वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४. भार्याधिकारिक अधिकरण १११
तत्र राजा यद् गृह्णीयात्तस्या वासकमाज्ञापयेत् ॥ ६४ ॥
इनमें से राजा जिसके प्रतीक को स्वीकार कर लें, उसी की परिचारिका को यह सूचना दे
दी जाये कि आज राजा शयनकक्ष में रतिविलास हेतु पधारेंगे ॥ ६४ ॥
उत्सवेषु च सर्वांसामनुरूपेण पूजापानाकं च। सङ्गीतदर्शनेषु च॥ ६५ ॥
उत्सवों में सम्मान—अन्तःपुर में आयोजित होने वाले उत्सवों में, राजा कुल और
अवस्था के अनुरूप सभी का सम्मान करें और मद्यपान की व्यवस्था करें। सङ्गीतगोष्ठियों में भी
यही व्यवस्था होनी चाहिये ॥ ६५ ॥
अन्तःपुरचारिणीनां बहिरनिष्क्रमो बाह्यानां चाप्रवेशः। अन्यत्र विदितशौचा-
भ्यः। अपरिक्लिष्टश्च कर्मयोग इत्यान्तःपुरिकम् ॥ ६६ ॥
आवागमन नियन्त्रित—अन्तःपुरिकाओं को बाहर न निकलने दिया जाये और सन्दिग्ध
चरित्र वाले स्त्री-पुरुषों को अन्तःपुर में प्रवेश न करने दिया जाये। जिनके पवित्र आचरण की
परीक्षा कर ली गयी है, वे भले ही अन्तःपुर में चले जायें। रानियों के साथ राजा पवित्रता और
कलात्मकता से ही सम्भोग करें। इस प्रकार आन्तःपुरिकवृत्त पूर्ण हुआ ॥ ६६ ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
पुरुषस्तु बहून् दारान् समाहृत्य समो भवेत्।
न चावज्ञां चरेदासु व्यलीकान्न सहेत च ॥ ६७ ॥
बहुत पत्नियों के साथ सामान्य व्यवहार—इस विषय में कुछ आनुवंश्य श्लोक उद्धृत
करते हैं—
जो पुरुष कई पत्नियों का स्वामी हो, उसे चाहिये कि सबके साथ समान व्यवहार करे।
न कभी किसी की अवज्ञा करे और न कभी किसी के अपराध को ही सहन करे ॥ ६७ ॥
एकस्यां या रतिक्रीडा वैकृतं वा शरीरजम्।
विस्रम्भाद्वाप्युपालम्भास्तमन्यासु न कीर्तयेत् ॥ ६८ ॥
उसे एक पत्नी के साथ की गयी कलात्मक रतिक्रीड़ा या शरीरजन्य विकारों को, विश्वास
में आकर या उपालम्भ के माध्यम से, अन्य पत्नी से कदापि नहीं कहना चाहिये ॥ ६८ ॥
न दद्यात् प्रसरं स्त्रीणाँ सपत्न्याः कारणे क्वचित्।
तथोपालभमानां च दोषैस्तामेव योजयेत् ॥ ६९ ॥
कलह का अवसर न दे—समुचित कारण होने पर भी सपत्नियों को कलह का अवसर
ही न दे, और जो पत्नी आकर उपालम्भ दे, शिकायत करें, उसी का दोष बताये ॥ ६९ ॥
अन्यां रहसि विस्रम्भैरन्यां प्रत्यक्षपूजनैः।
बहुमानैस्तथा चान्यामित्येवं रञ्जयेत् स्त्रियः ॥ ७० ॥
तदनुरूप व्यवहार—सलज्ज को एकान्त में विश्वास देकर, सपत्नियों में स्थान चाहने
वाली को प्रत्यक्ष सम्मान देकर, मनस्विनी पत्नी को अत्यधिक सम्मान देकर सभी पत्नियों को
अनुरक्त रखे ॥ ७० ॥
उद्यानगमनैर्भोगैर्दानैस्तज्जातिपूजनैः ।
रहस्यैः प्रीतियोगैश्चेत्येकैकामनुरञ्जयेत् ॥ ७१ ॥