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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 248 में से

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पृष्ठ 138

११२ वात्स्यायन-कामसूत्र
प्रोषितपतिका के ही रूप में दिखे; उसकी वापसी पर पत्नी देवपूजन करे और भेंट चढ़ाये। यह
प्रवासचर्या पूर्ण हुई ॥ ४० ॥
भवतश्चात्र श्लोकौ—
तद्वृत्तमनुवर्तेत नायकस्य हितैषिणी।
कुलयोषा पुनर्भूवार् वेश्या वाप्येकचारिणी ॥
धर्ममर्थं तथा कामं लभन्ते स्थानमेव च।
निःसपत्नं च भर्तारं नार्यः सद्वृत्तमाश्रिताः ॥ ४८ ॥
इस विषय में दो आनुवंश्य श्लोक प्राप्त होते हैं—
एकचारिणी भार्या का चाहे वह कुलवधू हो, पुनर्भू हो अथवा वेश्या हो, यह कर्तव्य है कि
वह अपने पति की हितैषिणी बनकर सदाचार का पालन करे। स्त्रियाँ सदाचार पर चलकर ही
धर्म, अर्थ, काम, प्रतिष्ठा और सपत्नी (सौत) विहीन पति प्राप्त करती हैं ॥ ४८ ॥
एकचारिणीवृत्त प्रकरण नामक प्रथम अध्याय सम्पन्न ॥
द्वितीय अध्याय
ज्येष्ठादिवृत्तप्रकरण
जाड्यदौःशील्यदौर्भाग्येभ्यः प्रजानुत्पत्तेराभीक्ष्ण्येन दारिकोत्पत्तेर्नायक-
चापलाद्वा सपत्न्यधिवेदनम् ॥ १ ॥
द्वितीय विवाह का कारण—मूर्खता, चरित्रहीनता, दुर्भाग्य, सन्तानहीनता, बार बार
लड़कियों का उत्पन्न होना या पति की चञ्चलता के कारण पत्नी को सपत्नी की वेदना भोगनी
पड़ती है ॥ १ ॥
तदादित एव भक्तिशीलवैदग्ध्यख्यापनेन परिजिहीर्षेत्। प्रजानुत्पत्तौ च
स्वयमेव सापत्नके चोदयेत् ॥ २ ॥
विदग्ध भार्या का कर्तव्य—भार्या को चाहिये कि वह प्रारम्भ से ही पतिभक्ति,
सच्चरित्रता और विदग्धता का आचरण कर पति को दूसरा विवाह करने का अवसर ही न दे।
यदि सन्तान उत्पन्न न हो, तो स्वयं ही पति को दूसरा विवाह करने के लिये प्रेरित करे ॥ २ ॥
अधिविद्यमाना च यावच्छक्तियोगादात्मनोऽधिकत्वे स्थितिं कारयेत् ॥ ३ ॥
ज्येष्ठा का दायित्व—ज्येष्ठा को चाहिये कि अपने को यथाशक्ति अधिक हो बनाकर रखे
अर्थात् अपनी स्थिति को सुदृढ़ बनाये ॥ ३ ॥
आगतां चैनां भगिनीवदीक्षेत। नायकविदितं च प्रादोषिकं विधिमतीव
यत्नादस्याः कारयेत्। सौभाग्यजं वैकृतमुत्सेकं वास्या नाद्रियेत ॥ ४ ॥
कनिष्ठा के साथ व्यवहार—नवपरिणीता को अपनी बहिन के समान समझे। प्रथम रात्रि