वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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प्रति उदारता दिखाये। उत्सव, मद्यपान, गोष्ठी और उद्यान-विहार के प्रति अधिकाधिक रुचि
दिखाये। इस प्रकार पुनर्भूवृत्त पूर्ण हुआ॥ ४४॥
दुर्भगा तु सापत्नकपीडिता या तासामधिकमिव पत्यावुपचरेत् तामाश्रयेत्।
प्रकाम्यानि च कलाविज्ञानानि दर्शयेत्। दौर्भाग्याद्रहस्यानामभावः॥ ४५॥
दुर्भगावृत्त—दुर्भगा तो सपत्नियों से पीड़ित होती है, अतः उसे ऐसी सपत्नी का आश्रय
लेना चाहिये जिसे पति अधिक प्रेम एवं सम्मान देता हो। दर्शनीय कलाओं को उसे दिखाये,
क्योंकि वैदग्ध्य ही दुर्भगता की निवृत्ति का कारण है॥ ४५॥
नायकापत्यानां धात्रेयिकानि कुर्यात्॥ ४६॥
सन्तति का लालन-पालन—धाय के समान नायक की सन्तति का लालन-पालन
करे॥ ४६॥
तन्मित्राणि चोपगृह्य तैर्भक्तिमात्मनः प्रकाशयेत्॥ ४७॥
नायक के मित्रों को अनुकूल बनाकर, उनके माध्यम से नायक के प्रति अपनी पतिभक्ति
प्रकटित करे॥ ४७॥
धर्मकृत्येषु च पुरश्चारिणी स्याद् व्रतोपवासयोश्च॥ ४८॥
धार्मिक कृत्यों में पुरश्चारिणी—धार्मिक कार्यकलापों, व्रतोपवासों में सदैव पुरश्चारिणी
रहे॥ ४८॥
परिजने दाक्षिण्यम्। न चाधिकमात्मानं पश्येत्॥ ४९॥
परिजनों से विनम्र एवं शालीन व्यवहार—नायक के पारिवारिक सदस्यों के प्रति
विनम्रता, शिष्टता एवं शालीनता दिखाये और कभी भी अपने को बड़ा न समझे॥ ४९॥
शयने तत्सात्म्येनात्मनोऽनुरागप्रत्यानयनम्॥ ५०॥
प्रेम की पुनः प्राप्ति का प्रयास—नायक के साथ शयन का अवसर मिलने पर, उसकी
प्रकृति के अनुरूप ढलकर अनुराग को पुनः प्राप्त करे॥ ५०॥
न चोपालभेत, वामतां च न दर्शयेत्॥ ५१॥
उपालम्भ और विपरीतता से दूर—न कभी नायक को उपालम्भ दे और न कभी
विपरीतता ही दिखाये॥ ५१॥
यया च कलहितः स्यात् कामं तामावर्तयेत्॥ ५२॥
अनुकूल करने के साधन—नायक जिस पत्नी से लड़ गया हो, उसे अपनी ओर
मिलाने की चेष्टा करे॥ ५२॥
यां च प्रच्छन्नां कामयेत् तामनेन सह सङ्गमयेद् गोपयेच्च॥ ५३॥
नायक जिस तरुणी को मन में चाहता हो, उसे उस प्रिया से मिलवा दे, लेकिन इसे गुप्त
ही रखे, किसी से न कहे॥ ५३॥
यथा च पतिव्रतात्वमशाठ्यं नायको मन्येत तथा प्रतिविदध्यादिति दुर्भगा-
वृत्तम्॥ ५४॥