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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

७६ वरिवस्यारहस्ये
५३. मन्त्र-जप के समय त्याज्य कर्म—
व्रात्य, नास्तिक, पतित आदि से संभाषण, उच्छिष्ट मुख से वार्तालाप,
असत्यभाषण, कुटिलभाषण, अनुष्ठान के समय-शपथ लेना, पहनने का वस्त्र
ओढ़कर जप करना, बिना आसन के जप करना, बिना माला ढके या सिर ढककर
जप करना, चलते या खाते समय जप करना, जूता पहनकर, पैर फैलाकर जप
करना आदि निषिद्ध कार्य हैं। शास्त्रकारों ने अन्त में यह निर्णय किया कि—
“अशुचिर्वा शुचिर्वा गच्छंस्तिष्ठन स्वपन्नपि । मन्त्रैकशरणो विद्वान् मनसैव
सदाभ्यसेत् । न दोषो मानसे जाप्ये सर्वदेशेऽपि सर्वदा ॥
५४. जप की श्रेष्ठता का तारतम्य—
पद्मपुराण एवं नारदपुराण में कहा गया है कि—समस्त यज्ञ वाचिक जप की
तुलना में सोलहवें हिस्से के बराबर हैं । वाचिक जप से सौ गुना उपांशु एवं
सहस्रगुना मानस जप श्रेष्ठतर है । 'मानस जप' = जिसमें अर्थ-चिन्तन करते हुए
मन से ही मन्त्र के वर्ण, स्वर एवं पदों की बार-बार आवृत्ति की जाती है । तीनों
जपों में इष्ट का चिन्तन आवश्यक है । स्तोत्र का मानसिक पाठ, या जोर-जोर से
मन्त्र-जप दोनो निषिद्ध हैं । गौतमीतन्त्र में कहा गया है—केवल वर्णों के रूप में
मन्त्र की स्थिति उसकी जड़ता एवं पशुता है । सुषुम्णा द्वारा उच्चारित होने पर
उसमें शक्ति-सञ्चार होता है । प्रथम भावना यह करनी चाहिए कि मन्त्र का एक-एक
अक्षर चिच्छक्ति से ओत-प्रोत है एवं परम् अमृतरूप चिदाकाश में उसकी स्थिति
है। इस भावना के साथ किया गया जप, होम आदि के बिना ही सिद्ध हो जाते
हैं। प्राणबुद्धि से सुषुम्णा के मूलदेश में स्थित जीवरूप से मन्त्र का चिन्तन करके
मन्त्रार्थ एवं मन्त्र-चैतन्य के साथ जप करना चाहिए ।। 'कुलार्णवतन्त्र' में कहा गया
है कि—मन एक स्थान पर, शिव दूसरे स्थान पर, शक्ति तीसरे स्थान पर, एवं
प्राण चौथे स्थान पर होने पर भला मन्त्रसिद्धि कैसे हो?
५५. मांत्री-दीक्षा एवं मन्त्राधिकार—
कौन सा मन्त्र किस साधक के अनुकूल है तथा साधक किस मन्त्र को ग्रहण
करने का अधिकारी है इस सम्बंध में निम्न कसौटियाँ हैं—१. कुलाकुल चक्र, २.
राशिचक्र, ३. नक्षत्र चक्र, ४. अकडम चक्र, ५. अकथह चक्र, ६. ऋणि-धनि
चक्र । (स्थानाभाव के कारण इन पर विस्तार से प्रकाश डालना संभव नहीं है ॥)
५६. जप के प्रकार—
जप के अनेक प्रकार हैं यथा—१. 'वाचिक', २. 'उपांशु', ३. 'मानस' ।
आचार्य अभिनवगुप्त कहते हैं—'आत्मा न शृणुते यं स मानसो जप उच्यते ।
आत्मना शृणुते यस्य तमुपांशु विजानते ॥” (तन्त्रालोक) । नित्य, नैमित्तिक,
प्रायश्चित, भ्रामरी आदि अनेक जप होते हैं । 'वज्रजप' = प्राणवायु के शासन के
द्वारा, वायु को मध्यममार्ग में प्रविष्टकर चक्रों का भेदन किया जाता है और

'उष्णीश चक्र' में वायु पहुँचाकर योगी 'खसमावस्था' को प्राप्त होता है । प्राणवायु
के इस शासन को ही 'वज्रजप' कहा गया है । मात्र शब्दों का उच्चारण जप नहीं
है । प्राणवायु के अनुशासन की क्रिया के साथ-साथ जो जप किया जाता है । वही
फलप्रद जप है । यही है तान्त्रिक बौद्ध दृष्टि ॥ बौद्ध तान्त्रिक मन्त्रों के प्रकारों
में—ग्रथन मन्त्र, विदर्भमन्त्र, सम्पुटमन्त्र, रोधनमन्त्र, योग एवं पल्लवमन्त्र 'अभिचार'
से सम्बद्ध रखते हैं । क्रिया के तीन रूप हैं—१. वर्ण, २. मन्त्र, ३. पद ।
'मन्त्र' साक्षात् पराशक्तिस्वरूप हैं । पराशक्ति वाणी के रूप में स्फुरित होती
है अतः मन्त्रों के द्वारा सूक्ष्मा, सर्वातीता सत्ता या परावाक् (ओंकार) ही व्यक्त होता
है इसीलिए मन्त्रों में अचिन्त्यशक्ति मानी जाती है—'मन्त्राणामचिन्त्यशक्तिता ।'
('परशुरामकल्पसूत्र' सूत्र ८) । 'मन्त्र' किसी वर्ण का उच्चारण मात्र नहीं है प्रत्युत्
यह एक ऐसी पद्धति है जिसमें गुरु, मन्त्र, देवता, मन आत्मा एवं प्राणवायु की
एकता स्थापित की जाती है । इस ऐक्य की अवस्था में ही मन्त्रोच्चारण होता है
अतः मन्त्र के साथ 'ध्यान' मिला रहता है । यह एकता 'भावना' से सिद्ध होती
है । भावना-शून्य मन्त्र जप निष्फल होता है । 'मन्त्र' नादात्मक होता है । इस
नाद का अनुसंधान ही शाक्त-साधना का लक्ष्य है । 'यौवनोल्लास' में अजपाजप,
'प्रौढोल्लास' में मानसजप एवं 'तदन्तोल्लास' में वाराहीमन्त्र का जप किया जाता है।
मन्त्र के दो भेद हैं—१. 'बीज' २. 'पिण्डात्मक' । प्रत्येक श्वास के साथ सहजगति
से सोऽहं-सोऽहं का जप ही 'सहजजप' है । यही है—'कालध्वा' या 'प्राणध्वा' ।
यंत्र एवं यंत्रोपासना भी मन्त्र-साधना का एक अङ्ग है । इसके बिना मन्त्र का
आराध्य देवता प्रसन्न नहीं होता—'विना यन्त्रेण पूजायां देवता न प्रसीदति ।'२
५७. 'यंत्र'—
'यंत्र' मन्त्र एवं देवता का रेखात्मक चित्रण है । यह ब्रह्माण्ड का संक्षिप्त
संस्करण है । 'यंत्र' मन्त्र की बाह्य अभिव्यक्ति है । 'यंत्र' देवता का विग्रह है ।
'यंत्र' देवता का आसन है । 'यंत्र' समस्त विश्व का एक ज्यामितीय रेखाचित्र है ।
'यंत्र' देवता का शरीर है । इसी कारण यंत्र को माध्यम बनाकर उसके द्वारा मन्त्र
के वाच्य(देवता) को व्यक्त करने की साधना की जाती है । इसीलिए कहा है—
'विना यन्त्रेण पूजायां देवता न प्रसीदति । सर्वेषामपि देवानां यंत्रे पूजा प्रशस्यते ॥'२
५८. 'ध्यान'—
मन्त्र-साधना का एक अपरिहार्य अङ्ग 'ध्यान' है क्योंकि मन्त्र-साधना का लक्ष्य
है देवता का साक्षात्कार । यह देवता ही मन्त्र का अर्थ है । “तज्जपस्तदर्थभावनम्"
कहकर योगसूत्रकार महर्षि पतञ्जलि ने भी इसकी पुष्टि की है । इसीलिए ब्रह्मानन्द
गिरि कहते हैं—
"आदौध्यानं ततो मन्त्रं ध्यानस्यान्ते मनुं जपेत् ।
ध्यान मन्त्र समायुक्तः शीघ्रं सिध्यति साधकः ॥"३
१-३. शाक्तानन्द तरंगिणी

७८ वरिवस्यारहस्ये
जिस मन्त्र का जो देवता है उसके आकार का स्मरण करते हुए—अर्थात्
देवाकार का ध्यान करते हुए—मन से जप करना चाहिए—
'यस्य यस्य च मन्त्रस्य उद्दिष्टा या च देवता ।
चिन्तयित्वा तदाकारं मनसा जपमाचरेत् ॥' १
५९. देवता—
प्रत्येक 'मन्त्र' वाचक है और वाच्य है 'देवता' । 'देवता' मन्त्र का अर्थ है ।
'तज्जपस्तदर्थ भावनम्' (यो०सूत्र) के दो अर्थ हैं—
(क) अभीष्ट देवता के मन्त्र का अर्थ-भावन ।
(ख) अभीष्ट मन्त्र के अर्थ (अर्थात् मन्त्र के देवता) का भावन ।
'वरिवस्यारहस्यम्' एवं भास्करराय का देवता भगवती त्रिपुरसुन्दरी हैं और
उनका 'यंत्र' श्रीचक्र है । 'त्रिपुरसुन्दरी' कौन हैं?
सहस्रदल कमल के मध्य स्थित जो चन्द्रमण्डल या बैन्दवस्थान है उसकी
चिन्मयी एवं आनन्दरूपा कला ही आत्मा कही जाती है और उसे ही 'त्रिपुरसुन्दरी'
कहते हैं । इस चन्द्रमा की प्रथमाकला प्रतिपदा है । यह प्रतिपदा की कला ही
त्रिपुरसुन्दरी कला है ।
'सुन्दरी' की उपासना की दो पद्धतियाँ हैं—१. 'बहिर्याग', २. 'अन्तर्याग' ।
आचार्य भास्कर ने वरिवस्यारहस्यम् में मन्त्रजप को श्रेष्ठतम माना है । भगवती
त्रिपुरा के तीन रूप हैं—१. 'स्थूल', २. 'सूक्ष्म', ३. 'पर' । 'अन्तर्याग' भी
त्रिविध है—१. 'सकल' २. 'सकल निष्कल', ३. 'निष्कल' । ('सेतुबंध' पृ० ५)
मन्त्र-जप को भास्कर ने श्रेष्ठतम साधना स्वीकार किया है । 'याग' द्विविध है । ये
दोनों साधना-पद्धतियाँ हैं । 'बहिर्याग'—'बहिर्यागः पात्रासनादि शान्तिस्तवन्तः कर्म-
समूहः । 'अन्तर्याग'—अन्तर्यागो नामाधाराद्ब्राजदन्तान्तं तेनस्तन्तोर्विभावनम् । मानसी
देवपूजा वा । ('सौभाग्यभास्कर' पृ० ५)
नादात्मक मन्त्र-साधना—श्वास-प्रश्वास अन्तर्मुख होकर 'नाद' में परिणत हो
जाते हैं । नाद के साथ प्राणायाम करने से इष्टमन्त्रोच्चार द्वारा मन्त्र क्रमशः नादमय
हो जाता है । प्राणवायु का नाद के आंकार में परिणत होकर क्रमशः बिन्दु में
स्थिति-लाभ करने से मन्त्रसिद्धि होती है । नादमय मन्त्र ही जाग्रत मन्त्र है । जप
का मन्त्र नादात्मक है । ब्रह्म के दो रूप हैं—१. 'शब्द', २. 'ज्योति' । 'नाद'—
इष्टमन्त्र का स्फुरण । 'ज्योति'—इष्टमूर्ति का आविर्भाव ।
त्रिपुरसुन्दरी का स्वरूप—देवी मूलमन्त्र, कूटत्रय एवं कुलामृत हैं । वे
मूलाधारैकनिलया, ब्रह्मग्रंथिविभेदिनी, मणिपूरान्तरुदिता, विष्णुग्रन्थिविभेदिनी, आज्ञा-
चक्रान्तरालस्था, रुद्रग्रंथिविभेदिनी सहस्राम्बुजारूढा एवं सुधासाराभिवर्षिणी हैं—
'मूलाधारैकनिलया ब्रह्मग्रंथिविभेदिनी । मणिपूरान्तरुदिता विष्णुग्रंथिविभेदिनी । आज्ञा-
१. शाक्तानन्द तरंगिणी

भूमिका ७९
चक्रान्त रालस्था रूद्रग्रंथिविभेदिनी । सहस्राम्बुजारूढा सुधासाराभिवर्षिणी ।।' वे
'षट्चक्रों परिसंस्थिता महाशक्ति कुण्डलिनी' भी है । वे जगन्माता हैं । वे जगदात्मा
हैं । भास्करराय इन्हीं ललिताम्बिका राजराजेश्वरी महात्रिपुरसुन्दरी के उपासक थे । वे
कहते हैं— 'दयतां देशिकात्मा मे देवि श्रीललिताम्बिका । भगवती ललिता विश्वविग्रहा,
सर्वदेवात्मिका, सर्ववर्णात्मिका एवं मन्त्रात्मिका हैं ।
६०. यन्त्र—
'श्रीचक्र' — 'श्रीचक्र' नवयोन्यात्मक है । इसकी ९ योनियाँ, निम्न हैं—१.
'मध्यत्रिकोण', २. 'अष्टार', ३. 'अन्तर्दशार', ४. 'बहिर्दशार', ५. 'चतुर्दशार', ६.
'अष्टदलपद्म', ७. 'षोडशदलपद्म', ८. 'वृत्तत्रय', ९. 'भूपूर' ।। इनमें अधोमुख ५
त्रिकोण 'शक्तित्रिकोण' एवं ४ त्रिकोण ऊर्ध्वमुख एवं 'शिवत्रिकोण' कहलाते हैं ।
'संहारक्रम' में 'शक्तित्रिकोण', 'ऊर्ध्वमुख' एवं 'शिवत्रिकोण' अधोमुख हो जाते हैं
तथा 'सृष्टिक्रम' में इसके विपरीत रहते हैं । उपर्युक्त त्रिकोणों में प्रथम ५ त्रिकोण
'शक्तिचक्र' एवं अन्तिम चार चक्र 'शिवचक्र' कहलाते हैं ।
'षोडशदल पद्म'—चन्द्रमा की षोडशकलाएँ एवं मध्य त्रिकोण 'मूलाधार' हैं,
अष्टार 'स्वाधिष्ठानं हैं, अन्तर्दशार 'मणिपूर' है एवं बहिर्दशार 'अनाहतचक्र' है ।
'विशुद्धचक्र'—अन्तर्दशार का प्रतिनिधि है । 'आज्ञाचक्र' शिव का स्थान (शिवचक्र)
'बैन्दवगृह' है । 'सूर्यखण्ड', 'सोमखण्ड' एवं 'अग्निखण्ड' के साथ पिण्डगत
षट्चक्रों एवं यंत्र के नौ चक्रों के साथ अभेद है । भूपूर 'सहस्रार' है एवं वृत्तत्रय
'बैन्दवस्थान' (सहस्रारस्थ चन्द्र-स्थान) हैं ।
६१. भोजन—
चन्द्रसूर्याग्निरूपिणी कुण्डलिनी को मूलाधार से आजिह्वान्त विभावित करके
शोधित भोज्य पदार्थों को जीभ के समक्ष देवी को प्रतिग्रास समर्पित करे । इससे
मन्त्र-सिद्धि होती है—क्योंकि 'भुज्यते कुण्डलीदेवी इति ः चिन्तापरोहि यः ।
मन्त्रसिद्धिर्भवेत्तस्य ज्ञानसिद्धिर्नचान्यथा ।।' ('मातृकाभेद तन्त्र') ।।
६२. 'अहंपरामर्श'—
अभिनवगुप्ताचार्य 'तन्त्रालोक' में कहते हैं कि, 'अ' एवं 'ह' ('अहं')
अहंपरामर्शात्मक हैं । इन दोनों से रहित और इनकी रहस्यात्मकता के ज्ञान से
रहित कोई भी मन्त्र सिद्ध नहीं होता प्रत्युत् व्यर्थ हो जाता है यथा शरद ऋतु का
बादल—'आदिमान्त्यविहीनास्तु मन्त्राः स्युः शरदभ्रवत्'
“आदिमोऽनुत्तरः, अन्त्योहकारः, तेन मन्त्रा अपि अहंपरामर्शरूपा
भ्यामादिमान्त्याभ्यां विहीनाः तद्रूपत्वेनापरिज्ञायमानाः शरदभ्रवत् स्युः अकिंतकरा
एवेत्यर्थः ।।"
कहा भी गया है—'आदिमान्त्यविहीनास्तु मूलयोनिमजा नतः । न ते सिद्धिकरा
मन्त्रा निष्फलाः शरदभ्रवत् । खपुष्पं निष्फलं यद्वच्छशकस्य विषाणकम् । वन्ध्यायाः
६ वरि. भू.

८० वरिवस्यारहस्ये
प्रसवो देवि क्लीबस्य द्रवमेव च । अग्निमुक्ता यदा विप्रास्तदा एते तु निष्फलाः ।
आदिमान्त्य विहीनानि मन्त्राणि च तथैव च । निष्फलानि भवन्त्येवं पिबतो
मृगतृष्णिकाम् ।¹
अहं परामर्शात्मक मन्त्र सभी लक्ष्यों की पूर्ति करने में समर्थ होते है—आचार्य
अभिनवगुप्त कहते है—"एतद्रूप परामर्शकृत्रिम मनाविलम् । अहमित्याहुरेषैव
प्रकाशस्य प्रकाशता । एतद्वीर्यं हि सर्वेषां मन्त्राणां हृदयात्मकम् । विनानेन जडास्ते
स्युर्जीवा इव बिना हृदा । अंकृत्रिमै तद्धृदया रूढो यत्किंचिदाचरेत् । प्राण्याद्वा
विमृशेद्रापि स सर्वोऽस्य जपो मतः ॥"²
वही गुरु भी है जो अहमात्मक परामर्श का ज्ञाता हो—
"गुरोर्लक्षणमेतावदादिमान्त्यं च वेद्येत् ।
पूज्यः सोऽहमिव ज्ञानी भैरवोदेवतात्मकः ॥"³
६२. 'मन्त्र' और कुण्डलिनी—
सारे मन्त्रों का मूल भगवती कुण्डलिनी है । वे परममन्त्र (मन्त्राधिराज) या
मूलमन्त्र ओंकार का स्वस्वरूप हैं । सारे वर्ण, सारे मन्त्रों के नाद, सारे मन्त्र, सारे
देवता, सारे पीठ, सारी वाणियाँ कुण्डलिनी के शरीर में ही स्थित हैं । 'मूलमन्त्र'
भगवती कुण्डलिनी अपने 'परावाक्' या 'शब्दब्रह्म' का स्वस्वरूप है । वे ही
जगज्जननी भी हैं और मातृका भी, वे ही नाद भी है और मन्त्र भी । वे ही
(मन्त्ररूप) वाचक भी है और वाच्य भी ।
[चित्र-विवरण:]
(दाहिनी ओर के विवरण:)
'महामन्त्रात्मिका कुण्डलिनी' ('विमर्श' शक्ति)
'प्रकाश' (सहस्रारस्थ परमशिव)
मूलमन्त्र (ओंकार)
देवी मातृका भी हैं—
'पराशक्तिस्तु मातृका' (यो०ह०)
वे मन्तरूपिणी भी हैं—
'ज्ञातृ ज्ञान मयाकार मननान्मंत्ररूपिणी' (यो०ह०)
(चित्र के भीतर वृत्त-स्तर:)
ॐ ॐ ॐ
परावाक् शब्दब्रह्म
ॐ ॐ ॐ
पश्यन्तीवाक्
मध्यमावाक्
वैखरीवाक्
(बाईं ओर के विवरण:)
ॐ
↓
पश्यन्ती
↓
मध्यमा
↓
वैखरी
'देवीं मन्त्रमयीं नौमि मातृका पीठरूपिणीम् ॥'
१. 'विवेक' में उद्धृत २. तन्त्रालोक (४।१९२-१९४)
३. तन्त्रालोक

भूमिका ८१
६३. वर्णात्मक 'मन्त्र' एवं ध्वन्यात्मक 'मन्त्र'—
'मन्त्र' के दो रूप हैं—१. वर्णात्मक, २. ध्वन्यात्मक ॥ वर्णात्मक नाम
(मन्त्र) वे हैं जो बोले जा सकते हैं, सुने जा सकते हैं, जपे जा सकते हैं और
लिखे जा सकते हैं । 'ध्वन्यात्मकमन्त्र' वे हैं जिसका न तो जीभ से जप किया जा
सकता है, न उन्हें लिखा जा सकता है, न उन्हें बोला जा सकता है और न उन्हें
सुना ही जा सकता है । यह वह ध्वनिमूलक एवं शक्तिपुञ्ज अक्षरसमष्टि है जो हृदय,
नाभि, मूलाधार आदि चेतन-केन्द्रों से स्वतः आविर्भूत होता है । यह नादात्मक है
और स्वयंभू है । 'मध्यमा', 'पश्यन्ती' एवं 'परावाक्' के केन्द्रों से इनका आविर्भाव
होता है । 'मन्त्र' जप करने की वस्तु नहीं है प्रत्युत् होने की वस्तु है ।
६४. 'मन्त्र' और देवता-पारस्परिक अन्तर्सबन्ध—
मन्त्र और देवता में तत्त्वतः अभिन्नता है । जो मन्त्र है वही देवता है और जो
देवता है वही मन्त्र है । दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । अन्तर केवल यह
है कि एक 'नाम' है और दूसरा 'नामी', एक वाचक है और दूसरा वाच्य ।
'देवता' वाच्य है—नामी है और 'मन्त्र' वाचक है—नाम है । 'वातुलशुद्धाख्यतन्त्र'
में कहा गया है कि 'मन्त्र देवतारूप है । और यह जगत् मन्त्ररूप है'—"मन्त्रस्तु
देवता रूपं मन्त्ररूपमिदं जगत् ॥"१
६५. 'मन्त्र' और उसका महत्व—
'मन्त्र' से ही जगत् की उत्पत्ति होती है, मन्त्र से ही जगत् का पालन होता
है और मन्त्र से ही जगत् का विनाश होता है । 'मन्त्र' ही जगत् की सृष्टि, स्थिति
एवं संहार तीनों का अधिष्ठान है । 'मन्त्र' से ही ३३ कोटि देवता, तीनों लोक,
चौदहों भुवन, चौदहों विद्याएँ, समस्त अण्ड (शाक्ताण्ड, मायाण्ड, प्रकृत्यण्ड,
ब्रह्माण्ड) देवत्रय, सप्तलोक (तल, अतल, रसातल आदि), समस्त वर्णमाला,
समस्त विद्याएँ एवं समस्त सत्ताएँ अस्तित्व में आती हैं ।
मारण, मोहन, उच्चाटन, विद्वेषण, स्तंभन, आकर्षण आदि समस्त क्रियाएँ
मन्त्र द्वारा ही संपादित हैं—'कर्षणादि क्रियाः सर्वामन्त्रेणैव प्रकीर्तिताः ॥'२
बिना 'मन्त्र' के कोई क्रिया संभव ही नहीं है—
'तस्मान्मन्त्र क्रियार्थत्वाद्विना मन्त्रं क्रिया न च ॥'३
'मन्त्र' के द्वारा ही देवों की स्थापना होती हैं, मन्त्रों के द्वारा ही यज्ञ आदि
क्रियाओं का निष्पादन होता है, मन्त्र द्वारा ही स्नान, आहुति, तर्पण, प्रायश्चित,
दीक्षा आदि क्रियाएँ सम्पन्न की जाती हैं तथा मन्त्र द्वारा अणिमादिक सिद्धियाँ एवं
सालोक्य आदि मुक्तियाँ प्राप्त की जाती हैं—मन्त्रों द्वारा ही सारे पापों से मुक्ति प्राप्त
की जाती है ।
१-२. वातुल शुद्धाख्य तन्त्र

८२ वरिवस्यारहस्ये
'मन्त्रेण देवता स्थाप्या मन्त्रेण यजनादयः । स्नानं मन्त्रेण कर्तव्यं
मन्त्रेणाहुतितर्पणम् । प्रायश्चित्तं तु मन्त्रेण दीक्षामन्त्रेण चैव हि । अणिमादीनि मन्त्रेण
सालोक्यादि पदं तथा । मन्त्रेण पातकादीनि मुच्यन्ते सर्वजन्मिनाम् । सर्वमन्त्रक्रियाश्चैव
मन्त्र शृणु षडानन ।' १
'मन्त्र' मननधर्मा हैं । 'मन्त्र' त्राण का केन्द्र है । 'मनन' एवं 'त्राण'—इन
दोनों धर्मों के निष्पादन के कारण ही इन्हें 'मन्त्र' कहा जाता है—'मननं सर्वपेक्षेषु
त्राणं संसार सागरात् मननत्राणधर्म धर्मत्वात् मन्त्र इत्यभिधीयते ।।' २
६६. 'मन्त्र' और 'उपाय' तत्त्व—प्रत्यभिज्ञाशास्त्र (त्रिक् दर्शन) में मुक्ति के
साधनों को 'उपाय' कहा गया है । आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने मुक्ति के साधनभूत
इन उपायों के निम्न प्रकारों का उल्लेख किया है—
(१) 'अनुपाय' = 'आनन्दोपाय' = शांभवोपाय का चरमरूप
(२) 'शांभवोपाय' = शांभवसमावेश = शांभवमार्ग = 'इच्छोपाय'
(३) 'शाक्तोपाय' = शाक्तसमावेश = 'ज्ञानोपाय'
(४) 'आणवोपाय' = 'क्रियोपाय' = 'क्रियोपाय'—'ज्ञानोपाय'
(क) 'शांभवोपाय' = अभेदोपाय । ⎫ 'अभेदोपायमंत्रोक्तं शांभवं शाक्त
(ख) 'शाक्तोपाय' = भेदाभेदात्मक । ⎬ मुच्यते । भेदाभेदात्मकोपायं
(ग) 'आणवोपाय' = भेदोपाय । ⎭ भेदोपायं तदाणवम् ।।३
(क) 'आणवोपाय' = ज्ञानोपाय ⎫ 'आणव' 'मायीय' एवं
(ख) ज्ञानोपाय = इच्छोपाय ⎬ 'कार्य' मलों के ध्वंस
(ग) इच्छोपाय = शांभवोपाय ⎭ के साधन ।।
'आणवमल'—'कार्ममल'—'मायीयमल' । 'मल' ही संसारांकुर है । संकुचित
ज्ञान ही 'मल' है—प्रच्छन्नज्ञानरूपता ही 'मल' है । यह पूर्णज्ञान की अख्याति है—
'मलमज्ञानमिच्छन्ति संसारांकुर कारणम् ।।'
'शिवसूत्र' में 'मन्त्र' को द्वितीयोन्मेष अर्थात् 'शाक्तोपाय के रूप में स्वीकार
करते हुए मन्त्र की निम्न परिभाषा दी गई है—'चित्तं मन्त्रः' (२।१) इसकी व्याख्या
करते हुए आचार्य क्षेमराज ने 'शिवसूत्रविमर्शिनी' में कहा है—'चेत्यते विमृश्यते
अनेन परतत्त्वम् इति चित्तं, पूर्णस्फुरत्ता सततप्रसाद प्रणवादिविमर्शरूपं संवेदनम्,
तदेव मन्त्र्यते गुप्तम्, अन्तर भेदेन विमृश्यते परमेश्वररूपम् अनेन, इति कृत्वा
मन्त्रः । अतएव च पर स्फुरत्तात्मकमननधर्मात्मता, भेदमयसंसारप्रशमनात्मक त्राण-
धर्मता च अस्य निरूच्यते । अथ च मन्त्रदेवता विमर्शपरत्वेन प्राप्ततत्सामरस्यम्
आराधक चित्तमेव मन्त्रः न तु विचित्रवर्णसङ्घट्टमात्रकम् ।।' ४
१-२. वातुल शुद्धाख्य तन्त्र ३. अभिनवगुप्त—'तन्त्रालोक' (प्र.आ.)
४. क्षेमराज—'शिवसूत्रविमर्शिनी'

।`

Let's check line 25:
(क) मन्त्र का धर्म है—१. मनन, २. त्राण ।

Let's check line 26:
(ख) मन्त्र का बल है—निरावणा चित् शक्ति का उल्लास ।

Let's check line 27:
अर्थात् 'पराशक्ति' । उसी शक्ति को लेकर 'मन्त्र' सहज नादशक्ति से

Let's check line 28:
उद्बोधित होकर प्रदीप्त होते हैं । उनमें सर्वज्ञता आदि का बल आ जाता है । जब

Let's check line 29:
सिद्ध व्यक्ति उनका प्रयोग करता है तब वे 'अनुग्रह' एवं 'निग्रह' करने में सक्षम हो

Let's check line 30:
जाते हैं ।

Let's check line 31:
'त्रिकसार' में कहा गया है कि—"वर्णातीत निराकार परमतत्त्व का बोध हो

Let's check line 32:
जाने पर 'मन्त्र' मन्त्राधिपों के किङ्कर हो जाते हैं (वशीभूत हो जाते हैं ।) यदि ऐसा

Let's check footnotes:
Horizontal line above footnotes.
१. श्रीमत्ज्ञानोत्तर २. वरदराज—'शिवसूत्र वार्तिक'
`३. श्रीकण्ठी संहिता ४. तन्त्रसद्

प्रथम विश्राम: पञ्चदशाक्षरी मन्त्र का वाच्यार्थ एवं अधिदैविक अर्थ

८४ वरिवस्यारहस्ये
नहीं हुआ तो कठोर अध्यवसाय करने पर भी वे कठपुतली के समान निष्फलचेष्ट
ही रहते हैं क्योंकि चिच्छक्ति के बल के स्पर्श न होने पर वे केवल वर्णमात्रा
अर्थात् जड़ अक्षरमात्र रह जाते हैं ।।"
‘हंसपारमेश्वर’ में कहा गया है कि—“केवल वर्णरूप मन्त्र ‘पशुभाव’ में स्थित
है । सुषुम्णामार्ग से उच्चारण करने पर वे ‘पशुपति’ हो जाते हैं ।
‘तत्त्वरक्षाविधान’ में कहा गया है कि—“आत्मसंवित् या परमपद में मन्त्र का
प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि वह शक्ति एवं क्रियाशून्य है । शक्ति के विषय में
ही मन्त्र का प्रयोग करना चाहिए । वहीं जप सफल होता है ।”
‘श्रीवैहायसी’ में कहा गया है कि नादोर्ध्वध्वनि से बोधित जप करना चाहिए ।
शक्ति के ताने-बाने से हुए मन्त्राक्षरों का ध्यान करना चाहिए । उक्त रीति से जप
करने पर ‘मन्त्र’ अपने स्वरूप को प्रकट कर देता है ।
उत्पलाचार्य कहते हैं कि साधक के चित्त में मन्त्र लीन हो जाते हैं । जब
शुद्ध बोधात्मक रूप से अन्तर्बाह्य दोनों में उदित मन्त्र का एक बार भी जप किया
जाता है तो वह लक्ष बार किए गए जप के समान हो जाता है ।
‘स्पन्दकारिका’ में कहा गया है—
“तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः ।
प्रवर्तन्तेऽधिकाराय करणानीव देहिनः ॥”
‘मालिनीविजय’ का मत है कि—जिस अवस्था में जीत अन्याधार—विनिर्मुक्त
होकर स्वरूप में लीन होता है वही सम्पूर्ण मन्त्रों की उत्पत्ति का क्षेत्र है ।
‘चित्तं मन्त्रः’, ‘कथा जपः’—कहकर ‘शिवसूत्र’ में ‘मन्त्र’ एवं ‘जप’ की
अवधारणा को अत्यधिक वैज्ञानिक, यथार्थपरक, व्यावहारिक एवं बाह्याडम्बर तथा
बाह्याचार-विनिर्मुक्त करने का प्रयास किया गया है । भास्करराय ने भी यही प्रयास
किया है । ‘कुलार्णवतन्त्र’ में भी इसी दृष्टि को उपन्यस्त करते हुए साधकों से
प्रश्न किया गया है कि—
जिह्वादग्धा परान्नेन हस्तौ दग्धौ प्रतिग्रहात् ।
मनोदग्धं परस्त्रीभिः कार्यसिद्धिं कथं भवेत् ?॥
अर्थात् इन विपरीत परिस्थितियों में—‘मन्त्रसिद्धिं कथं भवेत् ?’
——— 🙤 ☸ 🙦 ———

विषयानुक्रमणिका
पृ०सं०
दो शब्द ५-९
प्राक्कथन ११-८४
उपोद्घात
१. भास्करराय और उनका आविर्भाव काल १२
२. भास्करराय की रचनाएँ १४
३. भास्करराय का जीवन-परिचय १५
४. भास्करराय की दार्शनिक दृष्टि २१
५. ‘वरिवस्यारहस्यम्’—एक विहंगमावलोकन २६
प्रथमोऽंशः
विषय श्लो० पृ०सं०
ग्रन्थकार का भगवान् नृसिंह से उनकी भक्ति-प्राप्ति
हेतु निवेदन १ १
ग्रन्थकार का विद्योपासक विद्वत्समाज के प्रति
आत्मनिवेदन २ २
प्रकाशस्वरूप परमशिव की महत्ता ३ ३
विमर्श शक्ति और उसकी महत्ता ४ ११
‘परिणामवाद’ एवं चतुर्विधा सृष्टि ५ २८
विमर्श शक्ति के परिज्ञान के उपाय ६ ६६
गायत्री के दो रूप ७ ७०
श्रीविद्या की गोपनीयता ८ ७६
कूटत्रय का स्वरूप ९-११ ८०
हल्लेखा का स्वरूप १२ ८९
नाद और उसका स्वरूप १३ ८९

८६ वरिवस्यारहस्ये
कूटत्रय में वर्ण संख्या १४ १२२
'कामकला', 'त्रिकोण' एवं 'हल्लेखा' का उच्चारणकाल १५-१६ १२३
नाद, वाग्भवकूट, कामराजकूट एवं शक्तिकूट
का मात्रा-काल १७-१८ १३७
मन्त्राक्षरों के उच्चारण-स्थान १९ १३८
प्रथम कूट एवं द्वितीय का स्वरूप २०-२१ १४०
नाद एवं बिन्दु का स्वरूप २२ १४७
अर्द्धचन्द्र एवं रोधिनी का स्वरूप २३ १४७
नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना एवं उन्मना
का स्वरूप २४-२७ १४७
नादोच्चारण की प्रक्रिया २८-३० १४७
कूटत्रय का उच्चारण-काल ३१ १६४
कूटत्रय में बीज चतुष्टय ३२ १६५
बीज चतुष्टय ३३-३४ १६५
ब्रह्मादिक देवत्रय एवं उनकी शक्तियों
की मन्त्राक्षररूपता ३५-३६ १६८
जागृतावस्था और रेफस्थ प्रकाश के
अंतर्संबंध का प्रतिपादन ३७ १८०
वप्नावस्था एवं मन्त्राक्षर 'ई' में स्थित प्रकाश के
अंतर्संबंध का विवेचन ३८ १८१
सुषुप्ति का स्वरूप ३९ १८२
तुरीयावस्था का स्वरूप ४० १८२
तुर्यातीतावस्था का स्वरूप ४१ १८४
बिन्दु एवं पञ्चशून्य-अन्तर्संबंध ४२ १८६
महाशून्य की भावना एवं 'प्राणविषुव' का स्वरूप ४३ १८६
'मन्त्रविषुव' का स्वरूप ४४ १९०
नाडिकाविषुव' का स्वरूप ४५-४६ १९२
प्रशान्तविषुव' का स्वरूप ४७ १९९
'शक्तिविषुव' एवं 'कालविषुव' का स्वस्वरूप ४८ २००

विषयानुक्रमणिका ८७
'तत्त्वविषुव' का स्वरूप ४९-५१ २०३
जप का लक्षण ५२ २०४
ग्रन्थ के पूर्वांश की समाप्ति की अनुज्ञप्ति ५३ २२०
द्वितीयोंऽशः
अर्थ-ज्ञान-शून्य अनुष्ठित जप की व्यर्थता ५४-५५ २२२
मन्त्रार्थों का परिज्ञान आवश्यक क्यों? ५६ २२३
अर्थों के विभिन्न भेद ५७-५९ २२५
गायत्री मन्त्र एवं पञ्चदशी मन्त्र के मन्त्राक्षरो के अर्थ
में साम्य का प्रतिपादन ६० २२९
गायत्री मन्त्र एवं पञ्चदशीमन्त्र के वर्णों
की परस्पर वाचकता ६१ २३६
पञ्चदशी एवं गायत्री मन्त्र के वर्णों का अन्तर्संबन्ध ६२ २३९
कूटद्वय के शेष अक्षरों के उद्धार की प्रक्रिया एवं
गायत्री विद्या की अर्थ-पद्धति ६३ २४१
युगलत्रय, कूटत्रय एवं ईकारत्रय—एक विवेचन ६४-६५ २४१
मिथुनत्रय एवं कूटत्रय में अंतर्संबंध ६६ २४६
पञ्चदशाक्षरी विद्या का स्वस्वरूप ६७ २४८
परात्परशक्ति का सप्त शक्तियों एवं छत्तीस तत्त्वों से
तादात्म्यभाव ६८ २४८
अकार एवं हकार की ब्रह्मरूपता ६९ २५४
सिसृक्षुब्रह्म की सृजन-प्रक्रिया ७० २५४
'विसर्ग', 'काम' एवं 'रति' का स्वरूप ७१ २५५
शाब्दीसृष्टि एवं आर्थी सृष्टि का मूल कारण ७२ २५५
'भावार्थ' का स्वरूप ७३ २५५
ह क र स ल—वर्ण तथा इनका पञ्चभूतों से
सम्बन्ध एवं संप्रदायार्थ ७४ २६४
वर्णों द्वारा गुणोत्पत्ति एवं कामकला द्वारा
स्पर्शोत्पत्ति का प्रतिपादन ७५ २६८

८८ वरिवस्यारहस्ये
वर्ण एवं उनके अर्थ में तादाम्यभाव ७६ २७०
ककारत्रय एवं 'सकल', 'प्रलयाकला तथा
'विज्ञानाकल' की अभेदात्मकता ७७ २७२
अकार एवं जीवों में अभेदात्मकता तथा एकार
का विद्यागत महत्त्व ७८ २७३
बिन्दुत्रय के साथ रुद्र, ईश्वर तथा सदाशिव की
अभेदात्मकता तथा शान्ति, शक्ति एवं शम्भु की
नाद के साथ अभेदात्मकता ७९ २७५
महाविद्या एवं सैतिस तत्त्वों में अभेदात्मकता
का प्रतिपादन ८० २७६
सम्प्रदायार्थ का स्वरूप ८१ २८०
'निगर्भार्थ' का स्वरूप ८२ २८२
देवी की गणेशरूपता ८३ २८३
देवी की ग्रहरूपता का प्रतिपादन ८४ २८४
देवी की नक्षत्र-रूपता का प्रतिपादन ८५ २८५
देवी की योगिनीरूपता ८६ २८६
देवी की प्राण, जीव एवं राशि के साथ तदात्मकता ८७ २८८
श्रीविद्या की कूटत्रयात्मकता एवं वाक्चतुष्टयात्मकता ८८ २८९
श्रीविद्या की ग्रहरूपत्मकता एवं नक्षत्ररूपात्मकता ८९ २९०
श्रीविद्या की योगिनीरूपात्मकता एवं राशिरूपात्मिकता ९० २९२
पंचदशी विद्या एवं देवी में अभेदात्मकता ९१ २९४
श्रीचक्र की ग्रहरूपत्मकता ९२ २९६
श्रीचक्र की नक्षत्ररूपता ९३ २९८
श्रीचक्र की योगिनीरूपात्मकता ९४ २९८
श्रीचक्र की राशिरूपता का प्रतिपादन ९५ ३००
पंचदशीविद्या के वर्णों के साथ चक्रों की एवं
चक्रों के साथ देवी की अभिन्नता का प्रतिपादन ९६ ३०१
वर्णमाला एवं पीठों में समानता ९७ ३०७
गणप, ग्रह, भ आदि के साथ पचपन
पीठों की एकात्मता ९८ ३०८

विषयानुक्रमणिका ८९
विद्याक्षरों द्वारा चक्रोत्पत्ति-प्रक्रिया ९९-१०० ३१०
'गुरु' की देवी, विद्या, एवं चक्र के साथ अभिन्नता
एवं गणेश के साथ अभेदात्मकता का प्रतिपादन १०१ ३१२
'कौलिकार्थ' का स्वरूप १०२ ३१४
कुलकुण्डलिनी का स्वरूप एवं मूलस्थान १०३-१०६ ३१६
कुलकुण्डलिनी एवं श्रीविद्या का रहस्यार्थ १०७ ३२४
श्रीविद्या के 'महातत्त्वार्थ' का स्वरूप १०८-१०९ ३४३
'नामार्थ' एवं 'शब्दरूपार्थ' का स्वरूप ११० ३४४
देवी के नाम एवं मन्त्राक्षर १११-११२ ३४७
शक्तिसमूहार्थ का स्वरूप ११५ ३५१
प्रथमकूट के छः वर्णों, तीन दम्पतियों एवं
कामकला में अभिन्नता का प्रतिपादन ११६ ३५४
शाक्तार्थ का स्वरूप ११७-११८ ३५७
श्रीविद्या के सामरस्यार्थ का स्वरूप ११९ ३५८
सामरस्यार्थ का स्वरूप १२० ३६०
'ककार' एवं 'एकार' का अर्थ १२१ ३६१
मन्त्राक्षर 'क' 'ए' एवं 'ई' का अर्थ १२२ ३६३
लहरी, ह, क, ई, स, म कूटत्रय एवं ह्रीँ
आदि का रहस्यार्थ १२३-१३० ३६४
सिद्धों द्वारा स्थापित मन्त्रार्थों की व्याकरण द्वारा
पुष्टि की अनिवार्यता का प्रतिपादन १३१-१३२ ३६६
मन्त्र के 'समस्तार्थ' के स्वरूप का विवेचन १३३ ३६७
सगुणार्थ का स्वरूप १३४-१३६ ३६८
ह स क ह ल का अर्थ १३७-१३९ ३७०
तृतीयकूट एवं सगुणार्थ के स्वरूप का विवेचन १४० ३७१
मन्त्रगत 'ककार', 'एकार' एवं 'अकार' की त्रिदेवों
से तदात्मता का प्रतिपादन १४१ ३७१
पंचदशी मंत्रगत 'ह स क ह ल' के अर्थ का विवेचन १४३ ३७३
तृतीयकूट द्वारा जीवब्रह्मैक्य की स्थापना का प्रतिपादन १४४ ३७३

१० वरिवस्यारहस्ये
मन्त्रगत 'स क ल' पद का अर्थ १४५ ३७३
'स' 'क' 'ल'—मन्त्राक्षर का अर्थ १४६ ३७३
मन्त्रार्थ विषयक सर्वमान्यता का प्रतिपादन १४८ ३८०
भावार्थादिक अर्थ-प्रकारों का महत्त्व १४९ ३८१
मन्त्र के अर्थ के निर्णय के विषय में भगवान् शिव
के वचनों की निर्णायक भूमिका का प्रतिपादन १५० ३८२
शब्द के अर्थग्रह में ईश्वरेच्छा की भूमिका १५१ ३८२
वर्ण एवं उनके अर्थ का अन्तर्संबंध १५२ ३८२
अनेकार्थी शब्दों से विशेषार्थ-ग्रहण के कारक तत्त्व १५३ ३८३
मन्त्रार्थ की दिशा में विशेषक की अपेक्षा
सर्वबोध का प्रतिपादन १५४ ३८४
मन्त्र एवं वाक्य अन्तर्संबंध १५५ ३८५
मन्त्र-विनियोग की दो दिशाएँ १५६ ३८६
'निगमन' के प्रमाणार्थ मुख्योपाय १५७ ३८६
अलौकिक अपूर्व प्रयोजन १५८ ३८७
श्रीविद्या की उपासना के आन्तरिक अङ्ग १५९ ३८८
श्रीविद्या के बाह्य अङ्गों का विवेचन १६०-१६१ ३८८
श्रीविद्या की उपासना में आन्तरिक अङ्ग की प्रधानता १६२ ३९४
बाह्याडम्बरोपासना का खण्डन १६३ ३९६
कामकला बीज से मूलमन्त्र एवं मूलमन्त्र से शरीर के
बाह्य एवं आन्तरिक विकास का विवेचन १६४ ३९९
'श्रीविद्या' की गुरु-परम्परा से प्राप्ति की अनिवार्यता १६५ ४०१
गुरु-चरणों की वन्दना १६६ ४०२
प्रस्तुत ग्रन्थ-प्रणयन के पीछे गुरु-कृपा का प्रतिपादन १६७ ४११
श्लोकार्धानुक्रमणिका ४१५-४२१
—*—

॥ श्रीः ॥
श्रीभास्कररायमखिना प्रणीतं
वरिवस्यारहस्यम्
'प्रकाश'-संस्कृतव्याख्यानम् 'सरोजिनी'-
हिन्दीव्याख्यया च सहितम्
प्रथमोऽंशः
───※───
विद्यानां च मनूनां मनुसंख्यानां च विद्यानाम् ।
उपदेष्टा जयतितरां नरसिंहानन्दनाथगुरुः ॥ १ ॥
वरिवस्यारहस्याख्यो ग्रन्थो यः स्वेन¹ निर्मितः ।
तत्र दुर्घटशब्दानामर्थः संक्षिप्य कथ्यते ॥ २ ॥
'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्', 'आचार्यवान् पुरुषो वेद' इत्यादिश्रुत्या
गुरूपसदनस्य तत्त्वज्ञानजनकत्वात् प्रथमं सकलमन्त्राधिष्ठातृदेवतापररूपं गुरुं श्लेषेण
तद्दैवतं नरसिंहं च विघ्नविघाताय स्तुवन् सम्प्रदायं तदाज्ञयैव प्रवर्तयति—
प्रह्लादाभीष्टदाने विबुधसमुदयस्तूयमानापदाने-
ऽशेषक्षोणीभृदन्तः प्रविलसितपदाहोबलक्षेत्रगर्भात् ।
प्रादुर्भूते हिरण्यद्विरदमतिमदध्वान्ततन्त्रं निहन्तुं
धीरे सच्छास्त्रयोनौ मम भुवनगुरावस्तु भक्तिर्नृसिंहे ॥ १ ॥
(भगवान् नृसिंह से उनकी भक्ति की प्राप्ति हेतु निवेदन)
प्रह्लाद को स्वेच्छित पदार्थों का दान देने वाले, देव-समूह द्वारा संस्तुत विक्रम
वाले, समस्त नृपतियों के मध्य सुशोभित चरणों वाले, अहोबल संज्ञक क्षेत्र के
मध्य अहोवल की पत्नी के गर्भ से समुत्पन्न हिरण्यकशिपुरूपी मदान्ध हाथी की
हत्या करने में धैर्यवान्, श्रेष्ठ एवं शुभ शास्त्रों के मूल केन्द्र एवं समस्त भुवनों के
गुरु नृसिंह में मेरी भक्ति (सुदृढ़) हो ॥ १ ॥
१. यस्तेन (?)

२ वरिवस्यारहस्ये

  • प्रकाश *
    प्रह्लादाख्यो दैत्यः, तदभीष्टानां दानं यस्मात्; पक्षे प्रकृष्टो ह्लादो ब्रह्मानन्दः, तस्य,
    अभीष्टानां धर्मार्थकामानां च दानं यस्मात्; तस्मिन् । विबुधानां देवानां पण्डितानां च
    समुदायेन समुदायेन स्तूयमानमपदानं पूर्वचरित्रं यस्य तस्मिन् । ‘अपदानं कर्म वृत्तम्’
    इत्यमरः । हिरण्याख्यो योग्यतया हिरण्यकशिपुः, नामैकदेशे नामग्रहणात्; स एव
    द्विरदः, सिंहवध्यत्वात्; तम् । कीदृशं तम् ? अतिशयितमद एवाऽज्ञानपरिणामत्वाद्
    ध्वान्तम्, तत्तन्त्रं तदधीनम्, मदपरवशमिति यावत्; पक्षे हिरण्यं धनोपलक्षणम्, द्विरदाः
    सेनाङ्गोपलक्षणम्, मतिरसचच्छास्त्रज्ञानम्, तत्सम्बन्धी मदो येषां ॰ तेषां ध्वान्तानां
    ध्वकारोऽन्ते येषां नाम्नि तेषां माध्वानां तन्त्रं शास्त्रं निहन्तुं शेषक्षोणीभृतः शेषाचल-
    स्यान्तः प्रविलसितं शोभमानं पदं स्थानं यस्याहोबलाख्यक्षेत्रस्य, तस्य गर्भान् मध्यात्,
    पक्षे, अशेषाणां समस्तानां क्षोणीभृतां राज्ञां मध्ये प्रविलसिते पदे चरणौ यस्य
    अहोबलाख्यस्य पुरुषधौरेयस्य, तस्य क्षेत्रं पत्नी, तस्या गर्भात्, प्रादुर्भूते; धीरे
    धैर्यशालिनि, पक्षे धियं रातीति धीरः पण्डितस्तस्मिन्; सतां शास्त्राणां योनिः कारणम्,
    ‘यस्य निःश्वसितं वेदाः’, ‘छन्दांसि जज्ञिरे तस्मात्’ इत्यादि श्रवणात्; सच्छास्त्राण्येव
    योनिर्ज्ञापकहेतुर्यस्येति वा, ‘तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि’ इति श्रवणात्, शास्त्रयो-
    नित्वाधिकरणे द्वेधापि व्याख्यानात्; पक्षे सच्छास्त्राणां योनिः कर्ता, ग्रन्थकर्तेति यावत्;
    तस्मिन् भुवनगुरौ नृसिंहे नरकेसरिणि, नृसिंहनामके च मम भक्तिरस्त्विति प्रार्थना ।
    अत्रोपमेयोपमाया उपमाया अभेदस्य वा ध्वनिः । श्लेषोऽलङ्कारः । सोऽपि च
    प्रकृतोभयविषयकः सभङ्गोऽभङ्गश्च । स्रग्धरा वृत्तम् ॥ १ ॥
    आ प्राचः कामरूपाद् द्रुहिणसुतनदप्लावितादा प्रतीचो,
    गान्धारात्१ सिन्धुसान्द्राद्रघुवरचरितादा च सेतोरवाचः ।
    आ केदारादुदीचस्तुहिनगहनतः सन्ति विद्वत्समाजा,
    ये ये तानेष यत्नः सुखयतु समजान् कश्चमत्कर्तुमीष्टे ॥ २ ॥
    (ग्रन्थकार का विद्योपासक विद्वत्समाज के प्रति आत्म निवेदन)
    प्राची दिशा में ब्रह्मपुत्र (नामक) नद से आप्लावित कामरूप तक, पश्चिम
    दिशा में सिन्धु नदी से आप्लावित गान्धार देश तक, दक्षिण दिशा में भगवान्
    राघवेन्द्र के द्वारा (यात्रा के समय) श्रमणीकृत सेतुबंध रामेश्वरम् धाम तक एवं उत्तर
    दिशा में हिमाच्छादित केदारनाथ धाम तक (फैले हुए) विद्वानों (विद्योपासकों) के
    जो-जो समाज विद्यमान हैं उन्हें मेरा यह ('वरिवस्यारहस्यम्' नामक ग्रन्थ-प्रणयन
    रूप) अध्यवसाय आह्लादित करे । भला पशु-गण को कौन व्यक्ति चमत्कृत करने
    की इच्छा करेगा? ॥ २ ॥
  • प्रकाश *
    कामरूपगान्धारौ देशौ । सेतुकेदारौ क्षेत्रे । द्रुहिणसुतब्रह्मपुत्र नदविशेषौ । विदुषां
    विद्योपासकानां समाजाः, ‘न शिल्पादिज्ञानयुक्ते विद्वच्छब्दः प्रयुज्यते’ इत्यादिना
    १. सिन्धुसार्द्राद्रघु०

प्रथमोऽंशः ३
विद्वच्छब्दस्योपासकपरतायास्त्रिशत्यां प्रदर्शनात् । समजाः पशुगणाः । 'पशूनां समजो
ऽन्येषां समाजः इत्यमरः ॥ २ ॥

  • सरोजिनी *
    आ प्राचः = पूर्व दिशा तक । कामरूप = कामरूप (आसाम) नामक
    पूर्वोत्तर प्रदेश । द्रुहिणसुतनद = ब्रह्मपुत्र नामक नद । आप्लावित = बाढ़ के जल
    से डूबा हुआ । (आप्लाव = जल की बाढ़) (आप्लव = आ + प्लु + अप् + ।
    आप्लवन = आ + प्लु + ल्युट्) = डुबकी, गोता, स्नान, चारों ओर पानी का
    छिड़काव ।) प्रतीचो = पश्चिम ।
    गान्धार = भारत के पश्चिम दिशा का एक प्रदेश जो पहले भारत का एक
    प्रदेश था । सिन्धु = सिन्धु नदी । केदार = हिमालयस्थ केदारनाथ नामक
    शिवधाम । रघुवर = रघुनन्दन । चरित = भ्रमण किया हुआ, यात्रा किया हुआ ।
    आसेतो = सेतुबन्ध रामेश्वरम् तक । अवाचः = दक्षिण दिशा । उदीची = उत्तर
    दिशा । तुहिनगहनत = हिमाच्छादित । विद्वत्समाजा = विद्वानों का समुदाय ।
    (भास्कर के मतानुसार—श्रीविद्योपासकों का समुदाय । “विदुषां विद्योपासकानां
    समाजाः न 'शिल्पादिज्ञानयुक्ते विद्वच्छब्दः प्रयुज्यते'—इत्यादिना विद्वच्छब्दस्योपासक-
    परतायास्त्रिंशत्यां प्रदर्शनात्”—आचार्य भास्करराय ।)१
    आचार्य भास्करराय का कथन है कि त्रिशती में इस बात की पुष्टि की गई है
    कि 'विद्वान' शब्द का अर्थ शिल्पादकि विज्ञान में निष्णात व्यक्ति नहीं है प्रत्युत्
    'विद्वान' शब्द का अर्थ है—'श्रीविद्या के उपासक' । 'श्रीविद्या' का क्या अर्थ है?
    'श्रीबीजात्मिका विद्या श्रीविद्येति रहस्यम्' ।२
    समजाः = पशुगण । 'पशूनां समजोऽन्येषां समाजः' । (अमरकोश) आचार्य
    भास्करराय ने 'विद्वत्समाज' शब्द का 'विद्योपासक समाज' के अर्थ में प्रयोग करके
    समस्त वैदुष्य को श्रीविद्या की उपासना का पर्याय स्वीकार कर लिया है ।
    स्पष्ट है कि आचार्य भास्करराय श्रीविद्योपासना को ही जीवन का परम पुरुषार्थ
    एवं वास्तविक ज्ञानोपासना स्वीकार करते हुए उसे सर्वाधिक महत्त्व प्रदान करते हैं ।
    स जयति महान् प्रकाशो यस्मिन् दृष्टे न दृश्यते किमपि ।
    कथमिव तस्मिञ्ज्ञाते सर्वं विज्ञातमुच्यते वेदे ॥ ३ ॥
    (प्रकाशस्वरूप परमशिव की महत्ता)
    उस महिमामय प्रकाश (परमशिव) की जय हो जिसके दृष्टिगत होने पर अन्य
    कुछ भी दृष्टिगत नहीं होता । लेकिन फिर वेद में ऐसा क्यों कहा जाता है कि—
    'उसके ज्ञात होने पर सब कुछ परिज्ञात हो जाता है'? ॥ ३ ॥
    १. भास्करराय-'प्रकाश' २. 'लक्ष्मीधरा' (सौ०ल०टीका)

न (ndhena) -> सम्बन्धेन
ब्र (bra)
ह्म (hma)
णो (ṇo)
ऽ (avagraha)
पि (pi) -> ब्रह्मणोऽपि
भे (bhe)
द (da)
व (va)
त्त्व (ttva)
स्य (sya) -> भेदवत्त्वस्य
स (sa)
त्त्वा (ttvaa)
त् (t) -> सत्त्वात्
Now the next word:
स (sa)
द (da)
स (sa) ? Wait, look at that character!
Is it 'स'?
Wait, look at:
स - द् - द... no!
Wait, could it be:
सं (saṁ)
ब (ba)
न्धि (ndhi)
भ्या (bhyaa)
म् (m)???
LOOK AT IT!
स with anusvara? No, there is a letter:
First letter: स (sa) or सं?
Second letter: ब (ba) or द?
Third letter: न्धि (ndhi) with i-matra! LOOK AT THE I-MATRA!
Fourth: भ्यां (bhyaaṁ)!
Wait: "संबन्धिभ्यामभावो निरूप्यत इति"?!?!
YES! "सम्बन्धिभ्यामभावो निरूप्यते"!
An absence (abhāva) is defined by its relations / relata (sambandhibhyām - prati

प्रथमोऽंशः ५
नित्यत्वम्, मृद्घटयोरभेदेऽपि घटरूपेण ध्वस्तत्वं मृद्रूपेणाध्वस्तत्वं चेत्यादिवद्विरुद्ध-
धर्मनिरासादिकमूह्यमित्यादिकः शाम्भवानन्दकल्पलतायां विस्तरः ॥ ३ ॥

  • सरोजिनी *
    स = वह । समस्त प्राणियों की आत्मा के रूप में विद्यमान तथा निखिल
    विश्व की अन्तरात्मा के रूप में परिज्ञात तथा प्रख्यात वे भगवान् परमशिव । जयति
    = जय हो । सर्वोत्कर्षपूर्वक विद्यमान है (सर्वोत्कर्षेण वर्तते) । महान = महनीय ।
    महिमामय । ‘विशङ्कटं पृथु बृहद्विशालं पृथुलं महत्’ (अमर कोश) । महपूजायाम्
    (भ्वा०प०से०) । मह उत्सव तेजसोः (मेदिनी कोश) । प्रकाश = प्रकाश स्वरूप,
    स्वप्रकाश, पराप्रकाशय । सर्वदा अनावृतात्मस्वरूप ज्योति—‘स्वरूपज्योतिरे वान्तः’
    (आगम) ‘न तत्र सूर्यो भाति’ आदि (उपनिषद्) । यस्मिन् = जिस अधिष्ठान में ।
    दृष्टे = दृष्टिगत होने पर । निर्विकल्पात्मक चरमवृत्ति के विषय बनने पर । न
    दृश्यते किमपि = कुछ भी दिखाई नहीं देता । द्रष्टा के लिए कोई दृश्य रह ही
    नहीं जाता । ‘कथमिव उच्यते वेदे ?’—फिर वेद में ऐसा क्यों कहा जाता है?
    ‘एक के जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है’—ऐसा वेदों में क्यों कहा
    गया है ? इस आत्मविरोधी कथन की सङ्गति कैसे बैठेगी ?
    आचार्य भास्करराय का कथन है कि इस ‘कथमिव उच्यते?’ वाक्यांश को
    प्रस्तुत करने का उद्देश्य शाङ्कर विवर्तवाद का खण्डन करके परिणामवाद की
    स्थापना करना है—‘विवर्तवादं वेदान्तिसम्मतं परिणामवादी दूषयति ।।’
    आचार्य भास्कर कहते हैं¹—‘इच्छा करता हूँ’, ‘जानता हूँ’, इत्यादि वाक्यों में
    उत्तम पुरुषान्तर्भासमान स्फुरणान्वयि ज्ञान ही ‘प्रकाश’ नामक ब्रह्म है । वह सर्वज्ञत्व,
    सर्वेश्वरत्व, सर्वकर्तृत्व, पूर्णत्व, व्यापकत्व आदि शक्तियों से संवलित है । उसका
    आनन्दरूपांश स्फुरण ही ‘परा अहंता’ ‘विमर्श’, पराललिता भट्टारिका, त्रिपुरसुन्दरी
    आदि कहा जाता है । विरूपाक्षपञ्चाशिका के विश्वशरीर स्कन्ध में कहा गया है कि
    ‘ईश्वरता कर्तृत्वं स्वतन्त्रता चित्स्वरूपता चेति ।’
    ‘एतेऽहंतायाः किल पर्यायः सद्भिरुच्यन्ते ।।’—अर्थात् पराहंता के ये
    पर्यायवाची शब्द हैं ।
    पराहंता के मध्य इदन्ता अस्फुरित है । ‘अहं’ एवं ‘इदम्’ के मध्य स्थित जो
    पारस्परिक सम्बन्ध है उसमें अहं जनक है और ‘इदम्’ जन्य है—अहं द्रष्टा है और
    इदं दृश्य है—अहं स्रष्टा है और इदं सृष्टि है ।² अहंता रूपशक्ति से विशिष्ट ब्रह्म
    ही इस ‘इदं’ का सृजन करता है । यह दृश्य विवर्त, नहीं परिणाम है ।³
    यह दृश्य उसी परासत्ता का परिणाम है—‘तच्च दृश्यं तत्परिणाम एव’
    १-२. ‘प्रकाश’ नामक टीका
    ३. प्रकाश । ‘शिवादिक्षित्यन्तरूपेण परिणामत इत्यर्थः । यथा क्षीरं दध्याकारेण
    परिणामते तथा चिच्छक्तिरेव सर्वाकारेण परिणामते ।’ (‘दीपिका’ अमृतानन्द)