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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 530 में से

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पृष्ठ 93

भूमिका ८१
६३. वर्णात्मक 'मन्त्र' एवं ध्वन्यात्मक 'मन्त्र'—
'मन्त्र' के दो रूप हैं—१. वर्णात्मक, २. ध्वन्यात्मक ॥ वर्णात्मक नाम
(मन्त्र) वे हैं जो बोले जा सकते हैं, सुने जा सकते हैं, जपे जा सकते हैं और
लिखे जा सकते हैं । 'ध्वन्यात्मकमन्त्र' वे हैं जिसका न तो जीभ से जप किया जा
सकता है, न उन्हें लिखा जा सकता है, न उन्हें बोला जा सकता है और न उन्हें
सुना ही जा सकता है । यह वह ध्वनिमूलक एवं शक्तिपुञ्ज अक्षरसमष्टि है जो हृदय,
नाभि, मूलाधार आदि चेतन-केन्द्रों से स्वतः आविर्भूत होता है । यह नादात्मक है
और स्वयंभू है । 'मध्यमा', 'पश्यन्ती' एवं 'परावाक्' के केन्द्रों से इनका आविर्भाव
होता है । 'मन्त्र' जप करने की वस्तु नहीं है प्रत्युत् होने की वस्तु है ।
६४. 'मन्त्र' और देवता-पारस्परिक अन्तर्सबन्ध—
मन्त्र और देवता में तत्त्वतः अभिन्नता है । जो मन्त्र है वही देवता है और जो
देवता है वही मन्त्र है । दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । अन्तर केवल यह
है कि एक 'नाम' है और दूसरा 'नामी', एक वाचक है और दूसरा वाच्य ।
'देवता' वाच्य है—नामी है और 'मन्त्र' वाचक है—नाम है । 'वातुलशुद्धाख्यतन्त्र'
में कहा गया है कि 'मन्त्र देवतारूप है । और यह जगत् मन्त्ररूप है'—"मन्त्रस्तु
देवता रूपं मन्त्ररूपमिदं जगत् ॥"१
६५. 'मन्त्र' और उसका महत्व—
'मन्त्र' से ही जगत् की उत्पत्ति होती है, मन्त्र से ही जगत् का पालन होता
है और मन्त्र से ही जगत् का विनाश होता है । 'मन्त्र' ही जगत् की सृष्टि, स्थिति
एवं संहार तीनों का अधिष्ठान है । 'मन्त्र' से ही ३३ कोटि देवता, तीनों लोक,
चौदहों भुवन, चौदहों विद्याएँ, समस्त अण्ड (शाक्ताण्ड, मायाण्ड, प्रकृत्यण्ड,
ब्रह्माण्ड) देवत्रय, सप्तलोक (तल, अतल, रसातल आदि), समस्त वर्णमाला,
समस्त विद्याएँ एवं समस्त सत्ताएँ अस्तित्व में आती हैं ।
मारण, मोहन, उच्चाटन, विद्वेषण, स्तंभन, आकर्षण आदि समस्त क्रियाएँ
मन्त्र द्वारा ही संपादित हैं—'कर्षणादि क्रियाः सर्वामन्त्रेणैव प्रकीर्तिताः ॥'२
बिना 'मन्त्र' के कोई क्रिया संभव ही नहीं है—
'तस्मान्मन्त्र क्रियार्थत्वाद्विना मन्त्रं क्रिया न च ॥'३
'मन्त्र' के द्वारा ही देवों की स्थापना होती हैं, मन्त्रों के द्वारा ही यज्ञ आदि
क्रियाओं का निष्पादन होता है, मन्त्र द्वारा ही स्नान, आहुति, तर्पण, प्रायश्चित,
दीक्षा आदि क्रियाएँ सम्पन्न की जाती हैं तथा मन्त्र द्वारा अणिमादिक सिद्धियाँ एवं
सालोक्य आदि मुक्तियाँ प्राप्त की जाती हैं—मन्त्रों द्वारा ही सारे पापों से मुक्ति प्राप्त
की जाती है ।
१-२. वातुल शुद्धाख्य तन्त्र