वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५. पारदारिक अधिकरण १२५
तत्परिभवजानि प्रणत्या ॥ ४८ ॥
अपने प्रति जो अविश्वास की भावना हो, उसे विनम्रता से दूर कर दे ॥ ४८ ॥
भययुक्तान्याश्वासनादिति ॥ ४९ ॥
भयनिवारण—भय से उत्पन्न कारणों को आश्वासन देकर दूर कर दे ॥ ४९ ॥
पुरुषास्त्वमी प्रायेण सिद्धाः—कामसूत्रज्ञः कथाख्यानकुशलो बाल्यात्प्रभृति
संसृष्टः प्रवृद्धयौवनः क्रीडनकर्मादिनागतविश्वासः प्रेषणस्य कर्तोचितसम्भाषणः
प्रियस्य कर्तान्यस्य भूतपूर्वो दूतो मर्मज्ञ उत्तमया प्रार्थितः सख्या प्रच्छन्नं संसृष्टः
सुभगाभिख्यातः सहसंवृद्धः प्रातिवेश्यः कामशीलस्तथाभूतश्च परिचारको
धात्रेयिकापरिग्रहो नववरकः प्रेक्षोद्यानत्यागशीलो वृष इति सिद्धप्रतापः साहसिकः
शूरो विद्यारूपगुणोपभोगैः पत्युरतिशयिता महार्हवेषोप-चारश्चेति ॥ ५० ॥
स्त्रीसिद्धपुरुष प्रकरण—प्रायः निम्नलिखित पुरुष परकीया को सिद्ध करने में निपुण
होते हैं—कामसूत्र का ज्ञाता, कथा और आख्यान कहने में निपुण, बाल्यकाल का सहचर, भरपूर
यौवन सम्पन्न, खेलने का विश्वासी (खिलाड़ी), यथोक्तकारी (जैसा कहो, वैसा ही मान लेने
वाला), सन्तुलित बोलने वाला, मनोवाञ्छित वस्तु लाकर देने वाला, जो पहले किसी अन्य प्रेमी
का दूत रहा हो, जो किसी सुन्दर स्त्री का प्रेम प्राप्त कर चुका हो, जो सखी से गुप्तरूप से मिल
चुका हो, जो अपनी सुन्दरता के लिये प्रसिद्ध हो, जिसका स्त्री (नायिका) के साथ लालन-
पालन हुआ हो, कामी पड़ौसी, कामी नौकर, धाय की लड़की का पति, नया दामाद, जो
नृत्यनाट्य देखने और वनविहार (पिकनिक) आदि में रुचि रखता हो, त्यागशील (स्त्रियों को
भेंट देने वाला), हृष्टपुष्ट एवं साहसी, शूरवीर, जो विद्या रूप गुण और उपभोगों में स्त्री के पति
से बढ़कर हो, सुन्दर वेश वाला, कामकलाओं में निपुण और मर्मज्ञ हो ॥ ५० ॥
यथात्मानः सिद्धतां पश्येदेवं योषितोऽपि ॥ ५१ ॥
अयत्नसाध्ययोषित्-प्रकरण—जिस प्रकार पुरुष अपने उपायों की सफलता पर विचार
करता है कि मैं सफल हो सकता हूँ या नहीं, उसी प्रकार उसे वांछित स्त्री (परकीया या
नायिका) के विषय में भी विचार करना चाहिये कि यह सिद्ध हो सकती है अथवा नहीं ॥ ५१ ॥
अयत्नसाध्या योषितस्त्विमाः—अभियोगमात्रसाध्याः। द्वारदेशावस्थायिनी।
प्रासादाद्राजमार्गावलोकिनी। तरुणप्रातिवेश्यगृहे गोष्ठीयोजिनी। सततप्रेक्षिणी।
प्रेक्षिता पार्श्वविलोकिनी। निष्कारणं सपत्न्याधिविन्ना। भर्तुर्द्वेषिणी विद्विष्टा च।
परिहारहीना। निरपत्या ॥ ५२ ॥
विना प्रयत्न के सिद्ध होने वाली स्त्रियाँ—ये स्त्रियाँ विना विशेष प्रयत्न के, केवल
साधारण अभियोग से ही सिद्ध हो जाती हैं—सदैव द्वार पर खड़ी रहने वाली, भवन की छत से
सड़क पर सदैव झाँकने वाली, तरुण पड़ोसी से जाकर गप्पें लड़ाने वाली, आने जाने वालों को
निरन्तर देखते रहने वाली, देखे जाने पर तिरछी निगाह से देखने वाली, जिसके पति ने अकारण
दूसरा विवाह कर लिया हो, पति से द्वेष करने वाली, जिसका पति उससे द्वेष रखता हो, जिसे
कोई नियन्त्रित करने वाला न हो और जो सन्तानरहित हो ॥ ५२ ॥