वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
पृष्ठ 95, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें।`
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(क) मन्त्र का धर्म है—१. मनन, २. त्राण ।
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(ख) मन्त्र का बल है—निरावणा चित् शक्ति का उल्लास ।
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अर्थात् 'पराशक्ति' । उसी शक्ति को लेकर 'मन्त्र' सहज नादशक्ति से
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उद्बोधित होकर प्रदीप्त होते हैं । उनमें सर्वज्ञता आदि का बल आ जाता है । जब
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सिद्ध व्यक्ति उनका प्रयोग करता है तब वे 'अनुग्रह' एवं 'निग्रह' करने में सक्षम हो
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जाते हैं ।
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'त्रिकसार' में कहा गया है कि—"वर्णातीत निराकार परमतत्त्व का बोध हो
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जाने पर 'मन्त्र' मन्त्राधिपों के किङ्कर हो जाते हैं (वशीभूत हो जाते हैं ।) यदि ऐसा
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१. श्रीमत्ज्ञानोत्तर २. वरदराज—'शिवसूत्र वार्तिक'
`३. श्रीकण्ठी संहिता ४. तन्त्रसद्