वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५. पारदारिक अधिकरण १२१
चक्षुःप्रीतिर्मनःसङ्गः सङ्कल्पोत्पत्तिर्निद्राच्छेदस्तनुता विषयेभ्यो व्यावृति-
र्लज्जाप्रणाश उन्मादो मूर्च्छा मरणमिति तेषां लिङ्गानि ॥ ५ ॥
कामदशाओं का क्रमशः वर्णन—नेत्रों में प्रेम का छलक उठना, चित्त का आसक्त
होना, प्राप्ति का संकल्प उत्पन्न होना, नींद का उड़ जाना, दुर्बल होते जाना, चित्त का विषयों से
हट जाना, लज्जा का नष्ट हो जाना, उन्माद, मूर्च्छा आना और मृत्यु—ये कामदशाओं के
परिचायक हैं ॥ ५ ॥
तत्राकृतितो लक्षणतश्च युवत्याः शीलं सत्यं शौचं साध्यतां चण्डवेगतां च
लक्षयेदित्याचार्याः ॥ ६ ॥
शीलादि की परीक्षा—कामशास्त्र के आचार्यों का मत है कि परकीया से सम्बन्ध
स्थापित करने से पूर्व उसकी आकृति और लक्षणों से युवती के शील, सत्य, शौच, साध्यता और
चण्डवेगता का भलीभाँति परीक्षण कर लेना चाहिये ॥ ६ ॥
व्यभिचारादाकृतिलक्षणयोगानामिङ्गिताकाराभ्यामेव प्रवृत्तिर्बोद्धव्या योषित
इति वात्स्यायनः ॥ ७ ॥
वात्स्यायन का अभिमत—स्त्री के शरीर और उसके विभिन्न अंगों पर जो चिह्नादि देखे
जाते हैं, उनसे स्त्री के शीलादि का पता नहीं चलता, अतएव सङ्केत और चेष्टाओं से ही उसकी
प्रवृत्ति समझनी चाहिये ॥ ७ ॥
यं कञ्चिदुज्ज्वलं पुरुषं दृष्ट्वा स्त्री कामयते। तथा पुरुषोऽपि योषितम्।
अपेक्षया तु न प्रवर्तते इति गोणिकापुत्रः ॥ ८ ॥
गोणिकापुत्र का मत—किसी भी उज्ज्वल वर्ण-वेश वाले पुरुष को देखकर स्त्रियाँ
अनुरक्त हो जाती हैं। इसी प्रकार पुरुष भी उज्ज्वल वर्ण-वेश वाली युवती को देखकर आसक्त
हो जाते हैं, किन्तु कारणवश परस्पर अनुरक्त होते हुए भी एक-दूसरे में प्रवृत्त नहीं हो पाते ॥ ८ ॥
तत्र स्त्रियं प्रति विशेषः ॥ ९ ॥
स्त्री में अनुराग का आधिक्य—यद्यपि स्त्री और पुरुष, दोनों में ही अन्य पर अनुरक्त
होने की भावना मिलती है, किन्तु स्त्रियों में परपुरुष पर आसक्ति अधिक देखी जाती है ॥ ९ ॥
न स्त्री धर्ममधर्मं चापेक्षते कामयत एव। कार्यापेक्षया तु नाभियुङ्क्ते ॥ १० ॥
स्त्री-स्वभाव की विशेषता—स्त्री धर्म-अधर्म की चिन्ता नहीं करती, वह केवल
कामना करती है, किन्तु मिलन में दोष देखकर वह फिर नहीं मिलती ॥ १० ॥
स्वभावाच्च पुरुषेणाभियुज्यमाना चिकीर्षयन्त्यपि व्यावर्तते ॥ ११ ॥
स्वतः हटने की प्रवृत्ति—पुरुष द्वारा मिलन का उपाय करने पर और स्वयं चाहने पर भी
वह स्वतः पीछे हट जाती है ॥ ११ ॥
पुनःपुनरभियुक्ता सिध्यति ॥ १२ ॥
बार-बार प्रयत्न से सिद्धि—पुरुष के बार-बार अभियोग करने पर ही वह उससे
सम्बन्ध स्थापित करती है ॥ १२ ॥
पुरुषस्तु धर्मस्थितिमार्यसमयं चापेक्ष्य कामयमानोऽपि व्यावर्तते ॥ १३ ॥