वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५. पारदारिक अधिकरण १२३
गमिष्यतीत्यनायतिरन्यत्र प्रसक्तमतिरिति च ॥ २५ ॥
अनिश्चतता की सम्भावना—यह पुरुष किसी अन्य से प्रेम कर लेगा अथवा किसी
अन्य से भी प्रेम कर रहा है—यह सोचकर भी स्वयं पीछे हट जाती है ॥ २५ ॥
असंवृत्ताकार इत्युद्वेगः ॥ २६ ॥
रहस्योद्घाटन का भय—यह पुरुष मेरा रहस्य प्रकट कर देगा—इस भय से भी स्वयं
पीछे हट जाती है ॥ २६ ॥
मित्रेषु निसृष्टभाव इति तेष्वपेक्षा ॥ २७ ॥
मित्रों का यथोक्तकारी—यह मित्रों से अपनी प्रत्येक बात बता देता है और उनके
परामर्श से ही कार्य करता है—यह जानकर भी स्वयं पीछे हट जाती है ॥ २७ ॥
शुष्काभियोगीत्याशङ्का ॥ २८ ॥
निरर्थक उपायों की आशङ्का—यह मात्र केवल अभियोग करता है—इस आशङ्का से
भी स्वयं पीछे हट जाती है ॥ २८ ॥
तेजस्वीति साध्वसम् ॥ २९ ॥
तेजस्विता का भय—यह तेजस्वी (प्रभावशाली) व्यक्ति है—इस भय से भी स्वयं पीछे
हट जाती है ॥ २९ ॥
चण्डवेगः समर्थो वेति भयं मृग्याः ॥ ३० ॥
प्रचण्ड काम की शङ्का—मृगी (छोटी योनि वाली) स्त्री, पुरुष को चण्डवेग और अश्व
जाति का समझकर भी भयभीत हो उठती है ॥ ३० ॥
नागरकः कलासु विचक्षण इति व्रीडा ॥ ३१ ॥
कलानिष्णात्त से सङ्कोच—यह रसिक है, कलाओं में निष्णात है और मैं अविदग्ध
(ग्रामीण)—इस सङ्कोच से भी स्त्री परपुरुष से विमुख हो जाती है ॥ ३१ ॥
सखित्वेनोपचरित इति च ॥ ३२ ॥
पुरातन मैत्रीभाव—मैंने अब तक इसके साथ मैत्री सम्बन्ध निभाया है—यह भाव भी
स्त्री को परपुरुष में प्रवृत्त होने से रोकता है ॥ ३२ ॥
अदेशकालज्ञ इत्यसूया ॥ ३३ ॥
नायक की विवेकहीनता—यह देश और काल को नहीं समझता—इस घृणा से भी
अपनी इच्छा छोड़ देती है ॥ ३३ ॥
परिभवस्थानमित्यबहुमानः ॥ ३४ ॥
निन्द्य से बचना—यह निन्दा का पात्र है—ऐसा समझकर उसका अनादर कर
देती है ॥ ३४ ॥
आकारितोऽपि नावबुध्यत इत्यवज्ञा ॥ ३५ ॥
अविदग्ध से दूरी—यह पुरुष सङ्केत को नहीं समझता, अतः अविदग्ध (मूर्ख) है—यह
जानकर भी उसकी अवज्ञा कर देती है ॥ ३५ ॥
काम० १० शशो मन्दवेग इति च हस्तिन्याः ॥ ३६ ॥