वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२८ वात्स्यायन-कामसूत्र
मेकभ्रूक्षेपणं मन्दवाक्यता तद्वाक्यश्रवणं तामुद्दिश्य बालेनान्यजनेन वा सहान्यो-
पदिष्टा द्व्यर्था कथा तस्यां स्वयं मनोरथावेदनमन्यापदेशेन तामेवोद्दिश्य
बालचुम्बनमालिङ्गनं च जिह्वया चास्य ताम्बूलदानं प्रदेशिन्या हनुदेशघट्टनं
तत्तद्यथायोगं यथावकाशं च प्रयोक्तव्यम् ॥ ७ ॥
बाह्य परिचय—नायिका का दर्शन मुख और नेत्रों की भावसूचक चेष्टाओं के साथ ही
करना चाहिये। उसे देखते समय बार बार अपने बालों को ठीक करे या सहलाये, नखों से
खुजाये, आभूषणों को ठीक करे, अपने अधर को मसले और अपने समवयस्क मित्रों के साथ
उसके देखते हुए ही उन उन लीलाओं को करे। अन्य के बहाने उसकी बात करे, अपनी
त्यागशीलता और भोगविलासों को प्रकट करे, मित्र की गोद में लेटकर अँगड़ाई और जम्हाई
लेता हुआ उसकी ओर भौंहें नचाये। धीरे से बोले और उसकी बातें सुनने का प्रयत्न करे। उसको
लक्ष्य करके बालक का चुम्बन और आलिङ्गन करे, बालक को जीभ से पान दे, तर्जनी अंगुलि
से उसके कपोलों को गुदगुदाये। समय और स्थान देखकर इन योगों में जिनका प्रयोग कर सके,
उनका प्रयोग करे ॥ ७ ॥
तस्याश्चाङ्कगतस्य बालस्य लालनं बालक्रीडनकानां चास्य दानं ग्रहणं तेन
सन्निकृष्टत्वात्कथायोजनं तत्संभाषणक्षमेण जनेन च प्रीतिमासाद्य कार्यं तदनुबन्धं च
गमनागमनस्य योजनं संश्रये चास्यास्तामपश्यतो नाम कामसूत्रसङ्कथा ॥ ८ ॥
नायिका की गोद में बैठे बालक को प्यार करे, उसे खेलने के लिये खिलौने दे और फिर
उन्हें ले ले। पास आकर उससे बातें करे। जो व्यक्ति उस नायिका से बातें कर सकता हो, उससे
सम्बन्ध स्थापित कर ले और अपना प्रयोजन सिद्ध करने का प्रयास करे। किसी काम का बहाना
निकालकर नायिका के घर आवागमन प्रारम्भ कर दे। एकान्त में बैठकर कामसूत्र की ऐसी
कथा-वार्ताएँ करे जिन्हें नायिका सुन सके, किन्तु यह न समझ पाये कि यह मुझे देखकर या
लक्ष्य कर ही ये रससिक्त कथा-वार्ताएँ कर रहा है ॥ ८ ॥
प्रसूते तु परिचये तस्या हस्ते न्यासं निक्षेपं च निदध्यात्। तत्प्रतिदिनं प्रतिक्षणं
चैकदेशतो गृह्णीयात्। सौगन्धिकं पूगफलानि च ॥ ९ ॥
आभ्यन्तर परिचय—परिचय बढ़ जाने पर उस नायिका के हाथ में न्यास और निक्षेप
कर दे। तत्पश्चात् प्रतिदिन या प्रतिक्षण अंशरूप में उससे ग्रहण करता चले। इत्र, सुपारी आदि
वस्तुएँ प्रतिदिन दी जाती हैं ॥ ९ ॥
तामात्मनो दारैः सह विस्रम्भगोष्ठ्यां विविक्तासने च योजयेत् ॥ १० ॥
उसे अपने घर की स्त्रियों के साथ एकान्त में वार्तालाप और खान पान में लगा दे ॥ १० ॥
नित्यदर्शनार्थं विश्वासनार्थं च ॥ ११ ॥
सदैव ऐसे प्रयत्न करे कि नायिका प्रतिदिन दीखती रहे तथा प्रेम और विश्वास बढ़ता
रहे ॥ ११ ॥
सुवर्णकारमणिकारवैकटिकनीलीकुसुम्भरञ्जकादिषु च कामार्थिन्यां
सहात्मनो वश्यैश्चैषां तत्सम्पादने स्वयं प्रयतेत ॥ १२ ॥