वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८ वरिवस्यारहस्ये
जिस मन्त्र का जो देवता है उसके आकार का स्मरण करते हुए—अर्थात्
देवाकार का ध्यान करते हुए—मन से जप करना चाहिए—
'यस्य यस्य च मन्त्रस्य उद्दिष्टा या च देवता ।
चिन्तयित्वा तदाकारं मनसा जपमाचरेत् ॥' १
५९. देवता—
प्रत्येक 'मन्त्र' वाचक है और वाच्य है 'देवता' । 'देवता' मन्त्र का अर्थ है ।
'तज्जपस्तदर्थ भावनम्' (यो०सूत्र) के दो अर्थ हैं—
(क) अभीष्ट देवता के मन्त्र का अर्थ-भावन ।
(ख) अभीष्ट मन्त्र के अर्थ (अर्थात् मन्त्र के देवता) का भावन ।
'वरिवस्यारहस्यम्' एवं भास्करराय का देवता भगवती त्रिपुरसुन्दरी हैं और
उनका 'यंत्र' श्रीचक्र है । 'त्रिपुरसुन्दरी' कौन हैं?
सहस्रदल कमल के मध्य स्थित जो चन्द्रमण्डल या बैन्दवस्थान है उसकी
चिन्मयी एवं आनन्दरूपा कला ही आत्मा कही जाती है और उसे ही 'त्रिपुरसुन्दरी'
कहते हैं । इस चन्द्रमा की प्रथमाकला प्रतिपदा है । यह प्रतिपदा की कला ही
त्रिपुरसुन्दरी कला है ।
'सुन्दरी' की उपासना की दो पद्धतियाँ हैं—१. 'बहिर्याग', २. 'अन्तर्याग' ।
आचार्य भास्कर ने वरिवस्यारहस्यम् में मन्त्रजप को श्रेष्ठतम माना है । भगवती
त्रिपुरा के तीन रूप हैं—१. 'स्थूल', २. 'सूक्ष्म', ३. 'पर' । 'अन्तर्याग' भी
त्रिविध है—१. 'सकल' २. 'सकल निष्कल', ३. 'निष्कल' । ('सेतुबंध' पृ० ५)
मन्त्र-जप को भास्कर ने श्रेष्ठतम साधना स्वीकार किया है । 'याग' द्विविध है । ये
दोनों साधना-पद्धतियाँ हैं । 'बहिर्याग'—'बहिर्यागः पात्रासनादि शान्तिस्तवन्तः कर्म-
समूहः । 'अन्तर्याग'—अन्तर्यागो नामाधाराद्ब्राजदन्तान्तं तेनस्तन्तोर्विभावनम् । मानसी
देवपूजा वा । ('सौभाग्यभास्कर' पृ० ५)
नादात्मक मन्त्र-साधना—श्वास-प्रश्वास अन्तर्मुख होकर 'नाद' में परिणत हो
जाते हैं । नाद के साथ प्राणायाम करने से इष्टमन्त्रोच्चार द्वारा मन्त्र क्रमशः नादमय
हो जाता है । प्राणवायु का नाद के आंकार में परिणत होकर क्रमशः बिन्दु में
स्थिति-लाभ करने से मन्त्रसिद्धि होती है । नादमय मन्त्र ही जाग्रत मन्त्र है । जप
का मन्त्र नादात्मक है । ब्रह्म के दो रूप हैं—१. 'शब्द', २. 'ज्योति' । 'नाद'—
इष्टमन्त्र का स्फुरण । 'ज्योति'—इष्टमूर्ति का आविर्भाव ।
त्रिपुरसुन्दरी का स्वरूप—देवी मूलमन्त्र, कूटत्रय एवं कुलामृत हैं । वे
मूलाधारैकनिलया, ब्रह्मग्रंथिविभेदिनी, मणिपूरान्तरुदिता, विष्णुग्रन्थिविभेदिनी, आज्ञा-
चक्रान्तरालस्था, रुद्रग्रंथिविभेदिनी सहस्राम्बुजारूढा एवं सुधासाराभिवर्षिणी हैं—
'मूलाधारैकनिलया ब्रह्मग्रंथिविभेदिनी । मणिपूरान्तरुदिता विष्णुग्रंथिविभेदिनी । आज्ञा-
१. शाक्तानन्द तरंगिणी