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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 248 में से

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पृष्ठ 153

५. पारदारिक अधिकरण १२७
द्वितीय अध्याय
परिचयकारणाभियोगप्रकरण
यथा कन्या स्वयमभियोगसाध्या न तथा दूत्या। परस्त्रियस्तु सूक्ष्मभावा
दूतीसाध्या न तथात्मनेत्याचार्याः ॥ १ ॥
जिस प्रकार कन्या स्वयं अपने उपायों से सिद्ध की जा सकती है, उस तरह दूती द्वारा
नहीं। सूक्ष्म भावों से सम्पन्न परकीया जिस प्रकार दूती द्वारा सिद्ध की जा सकती है, उस तरह
अपने उपायों से नहीं—यह कामशास्त्र के आचार्यों का मत है ॥ १ ॥
सर्वत्र शक्तिविषये स्वयं साधनमुपपन्नतरकं दुरुपपादत्वात्तस्य दूतीप्रयोग इति
वात्स्यायनः ॥ २ ॥
यदि सम्भव हो, तो सर्वत्र स्वयं उपाय करना दूती की अपेक्षा श्रेष्ठ है। यदि स्वयं उपाय
करना सम्भव न हो, तो दूती का प्रयोग करना चाहिये—यह आचार्य वात्स्यायन का मत
है ॥ २ ॥
प्रथमसाहसा अनियन्त्रणसम्भाषाश्च स्वयं प्रतार्याः। तद्विपरीताश्च दूत्येति
प्रायोवादः ॥ ३ ॥
जिस स्त्री का चरित्र प्रथम बार खण्डित हुआ हो और जिससे स्वयं बात की जा सकती
हो, उसे स्वयं ही सिद्ध कर लेना चाहिये। इसके विपरीत, यदि नायिका का चरित्र अनेक बार
खण्डित हो चुका हो और उससे वार्तालाप सम्भव न हो, तो उसे दूती के माध्यम से सिद्ध करना
चाहिये ॥ ३ ॥
स्वयमभियोक्ष्यमाणस्त्वादावेव परिचयं कुर्यात् ॥ ४ ॥
यदि नायक स्वयं उपाय करना चाहे, तो पहले नायिका से परिचय करे, सम्बन्ध बढ़ाये।
परिचय का आशय है भली प्रकार दर्शन, भेंट या जान-पहचान। यह स्वयं भी हो सकता है और
दूती के माध्यम से भी ॥ ४ ॥
तस्याः स्वाभाविकं दर्शनं प्रायत्नकं च ॥ ५ ॥
दर्शनभेद—दर्शन दो प्रकार का होता है—स्वाभाविक और प्रायत्निक। जो दर्शन सहज
भाव से हो, वह स्वाभाविक है और जो उपायों द्वारा सम्भव हो, वह प्रायत्निक है ॥ ५ ॥
स्वाभाविकमात्मनो भवनसन्निकर्षे प्रायत्निकं मित्रज्ञातिमहामात्रवैद्यभवन-
सन्निकर्षे विवाहयज्ञोत्सवव्यसनोद्यानगमनादिषु ॥ ६ ॥
अपने भवन के निकट आती-जाती नायिका को देख लेना स्वाभाविक दर्शन है। मित्र,
जाति, महामन्त्री और वैद्य के घर के निकट अथवा विवाह, उत्सव, यज्ञ, दुःख (सङ्कट),
वनविहार (पिकनिक) आदि में देखना प्रायत्निक है ॥ ६ ॥
दर्शने चास्याः सततं साकारं प्रेक्षणं केशसंयमनं नखाच्छुरणमाभरणप्रह्लादन-
मधरौष्ठविमर्दनं तास्ताश्च लीला वयस्यैः सह प्रेक्षमाणायास्तत्सम्बद्धाः परापदे-
शिन्यश्च कथास्त्यागोपभोगप्रकाशनं सख्युरुत्सङ्गनिषण्णस्य साङ्गभङ्गं जृम्भण-