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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 530 में से

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भूमिका ७९
चक्रान्त रालस्था रूद्रग्रंथिविभेदिनी । सहस्राम्बुजारूढा सुधासाराभिवर्षिणी ।।' वे
'षट्चक्रों परिसंस्थिता महाशक्ति कुण्डलिनी' भी है । वे जगन्माता हैं । वे जगदात्मा
हैं । भास्करराय इन्हीं ललिताम्बिका राजराजेश्वरी महात्रिपुरसुन्दरी के उपासक थे । वे
कहते हैं— 'दयतां देशिकात्मा मे देवि श्रीललिताम्बिका । भगवती ललिता विश्वविग्रहा,
सर्वदेवात्मिका, सर्ववर्णात्मिका एवं मन्त्रात्मिका हैं ।
६०. यन्त्र—
'श्रीचक्र' — 'श्रीचक्र' नवयोन्यात्मक है । इसकी ९ योनियाँ, निम्न हैं—१.
'मध्यत्रिकोण', २. 'अष्टार', ३. 'अन्तर्दशार', ४. 'बहिर्दशार', ५. 'चतुर्दशार', ६.
'अष्टदलपद्म', ७. 'षोडशदलपद्म', ८. 'वृत्तत्रय', ९. 'भूपूर' ।। इनमें अधोमुख ५
त्रिकोण 'शक्तित्रिकोण' एवं ४ त्रिकोण ऊर्ध्वमुख एवं 'शिवत्रिकोण' कहलाते हैं ।
'संहारक्रम' में 'शक्तित्रिकोण', 'ऊर्ध्वमुख' एवं 'शिवत्रिकोण' अधोमुख हो जाते हैं
तथा 'सृष्टिक्रम' में इसके विपरीत रहते हैं । उपर्युक्त त्रिकोणों में प्रथम ५ त्रिकोण
'शक्तिचक्र' एवं अन्तिम चार चक्र 'शिवचक्र' कहलाते हैं ।
'षोडशदल पद्म'—चन्द्रमा की षोडशकलाएँ एवं मध्य त्रिकोण 'मूलाधार' हैं,
अष्टार 'स्वाधिष्ठानं हैं, अन्तर्दशार 'मणिपूर' है एवं बहिर्दशार 'अनाहतचक्र' है ।
'विशुद्धचक्र'—अन्तर्दशार का प्रतिनिधि है । 'आज्ञाचक्र' शिव का स्थान (शिवचक्र)
'बैन्दवगृह' है । 'सूर्यखण्ड', 'सोमखण्ड' एवं 'अग्निखण्ड' के साथ पिण्डगत
षट्चक्रों एवं यंत्र के नौ चक्रों के साथ अभेद है । भूपूर 'सहस्रार' है एवं वृत्तत्रय
'बैन्दवस्थान' (सहस्रारस्थ चन्द्र-स्थान) हैं ।
६१. भोजन—
चन्द्रसूर्याग्निरूपिणी कुण्डलिनी को मूलाधार से आजिह्वान्त विभावित करके
शोधित भोज्य पदार्थों को जीभ के समक्ष देवी को प्रतिग्रास समर्पित करे । इससे
मन्त्र-सिद्धि होती है—क्योंकि 'भुज्यते कुण्डलीदेवी इति ः चिन्तापरोहि यः ।
मन्त्रसिद्धिर्भवेत्तस्य ज्ञानसिद्धिर्नचान्यथा ।।' ('मातृकाभेद तन्त्र') ।।
६२. 'अहंपरामर्श'—
अभिनवगुप्ताचार्य 'तन्त्रालोक' में कहते हैं कि, 'अ' एवं 'ह' ('अहं')
अहंपरामर्शात्मक हैं । इन दोनों से रहित और इनकी रहस्यात्मकता के ज्ञान से
रहित कोई भी मन्त्र सिद्ध नहीं होता प्रत्युत् व्यर्थ हो जाता है यथा शरद ऋतु का
बादल—'आदिमान्त्यविहीनास्तु मन्त्राः स्युः शरदभ्रवत्'
“आदिमोऽनुत्तरः, अन्त्योहकारः, तेन मन्त्रा अपि अहंपरामर्शरूपा
भ्यामादिमान्त्याभ्यां विहीनाः तद्रूपत्वेनापरिज्ञायमानाः शरदभ्रवत् स्युः अकिंतकरा
एवेत्यर्थः ।।"
कहा भी गया है—'आदिमान्त्यविहीनास्तु मूलयोनिमजा नतः । न ते सिद्धिकरा
मन्त्रा निष्फलाः शरदभ्रवत् । खपुष्पं निष्फलं यद्वच्छशकस्य विषाणकम् । वन्ध्यायाः
६ वरि. भू.

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