वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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कूटत्रय में वर्ण संख्या १४ १२२
'कामकला', 'त्रिकोण' एवं 'हल्लेखा' का उच्चारणकाल १५-१६ १२३
नाद, वाग्भवकूट, कामराजकूट एवं शक्तिकूट
का मात्रा-काल १७-१८ १३७
मन्त्राक्षरों के उच्चारण-स्थान १९ १३८
प्रथम कूट एवं द्वितीय का स्वरूप २०-२१ १४०
नाद एवं बिन्दु का स्वरूप २२ १४७
अर्द्धचन्द्र एवं रोधिनी का स्वरूप २३ १४७
नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना एवं उन्मना
का स्वरूप २४-२७ १४७
नादोच्चारण की प्रक्रिया २८-३० १४७
कूटत्रय का उच्चारण-काल ३१ १६४
कूटत्रय में बीज चतुष्टय ३२ १६५
बीज चतुष्टय ३३-३४ १६५
ब्रह्मादिक देवत्रय एवं उनकी शक्तियों
की मन्त्राक्षररूपता ३५-३६ १६८
जागृतावस्था और रेफस्थ प्रकाश के
अंतर्संबंध का प्रतिपादन ३७ १८०
वप्नावस्था एवं मन्त्राक्षर 'ई' में स्थित प्रकाश के
अंतर्संबंध का विवेचन ३८ १८१
सुषुप्ति का स्वरूप ३९ १८२
तुरीयावस्था का स्वरूप ४० १८२
तुर्यातीतावस्था का स्वरूप ४१ १८४
बिन्दु एवं पञ्चशून्य-अन्तर्संबंध ४२ १८६
महाशून्य की भावना एवं 'प्राणविषुव' का स्वरूप ४३ १८६
'मन्त्रविषुव' का स्वरूप ४४ १९०
नाडिकाविषुव' का स्वरूप ४५-४६ १९२
प्रशान्तविषुव' का स्वरूप ४७ १९९
'शक्तिविषुव' एवं 'कालविषुव' का स्वस्वरूप ४८ २००