सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 101

विषयानुक्रमणिका ८९
विद्याक्षरों द्वारा चक्रोत्पत्ति-प्रक्रिया ९९-१०० ३१०
'गुरु' की देवी, विद्या, एवं चक्र के साथ अभिन्नता
एवं गणेश के साथ अभेदात्मकता का प्रतिपादन १०१ ३१२
'कौलिकार्थ' का स्वरूप १०२ ३१४
कुलकुण्डलिनी का स्वरूप एवं मूलस्थान १०३-१०६ ३१६
कुलकुण्डलिनी एवं श्रीविद्या का रहस्यार्थ १०७ ३२४
श्रीविद्या के 'महातत्त्वार्थ' का स्वरूप १०८-१०९ ३४३
'नामार्थ' एवं 'शब्दरूपार्थ' का स्वरूप ११० ३४४
देवी के नाम एवं मन्त्राक्षर १११-११२ ३४७
शक्तिसमूहार्थ का स्वरूप ११५ ३५१
प्रथमकूट के छः वर्णों, तीन दम्पतियों एवं
कामकला में अभिन्नता का प्रतिपादन ११६ ३५४
शाक्तार्थ का स्वरूप ११७-११८ ३५७
श्रीविद्या के सामरस्यार्थ का स्वरूप ११९ ३५८
सामरस्यार्थ का स्वरूप १२० ३६०
'ककार' एवं 'एकार' का अर्थ १२१ ३६१
मन्त्राक्षर 'क' 'ए' एवं 'ई' का अर्थ १२२ ३६३
लहरी, ह, क, ई, स, म कूटत्रय एवं ह्रीँ
आदि का रहस्यार्थ १२३-१३० ३६४
सिद्धों द्वारा स्थापित मन्त्रार्थों की व्याकरण द्वारा
पुष्टि की अनिवार्यता का प्रतिपादन १३१-१३२ ३६६
मन्त्र के 'समस्तार्थ' के स्वरूप का विवेचन १३३ ३६७
सगुणार्थ का स्वरूप १३४-१३६ ३६८
ह स क ह ल का अर्थ १३७-१३९ ३७०
तृतीयकूट एवं सगुणार्थ के स्वरूप का विवेचन १४० ३७१
मन्त्रगत 'ककार', 'एकार' एवं 'अकार' की त्रिदेवों
से तदात्मता का प्रतिपादन १४१ ३७१
पंचदशी मंत्रगत 'ह स क ह ल' के अर्थ का विवेचन १४३ ३७३
तृतीयकूट द्वारा जीवब्रह्मैक्य की स्थापना का प्रतिपादन १४४ ३७३