वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
DevanagariHindipublished530 पृष्ठ
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प्रथमोऽंशः ३
विद्वच्छब्दस्योपासकपरतायास्त्रिशत्यां प्रदर्शनात् । समजाः पशुगणाः । 'पशूनां समजो
ऽन्येषां समाजः इत्यमरः ॥ २ ॥
- सरोजिनी *
आ प्राचः = पूर्व दिशा तक । कामरूप = कामरूप (आसाम) नामक
पूर्वोत्तर प्रदेश । द्रुहिणसुतनद = ब्रह्मपुत्र नामक नद । आप्लावित = बाढ़ के जल
से डूबा हुआ । (आप्लाव = जल की बाढ़) (आप्लव = आ + प्लु + अप् + ।
आप्लवन = आ + प्लु + ल्युट्) = डुबकी, गोता, स्नान, चारों ओर पानी का
छिड़काव ।) प्रतीचो = पश्चिम ।
गान्धार = भारत के पश्चिम दिशा का एक प्रदेश जो पहले भारत का एक
प्रदेश था । सिन्धु = सिन्धु नदी । केदार = हिमालयस्थ केदारनाथ नामक
शिवधाम । रघुवर = रघुनन्दन । चरित = भ्रमण किया हुआ, यात्रा किया हुआ ।
आसेतो = सेतुबन्ध रामेश्वरम् तक । अवाचः = दक्षिण दिशा । उदीची = उत्तर
दिशा । तुहिनगहनत = हिमाच्छादित । विद्वत्समाजा = विद्वानों का समुदाय ।
(भास्कर के मतानुसार—श्रीविद्योपासकों का समुदाय । “विदुषां विद्योपासकानां
समाजाः न 'शिल्पादिज्ञानयुक्ते विद्वच्छब्दः प्रयुज्यते'—इत्यादिना विद्वच्छब्दस्योपासक-
परतायास्त्रिंशत्यां प्रदर्शनात्”—आचार्य भास्करराय ।)१
आचार्य भास्करराय का कथन है कि त्रिशती में इस बात की पुष्टि की गई है
कि 'विद्वान' शब्द का अर्थ शिल्पादकि विज्ञान में निष्णात व्यक्ति नहीं है प्रत्युत्
'विद्वान' शब्द का अर्थ है—'श्रीविद्या के उपासक' । 'श्रीविद्या' का क्या अर्थ है?
'श्रीबीजात्मिका विद्या श्रीविद्येति रहस्यम्' ।२
समजाः = पशुगण । 'पशूनां समजोऽन्येषां समाजः' । (अमरकोश) आचार्य
भास्करराय ने 'विद्वत्समाज' शब्द का 'विद्योपासक समाज' के अर्थ में प्रयोग करके
समस्त वैदुष्य को श्रीविद्या की उपासना का पर्याय स्वीकार कर लिया है ।
स्पष्ट है कि आचार्य भास्करराय श्रीविद्योपासना को ही जीवन का परम पुरुषार्थ
एवं वास्तविक ज्ञानोपासना स्वीकार करते हुए उसे सर्वाधिक महत्त्व प्रदान करते हैं ।
स जयति महान् प्रकाशो यस्मिन् दृष्टे न दृश्यते किमपि ।
कथमिव तस्मिञ्ज्ञाते सर्वं विज्ञातमुच्यते वेदे ॥ ३ ॥
(प्रकाशस्वरूप परमशिव की महत्ता)
उस महिमामय प्रकाश (परमशिव) की जय हो जिसके दृष्टिगत होने पर अन्य
कुछ भी दृष्टिगत नहीं होता । लेकिन फिर वेद में ऐसा क्यों कहा जाता है कि—
'उसके ज्ञात होने पर सब कुछ परिज्ञात हो जाता है'? ॥ ३ ॥
१. भास्करराय-'प्रकाश' २. 'लक्ष्मीधरा' (सौ०ल०टीका)