वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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नहीं हुआ तो कठोर अध्यवसाय करने पर भी वे कठपुतली के समान निष्फलचेष्ट
ही रहते हैं क्योंकि चिच्छक्ति के बल के स्पर्श न होने पर वे केवल वर्णमात्रा
अर्थात् जड़ अक्षरमात्र रह जाते हैं ।।"
‘हंसपारमेश्वर’ में कहा गया है कि—“केवल वर्णरूप मन्त्र ‘पशुभाव’ में स्थित
है । सुषुम्णामार्ग से उच्चारण करने पर वे ‘पशुपति’ हो जाते हैं ।
‘तत्त्वरक्षाविधान’ में कहा गया है कि—“आत्मसंवित् या परमपद में मन्त्र का
प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि वह शक्ति एवं क्रियाशून्य है । शक्ति के विषय में
ही मन्त्र का प्रयोग करना चाहिए । वहीं जप सफल होता है ।”
‘श्रीवैहायसी’ में कहा गया है कि नादोर्ध्वध्वनि से बोधित जप करना चाहिए ।
शक्ति के ताने-बाने से हुए मन्त्राक्षरों का ध्यान करना चाहिए । उक्त रीति से जप
करने पर ‘मन्त्र’ अपने स्वरूप को प्रकट कर देता है ।
उत्पलाचार्य कहते हैं कि साधक के चित्त में मन्त्र लीन हो जाते हैं । जब
शुद्ध बोधात्मक रूप से अन्तर्बाह्य दोनों में उदित मन्त्र का एक बार भी जप किया
जाता है तो वह लक्ष बार किए गए जप के समान हो जाता है ।
‘स्पन्दकारिका’ में कहा गया है—
“तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः ।
प्रवर्तन्तेऽधिकाराय करणानीव देहिनः ॥”
‘मालिनीविजय’ का मत है कि—जिस अवस्था में जीत अन्याधार—विनिर्मुक्त
होकर स्वरूप में लीन होता है वही सम्पूर्ण मन्त्रों की उत्पत्ति का क्षेत्र है ।
‘चित्तं मन्त्रः’, ‘कथा जपः’—कहकर ‘शिवसूत्र’ में ‘मन्त्र’ एवं ‘जप’ की
अवधारणा को अत्यधिक वैज्ञानिक, यथार्थपरक, व्यावहारिक एवं बाह्याडम्बर तथा
बाह्याचार-विनिर्मुक्त करने का प्रयास किया गया है । भास्करराय ने भी यही प्रयास
किया है । ‘कुलार्णवतन्त्र’ में भी इसी दृष्टि को उपन्यस्त करते हुए साधकों से
प्रश्न किया गया है कि—
जिह्वादग्धा परान्नेन हस्तौ दग्धौ प्रतिग्रहात् ।
मनोदग्धं परस्त्रीभिः कार्यसिद्धिं कथं भवेत् ?॥
अर्थात् इन विपरीत परिस्थितियों में—‘मन्त्रसिद्धिं कथं भवेत् ?’
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