सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 95, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 95

।`

Let's check line 25:
(क) मन्त्र का धर्म है—१. मनन, २. त्राण ।

Let's check line 26:
(ख) मन्त्र का बल है—निरावणा चित् शक्ति का उल्लास ।

Let's check line 27:
अर्थात् 'पराशक्ति' । उसी शक्ति को लेकर 'मन्त्र' सहज नादशक्ति से

Let's check line 28:
उद्बोधित होकर प्रदीप्त होते हैं । उनमें सर्वज्ञता आदि का बल आ जाता है । जब

Let's check line 29:
सिद्ध व्यक्ति उनका प्रयोग करता है तब वे 'अनुग्रह' एवं 'निग्रह' करने में सक्षम हो

Let's check line 30:
जाते हैं ।

Let's check line 31:
'त्रिकसार' में कहा गया है कि—"वर्णातीत निराकार परमतत्त्व का बोध हो

Let's check line 32:
जाने पर 'मन्त्र' मन्त्राधिपों के किङ्कर हो जाते हैं (वशीभूत हो जाते हैं ।) यदि ऐसा

Let's check footnotes:
Horizontal line above footnotes.
१. श्रीमत्ज्ञानोत्तर २. वरदराज—'शिवसूत्र वार्तिक'
`३. श्रीकण्ठी संहिता ४. तन्त्रसद्