सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 102

१० वरिवस्यारहस्ये
मन्त्रगत 'स क ल' पद का अर्थ १४५ ३७३
'स' 'क' 'ल'—मन्त्राक्षर का अर्थ १४६ ३७३
मन्त्रार्थ विषयक सर्वमान्यता का प्रतिपादन १४८ ३८०
भावार्थादिक अर्थ-प्रकारों का महत्त्व १४९ ३८१
मन्त्र के अर्थ के निर्णय के विषय में भगवान् शिव
के वचनों की निर्णायक भूमिका का प्रतिपादन १५० ३८२
शब्द के अर्थग्रह में ईश्वरेच्छा की भूमिका १५१ ३८२
वर्ण एवं उनके अर्थ का अन्तर्संबंध १५२ ३८२
अनेकार्थी शब्दों से विशेषार्थ-ग्रहण के कारक तत्त्व १५३ ३८३
मन्त्रार्थ की दिशा में विशेषक की अपेक्षा
सर्वबोध का प्रतिपादन १५४ ३८४
मन्त्र एवं वाक्य अन्तर्संबंध १५५ ३८५
मन्त्र-विनियोग की दो दिशाएँ १५६ ३८६
'निगमन' के प्रमाणार्थ मुख्योपाय १५७ ३८६
अलौकिक अपूर्व प्रयोजन १५८ ३८७
श्रीविद्या की उपासना के आन्तरिक अङ्ग १५९ ३८८
श्रीविद्या के बाह्य अङ्गों का विवेचन १६०-१६१ ३८८
श्रीविद्या की उपासना में आन्तरिक अङ्ग की प्रधानता १६२ ३९४
बाह्याडम्बरोपासना का खण्डन १६३ ३९६
कामकला बीज से मूलमन्त्र एवं मूलमन्त्र से शरीर के
बाह्य एवं आन्तरिक विकास का विवेचन १६४ ३९९
'श्रीविद्या' की गुरु-परम्परा से प्राप्ति की अनिवार्यता १६५ ४०१
गुरु-चरणों की वन्दना १६६ ४०२
प्रस्तुत ग्रन्थ-प्रणयन के पीछे गुरु-कृपा का प्रतिपादन १६७ ४११
श्लोकार्धानुक्रमणिका ४१५-४२१
—*—