वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२६ वात्स्यायन-कामसूत्र
ज्ञातिकुलनित्या। विपन्नापत्या। गोष्ठीयोजिनी। प्रीतियोजिनी। कुशीलव-
भार्या। मृतपतिका बाला। दरिद्रा बहुपभोगा। ज्येष्ठभार्या बहुदेवरका। बहुमानिनी
न्यूनभर्तृका। कौशलाभिमानिनी भर्तृमौर्ख्येणोद्विग्ना। अविशेषतया लोभेन ॥ ५३ ॥
जो सदैव पितृगृह में ही रहती हो, जिसके बच्चे होकर मर जाते हों, जिसे गप्पें मारने में
रुचि हो, जो सबसे मित्रता जोड़ती फिरती हो, नृत्यनाट्य करने वालों की स्त्रियाँ, बालविधवा,
दरिद्र होकर भी भोगविलासों की आकांक्षा रखने वाली, अनेक देवरों वाली, जो अपने रूप गुण
के अभिमान में पति को हीन मानने वाली हो, जो अपने कलाकौशल का अत्यधिक अभिमान
रखती हो और पति की मूर्खता से पीड़ित हो तथा जो पति पर मुग्ध न होकर किसी अन्य को
चाहती हो ॥ ५३ ॥
कन्याकाले यत्नेन वारिता कथञ्चिदलभ्याभियुक्ता च सा तदानीम्। समान-
बुद्धिशीलमेधाप्रतिपत्तिसात्म्या। प्रकृत्या पक्षपातिनी। अनपराधे विमानिता।
तुल्यरूपाभिश्चाधः कृता। प्रोषितपतिकेति। ईर्ष्यालुपूतिचोक्षकलीबदीर्घसूत्रका-
पुरुषकुब्जवामनविरूपमणिकारग्राम्यदुर्गन्धिरोगिवृद्धभार्याश्चेति ॥ ५४ ॥
जिसे मनोवाञ्छित पति न मिला हो, जिसकी बुद्धि शील मेधा और प्रतिपत्ति नायक के
समान हो, जो स्वभावतः पक्षपात रखती हो, जो निरपराध होकर भी अपमानित की गयी हो, जो
समानता रखने वाली सपत्नियों द्वारा अपमानित की गयी हो, जिसका पति विदेश गया हुआ हो,
जिसका पति प्रेम न रखकर ईर्ष्या करता हो, जिसका पति मलिन या निम्न जाति का हो, नपुंसक
हो, आलसी हो, कायर हो, कुबड़ा हो, बौना हो, कुरूप हो, जौहरी हो, गँवार हो, रोगी हो,
दुर्गन्ध वाला हो और बुड्ढा हो—ऐसी स्त्रियाँ प्रायः व्यभिचारिणी बन जाती हैं ॥ ५४ ॥
श्लोकावत्र भवतः—
इच्छा स्वभावतो जाता क्रियया परिवृंहिता।
बुद्ध्या संशोधितोद्वेगा स्थिरा स्यादनपायिनी ॥ ५५ ॥
उपसंहार—इस विषय में दो आनुवंश्य श्लोक उद्धृत करते हैं—
पुरुष सुन्दर स्त्री को चाहता है और स्त्री सुन्दर पुरुष को—यह इच्छा स्वभावतः उत्पन्न
होती है। ये सहज कामनाएँ परिचय और अभियोगों द्वारा बढ़ायी जा सकती हैं और बुद्धि से
उद्वेगों का संशोधन कर इस प्रकार की कामनाएँ स्थायी बनायी जा सकती हैं ॥ ५५ ॥
सिद्धतामात्मनो ज्ञात्वा लिङ्गान्यनुन्नीय योषिताम्।
व्यावत्तिकारणोच्छेदी नरो योषित्सु सिध्यति ॥ ५६ ॥
अपनी सफलता को जानकर, स्त्री के सङ्केतों एवं चेष्टाओं का अनुमान करके,
अतिपरिचय, अनुराग आदि से प्रतिबन्धकों को दूर करके पुरुष परकीया स्त्रियों को सिद्ध करने
में सफल हो जाता है ॥ ५६ ॥
स्त्री-पुरुषशीलावस्थापन प्रकरण नामक प्रथम अध्याय सम्पन्न ॥