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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 107, कुल 530 में से

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पृष्ठ 107

प्रथमोऽंशः ५
नित्यत्वम्, मृद्घटयोरभेदेऽपि घटरूपेण ध्वस्तत्वं मृद्रूपेणाध्वस्तत्वं चेत्यादिवद्विरुद्ध-
धर्मनिरासादिकमूह्यमित्यादिकः शाम्भवानन्दकल्पलतायां विस्तरः ॥ ३ ॥

  • सरोजिनी *
    स = वह । समस्त प्राणियों की आत्मा के रूप में विद्यमान तथा निखिल
    विश्व की अन्तरात्मा के रूप में परिज्ञात तथा प्रख्यात वे भगवान् परमशिव । जयति
    = जय हो । सर्वोत्कर्षपूर्वक विद्यमान है (सर्वोत्कर्षेण वर्तते) । महान = महनीय ।
    महिमामय । ‘विशङ्कटं पृथु बृहद्विशालं पृथुलं महत्’ (अमर कोश) । महपूजायाम्
    (भ्वा०प०से०) । मह उत्सव तेजसोः (मेदिनी कोश) । प्रकाश = प्रकाश स्वरूप,
    स्वप्रकाश, पराप्रकाशय । सर्वदा अनावृतात्मस्वरूप ज्योति—‘स्वरूपज्योतिरे वान्तः’
    (आगम) ‘न तत्र सूर्यो भाति’ आदि (उपनिषद्) । यस्मिन् = जिस अधिष्ठान में ।
    दृष्टे = दृष्टिगत होने पर । निर्विकल्पात्मक चरमवृत्ति के विषय बनने पर । न
    दृश्यते किमपि = कुछ भी दिखाई नहीं देता । द्रष्टा के लिए कोई दृश्य रह ही
    नहीं जाता । ‘कथमिव उच्यते वेदे ?’—फिर वेद में ऐसा क्यों कहा जाता है?
    ‘एक के जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है’—ऐसा वेदों में क्यों कहा
    गया है ? इस आत्मविरोधी कथन की सङ्गति कैसे बैठेगी ?
    आचार्य भास्करराय का कथन है कि इस ‘कथमिव उच्यते?’ वाक्यांश को
    प्रस्तुत करने का उद्देश्य शाङ्कर विवर्तवाद का खण्डन करके परिणामवाद की
    स्थापना करना है—‘विवर्तवादं वेदान्तिसम्मतं परिणामवादी दूषयति ।।’
    आचार्य भास्कर कहते हैं¹—‘इच्छा करता हूँ’, ‘जानता हूँ’, इत्यादि वाक्यों में
    उत्तम पुरुषान्तर्भासमान स्फुरणान्वयि ज्ञान ही ‘प्रकाश’ नामक ब्रह्म है । वह सर्वज्ञत्व,
    सर्वेश्वरत्व, सर्वकर्तृत्व, पूर्णत्व, व्यापकत्व आदि शक्तियों से संवलित है । उसका
    आनन्दरूपांश स्फुरण ही ‘परा अहंता’ ‘विमर्श’, पराललिता भट्टारिका, त्रिपुरसुन्दरी
    आदि कहा जाता है । विरूपाक्षपञ्चाशिका के विश्वशरीर स्कन्ध में कहा गया है कि
    ‘ईश्वरता कर्तृत्वं स्वतन्त्रता चित्स्वरूपता चेति ।’
    ‘एतेऽहंतायाः किल पर्यायः सद्भिरुच्यन्ते ।।’—अर्थात् पराहंता के ये
    पर्यायवाची शब्द हैं ।
    पराहंता के मध्य इदन्ता अस्फुरित है । ‘अहं’ एवं ‘इदम्’ के मध्य स्थित जो
    पारस्परिक सम्बन्ध है उसमें अहं जनक है और ‘इदम्’ जन्य है—अहं द्रष्टा है और
    इदं दृश्य है—अहं स्रष्टा है और इदं सृष्टि है ।² अहंता रूपशक्ति से विशिष्ट ब्रह्म
    ही इस ‘इदं’ का सृजन करता है । यह दृश्य विवर्त, नहीं परिणाम है ।³
    यह दृश्य उसी परासत्ता का परिणाम है—‘तच्च दृश्यं तत्परिणाम एव’
    १-२. ‘प्रकाश’ नामक टीका
    ३. प्रकाश । ‘शिवादिक्षित्यन्तरूपेण परिणामत इत्यर्थः । यथा क्षीरं दध्याकारेण
    परिणामते तथा चिच्छक्तिरेव सर्वाकारेण परिणामते ।’ (‘दीपिका’ अमृतानन्द)