वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८० वरिवस्यारहस्ये
प्रसवो देवि क्लीबस्य द्रवमेव च । अग्निमुक्ता यदा विप्रास्तदा एते तु निष्फलाः ।
आदिमान्त्य विहीनानि मन्त्राणि च तथैव च । निष्फलानि भवन्त्येवं पिबतो
मृगतृष्णिकाम् ।¹
अहं परामर्शात्मक मन्त्र सभी लक्ष्यों की पूर्ति करने में समर्थ होते है—आचार्य
अभिनवगुप्त कहते है—"एतद्रूप परामर्शकृत्रिम मनाविलम् । अहमित्याहुरेषैव
प्रकाशस्य प्रकाशता । एतद्वीर्यं हि सर्वेषां मन्त्राणां हृदयात्मकम् । विनानेन जडास्ते
स्युर्जीवा इव बिना हृदा । अंकृत्रिमै तद्धृदया रूढो यत्किंचिदाचरेत् । प्राण्याद्वा
विमृशेद्रापि स सर्वोऽस्य जपो मतः ॥"²
वही गुरु भी है जो अहमात्मक परामर्श का ज्ञाता हो—
"गुरोर्लक्षणमेतावदादिमान्त्यं च वेद्येत् ।
पूज्यः सोऽहमिव ज्ञानी भैरवोदेवतात्मकः ॥"³
६२. 'मन्त्र' और कुण्डलिनी—
सारे मन्त्रों का मूल भगवती कुण्डलिनी है । वे परममन्त्र (मन्त्राधिराज) या
मूलमन्त्र ओंकार का स्वस्वरूप हैं । सारे वर्ण, सारे मन्त्रों के नाद, सारे मन्त्र, सारे
देवता, सारे पीठ, सारी वाणियाँ कुण्डलिनी के शरीर में ही स्थित हैं । 'मूलमन्त्र'
भगवती कुण्डलिनी अपने 'परावाक्' या 'शब्दब्रह्म' का स्वस्वरूप है । वे ही
जगज्जननी भी हैं और मातृका भी, वे ही नाद भी है और मन्त्र भी । वे ही
(मन्त्ररूप) वाचक भी है और वाच्य भी ।
[चित्र-विवरण:]
(दाहिनी ओर के विवरण:)
'महामन्त्रात्मिका कुण्डलिनी' ('विमर्श' शक्ति)
'प्रकाश' (सहस्रारस्थ परमशिव)
मूलमन्त्र (ओंकार)
देवी मातृका भी हैं—
'पराशक्तिस्तु मातृका' (यो०ह०)
वे मन्तरूपिणी भी हैं—
'ज्ञातृ ज्ञान मयाकार मननान्मंत्ररूपिणी' (यो०ह०)
(चित्र के भीतर वृत्त-स्तर:)
ॐ ॐ ॐ
परावाक् शब्दब्रह्म
ॐ ॐ ॐ
पश्यन्तीवाक्
मध्यमावाक्
वैखरीवाक्
(बाईं ओर के विवरण:)
ॐ
↓
पश्यन्ती
↓
मध्यमा
↓
वैखरी
'देवीं मन्त्रमयीं नौमि मातृका पीठरूपिणीम् ॥'
१. 'विवेक' में उद्धृत २. तन्त्रालोक (४।१९२-१९४)
३. तन्त्रालोक