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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 530 में से

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७६ वरिवस्यारहस्ये
५३. मन्त्र-जप के समय त्याज्य कर्म—
व्रात्य, नास्तिक, पतित आदि से संभाषण, उच्छिष्ट मुख से वार्तालाप,
असत्यभाषण, कुटिलभाषण, अनुष्ठान के समय-शपथ लेना, पहनने का वस्त्र
ओढ़कर जप करना, बिना आसन के जप करना, बिना माला ढके या सिर ढककर
जप करना, चलते या खाते समय जप करना, जूता पहनकर, पैर फैलाकर जप
करना आदि निषिद्ध कार्य हैं। शास्त्रकारों ने अन्त में यह निर्णय किया कि—
“अशुचिर्वा शुचिर्वा गच्छंस्तिष्ठन स्वपन्नपि । मन्त्रैकशरणो विद्वान् मनसैव
सदाभ्यसेत् । न दोषो मानसे जाप्ये सर्वदेशेऽपि सर्वदा ॥
५४. जप की श्रेष्ठता का तारतम्य—
पद्मपुराण एवं नारदपुराण में कहा गया है कि—समस्त यज्ञ वाचिक जप की
तुलना में सोलहवें हिस्से के बराबर हैं । वाचिक जप से सौ गुना उपांशु एवं
सहस्रगुना मानस जप श्रेष्ठतर है । 'मानस जप' = जिसमें अर्थ-चिन्तन करते हुए
मन से ही मन्त्र के वर्ण, स्वर एवं पदों की बार-बार आवृत्ति की जाती है । तीनों
जपों में इष्ट का चिन्तन आवश्यक है । स्तोत्र का मानसिक पाठ, या जोर-जोर से
मन्त्र-जप दोनो निषिद्ध हैं । गौतमीतन्त्र में कहा गया है—केवल वर्णों के रूप में
मन्त्र की स्थिति उसकी जड़ता एवं पशुता है । सुषुम्णा द्वारा उच्चारित होने पर
उसमें शक्ति-सञ्चार होता है । प्रथम भावना यह करनी चाहिए कि मन्त्र का एक-एक
अक्षर चिच्छक्ति से ओत-प्रोत है एवं परम् अमृतरूप चिदाकाश में उसकी स्थिति
है। इस भावना के साथ किया गया जप, होम आदि के बिना ही सिद्ध हो जाते
हैं। प्राणबुद्धि से सुषुम्णा के मूलदेश में स्थित जीवरूप से मन्त्र का चिन्तन करके
मन्त्रार्थ एवं मन्त्र-चैतन्य के साथ जप करना चाहिए ।। 'कुलार्णवतन्त्र' में कहा गया
है कि—मन एक स्थान पर, शिव दूसरे स्थान पर, शक्ति तीसरे स्थान पर, एवं
प्राण चौथे स्थान पर होने पर भला मन्त्रसिद्धि कैसे हो?
५५. मांत्री-दीक्षा एवं मन्त्राधिकार—
कौन सा मन्त्र किस साधक के अनुकूल है तथा साधक किस मन्त्र को ग्रहण
करने का अधिकारी है इस सम्बंध में निम्न कसौटियाँ हैं—१. कुलाकुल चक्र, २.
राशिचक्र, ३. नक्षत्र चक्र, ४. अकडम चक्र, ५. अकथह चक्र, ६. ऋणि-धनि
चक्र । (स्थानाभाव के कारण इन पर विस्तार से प्रकाश डालना संभव नहीं है ॥)
५६. जप के प्रकार—
जप के अनेक प्रकार हैं यथा—१. 'वाचिक', २. 'उपांशु', ३. 'मानस' ।
आचार्य अभिनवगुप्त कहते हैं—'आत्मा न शृणुते यं स मानसो जप उच्यते ।
आत्मना शृणुते यस्य तमुपांशु विजानते ॥” (तन्त्रालोक) । नित्य, नैमित्तिक,
प्रायश्चित, भ्रामरी आदि अनेक जप होते हैं । 'वज्रजप' = प्राणवायु के शासन के
द्वारा, वायु को मध्यममार्ग में प्रविष्टकर चक्रों का भेदन किया जाता है और