वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविषयानुक्रमणिका ८७
'तत्त्वविषुव' का स्वरूप ४९-५१ २०३
जप का लक्षण ५२ २०४
ग्रन्थ के पूर्वांश की समाप्ति की अनुज्ञप्ति ५३ २२०
द्वितीयोंऽशः
अर्थ-ज्ञान-शून्य अनुष्ठित जप की व्यर्थता ५४-५५ २२२
मन्त्रार्थों का परिज्ञान आवश्यक क्यों? ५६ २२३
अर्थों के विभिन्न भेद ५७-५९ २२५
गायत्री मन्त्र एवं पञ्चदशी मन्त्र के मन्त्राक्षरो के अर्थ
में साम्य का प्रतिपादन ६० २२९
गायत्री मन्त्र एवं पञ्चदशीमन्त्र के वर्णों
की परस्पर वाचकता ६१ २३६
पञ्चदशी एवं गायत्री मन्त्र के वर्णों का अन्तर्संबन्ध ६२ २३९
कूटद्वय के शेष अक्षरों के उद्धार की प्रक्रिया एवं
गायत्री विद्या की अर्थ-पद्धति ६३ २४१
युगलत्रय, कूटत्रय एवं ईकारत्रय—एक विवेचन ६४-६५ २४१
मिथुनत्रय एवं कूटत्रय में अंतर्संबंध ६६ २४६
पञ्चदशाक्षरी विद्या का स्वस्वरूप ६७ २४८
परात्परशक्ति का सप्त शक्तियों एवं छत्तीस तत्त्वों से
तादात्म्यभाव ६८ २४८
अकार एवं हकार की ब्रह्मरूपता ६९ २५४
सिसृक्षुब्रह्म की सृजन-प्रक्रिया ७० २५४
'विसर्ग', 'काम' एवं 'रति' का स्वरूप ७१ २५५
शाब्दीसृष्टि एवं आर्थी सृष्टि का मूल कारण ७२ २५५
'भावार्थ' का स्वरूप ७३ २५५
ह क र स ल—वर्ण तथा इनका पञ्चभूतों से
सम्बन्ध एवं संप्रदायार्थ ७४ २६४
वर्णों द्वारा गुणोत्पत्ति एवं कामकला द्वारा
स्पर्शोत्पत्ति का प्रतिपादन ७५ २६८