वतन्त्र
अनुरञ्जन करे ॥ ७१ ॥
युवतिश्च जितक्रोधा यथाशास्त्रप्रवर्तिनी ।
करोति वश्यं भर्तारं सपत्नीश्चाधितिष्ठति ॥ ७२ ॥
अधिकरण के अनुष्ठान का फल—जो युवती अपने क्रोध को नियन्त्रित करके शास्त्र
के अनुसार आचरण करती है, वह अपने पति को वशीभूत करके सभी सपत्नियों में श्रेष्ठ पद प्राप्त
कर लेती है ॥ ७२ ॥
ज्येष्ठादिवृत्तप्रकरण नामक द्वितीय अध्याय सम्पन्न ॥
●
५.
पारदारिक नामक पञ्चम अधिकरण
प्रथम अध्याय
स्त्रीपुरुषशीलावस्थापनप्रकरण
व्याख्यातकारणाः परपरिग्रहोपगमाः ॥ १ ॥
प्रकरणशुद्धि का स्मरण—परकीया के साथ सम्बन्ध स्थापित करने के कारण पहले ही
(नायिकाविमर्श में) दिये जा चुके हैं ॥ १ ॥
तेषु साध्यत्वमनत्ययं गम्यत्वमायतिं वृत्तिं चादित एव परीक्षेत ॥ २ ॥
परकीयागमन से पूर्व विचारणीय बातें—परकीया से सम्बन्ध स्थापित करने से पहले
इन बातों का भलीप्रकार विचार कर लेना चाहिये—अभीष्ट स्त्री मुझे प्राप्त हो सकेगी या नहीं ?
उसे प्राप्त करने में प्राणों का सङ्कट तो उपस्थित नहीं हो जायेगा ? वह गमन के योग्य है या नहीं ?
उससे सम्बन्ध स्थापित हो जाने के पश्चात् मेरा प्रभाव कैसा होगा ? मुझे सम्बन्ध रखने से क्या
लाभ होगा ? ॥ २ ॥
यदा तु स्थानात्स्थानान्तरं कामं प्रतिपद्यमानं पश्येत्तदात्मशरीरोपघातत्राणार्थं
परपरिग्रहानभ्युपगच्छेत् ॥ ३ ॥
प्रमुखतम कारण—जब एक अवस्था से दूसरी अवस्था में बढ़ते हुए काम को देखे,
और यह समझ ले कि इस स्त्री के विना मैं रह नहीं सकता, तो प्राणरक्षा के लिये परकीया के
साथ भी गमन करे ॥ ३ ॥
दश तु कामस्य स्थानानि ॥ ४ ॥
दश कामदशाएँ—व्यवहार के लिये काम की दश दशाएँ हैं ॥ ४ ॥