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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 248 में से

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पृष्ठ 155

५. पारदारिक अधिकरण १२९
सुनार, रत्नकार, वैकटिक (रत्नपरिशोधक या रत्नों का शोधन करने वाले अथवा उन्हें
सुन्दर आकार देने वाले), नीलगार, रंगरेज, बढ़ई आदि से यदि नायिका का कोई काम पड़े, तो
नायक अपने परिचितों द्वारा उस कार्य को कराने का दायित्व स्वयं ले ले ॥ १२ ॥
तदनुष्ठाननिरतस्य लोकविदितो दीर्घकालं सन्दर्शनयोगः ॥ १३ ॥
ऐसे कार्य करते हुए नायक को नायिका के निकट आने का अवसर मिलता है और
निकटवर्ती लोग वास्तविकता को बहुत देर से समझ पाते हैं ॥ १३ ॥
तस्मिंश्चान्येषामपि कर्मणामनुसन्धानम् ॥ १४ ॥
नायिका का एक कार्य पूर्ण न होने पाये कि दूसरे कार्य को खोज ले ॥ १४ ॥
येन कर्मणा द्रव्येण कौशलेन चार्थिनी स्यात्तस्य प्रयोगमुत्पत्तिमागममुपायं
विज्ञानं चात्मायत्तं दर्शयेत् ॥ १५ ॥
उस नायिका को जिस कार्य, द्रव्य और कौशल की इच्छा हो, उसके प्रयोग, उत्पत्ति,
आगम, उपाय और विज्ञान को अपने अधीन दिखा दे ॥ १५ ॥
पूर्वप्रवृत्तेषु लोकचरितेषु द्रव्यगुणपरीक्षासु च तया तत्परिजनेन च सह
विवादः ॥ १६ ॥
पुरातन रीतिरिवाजों एवं वस्तुओं के गुणों की परीक्षा में उसके तथा उसके परिजनों के
साथ वादविवाद करे। इससे सङ्कोच दूर होता है ॥ १६ ॥
तत्र निर्दिष्टानि पणितानि तेष्वेनां प्राश्निकत्वेन योजयेत् ॥ १७ ॥
इस वादविवाद में वस्तु का जो मूल्य लगाया जाये, उसके पूछने के लिये नायिका को
लगा दे ॥ १७ ॥
तया तु विवदमानोऽत्यन्ताद्भुतमिति ब्रूयादिति परिचयकारणानि ॥ १८ ॥
नायिका के साथ विवाद करता हुआ उसे विदुषी और बुद्धिमती बताये। ये परिचय के
कारण हैं ॥ १८ ॥
कृतपरिचयां दर्शितेङ्गिताकारां कन्यामिवोपायतोऽभियुञ्जीतेति। प्रायेण तत्र
सूक्ष्मा अभियोगाः। कन्यानामसम्पयुक्तत्वात्। इतरासु तानेव स्फुटमुपदध्यात्।
.सम्पयुक्तत्वात् ॥ १९ ॥
अभियोगप्रकरण—जिस स्त्री से भलीभाँति परिचय हो गया हो, जिसने अनुकूल सङ्केत
और चेष्टाएँ दिखा दी हों, उसे कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण में कहे गये कन्या को सिद्ध करने
के उपायों द्वारा ही प्राप्त करना चाहिये। क्योंकि कन्याएँ सम्भोग की हुई नहीं होतीं, इसलिये उन्हें
प्राप्त करने के लिये सूक्ष्म उपाय ही किये जाते हैं। किन्तु जो कन्याओं के अतिरिक्त हैं,
विवाहिताएँ हैं और सम्भोग कर चुकी होती हैं अथवा विवाह से पूर्व भी अनेक व्यक्तियों से
सम्भोग करा चुकी हैं, उन्हें प्राप्त करने के लिये प्रकट उपाय करने चाहियें ॥ १९ ॥
सन्दर्शिताकारायां निर्भिन्नसद्भावायां समुपभोगव्यतिकरे तदीयान्यु-
पयुञ्जीत ॥ २० ॥
जिस परकीया ने मुख और नेत्रों की प्रसन्नता और लालिमा से अपना हृदयस्थ अनुराग