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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

द्वितीयोऽंशः ३७७
भर्गो देवस्यधीत्यनेनाधाररूप शिवात्माक्षरं गण्यते महीत्यादिना शेषं काम्यं
रमणीयं दृश्यं काम्यं रमणीयं शक्तिकूटं स्पष्टीकृतमिति ॥ २५ ॥
पंचदशी मंत्र गायत्री मंत्र
('स' का समानार्थी है गायत्री का 'सवितुर्वरेण्यं')
'स' का समानार्थी 'सवितुर्वरेण्यम्'
'क' का समानार्थी 'भर्गो देवस्य धी'
'ल' का समानार्थी 'महि' (धीमहि)
‘ह्रीं’ का समानार्थी— ┌ 'धियो योनः प्रचोदयात परो रजसेऽसावदोम्'
“शेषं धियो यो नः प्रचोदयात् │ “तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो
परो रजसेऽसा वदोमिति काम्यं │ नः प्रचोदयात् परो रजसेऽसा वदोम् ॥”
रमणीयं दृश्यं काम्यं रमणीयं │ —(त्रिपु० ता० ३०)
हल्लेखाऽपि समन्विता स्यात् । │ 'ह्रीं' (पं०मंत्र) प्रणव या ओम = (गा०मंत्र)—
एवं शक्तिकूटमपि स्पष्टीकृत- │ 'परोजसेऽसावदोम् ॥'
मित्यर्थः ॥”
'परोरजसे सावदोम' में 'परोरजसे' [ = 'रजसः परं परोरजसे ॥'
रजेऽतीतम् । निर्मलमिति निर्गुणमितिवार्थः । रजः शब्दस्य धूली वाचकत्ववद्
गुणत्रयोपलक्षकत्वसंभवात् । त्रिगुणातीतमिति यावत् ॥
भाव यह कि—यावत् “भाव यह कि—'रज' का अर्थ है धूल, कल्मष,
गुणत्रय। 'परो रजसे' का अर्थ है। 'रज' से परे' 'रजातीत' अर्थात निर्मल, निर्गुण,
त्रिगुणातीत । गायत्री के 'ओम' का अर्थ भी 'हीं' ही है—'एतावान व्यर्थो
हल्लेखायाः' (—आचार्य भास्करराय)
'सावदोम' का अर्थ—'सवदोऽवदश्च यः प्रणवः । 'वक्तु शक्यो वक्तुम-
शक्यश्चेति ।।' अर्थात् कथनीय एवं अकथनीय सवद एवं अवद ।। सवद एवं
अनद—अर्थात् प्रणव = ओंकार ।। शब्द की एक मर्यादा (सीमा) है अतः ओंकार
सीमा में बँध न सकने के कारण अकथ्य है । ('शब्दैः शक्तिमर्यादया न बोध्यः ।
शक्यतावच्छेदकधर्ममात्रस्य पर तत्वेविरहात्')
इसीलिए कहा गया है—“यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” 'लक्षणा'
के द्वारा इसका जानना शक्य भी है क्योंकि सत्य ज्ञान आदि पदों का उसके लिए
प्रयोग किया गया है । 'वेदैश्च सर्वैरहमेववेद्यः' होते हुए भी वह 'लक्ष्यार्था
लक्षणागम्या' (स्मृति) कहे जाने के कारण 'अवद' होते हुए भी 'सवद' भी है ।
'ओम' = 'प्रणव' । 'ओम्' = परमतत्त्व । अकार-उकार-मकार के वाचक
ब्रह्मा-विष्णु-महेश से युक्त । यही हल्लेखा का अर्थ है ।

३७८ वरिवस्यारहस्ये

'पंचदशी मंत्र''गायत्रीमंत्र'
'ह्रीं' का अर्थ है ॐ'परोरजसेऽसावदोम''ह्रीं' एवं 'ओम'
यह देवी प्रणव है(रजातीत, अवद ओम्) ॥दोनों ही प्रणव
'ह्रीं' प्रणवार्थः परतत्त्वमकारो'ओम'हैं एवं
कारमकारैर्ब्रह्मविष्णु रुद्रात्मकम् ।(ब्रह्मविष्णुरुद्रात्मक)समानार्थक हैं ।
एवावान्तरार्थो हृल्लेखायाः ॥
(ब्रह्मविष्णुरुद्रात्मक)
  • सरोजिनी *
    'महावाक्यार्थ' का स्वरूप—आचार्य भास्करराय का कथन है कि जीव एवं
    ब्रह्म में अभिन्नता एवं अभेदात्मकता की, तार्किक पुष्टि द्वारा, स्थापना करना ही
    महावाक्यार्थ का आशय है ।
    'योगिनीहृदय' में महावाक्यार्थ नामक अर्थ का तो उल्लेख नहीं है प्रत्युत्
    [L1

द्वितीयोंऽशः ३७९
‘स्वरूप लक्षण’ है तो “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते” ब्रह्म का ‘तटस्थ लक्षण’
है। इस प्रकार ‘त्वं’ पद का वाच्यार्थ होगा—‘जाग्रत आदि अवस्था पंचक
विशिष्ट”—“तद्यथाऽस्मिन्नाकाशे श्येनो वा सुपर्णो वा विपरिपत्य संहृत्यपक्षौ संलयायैव
ध्रियत एवमेवायं पुरुष एतस्मा अन्ताय धावति। तद्यथा महामत्स्यः ।। इस प्रकार भी
ब्रह्म का स्वरूप निरूपित किया गया है। यहाँ लक्ष्यार्थ होगा—‘अवस्थाद्यतीत
ब्रह्म’ । फिर भी “योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योति पुरुषः, न दृष्टेर्द्रष्टारं
पश्येः”—कहा गया है। इस प्रकार अवान्तर वाक्यों द्वारा—वाच्यार्थ एवं लक्ष्यार्थ
दोनों का निर्णय होने पर महावाक्य में लक्ष्यार्थों का अभेद सिद्ध हो जाता है।
यद्यपि श्रुतियों में कृत्यत्रय, अवस्थात्रय का ही वर्णन पाया जाता है तथापि तंत्र के
अनुसार उसके पंचकोपलक्षणपरक् होने के कारण उसका पंचकोपलक्षण वर्णित
करना चाहिए यथा—त्रिवृत्करण का पंचीकरण परत्व प्रतिपादित किया गया है। इस
प्रकार प्रकृत प्रसङ्ग में तृतीय कूटस्थ ‘स क ल’ पद के द्वारा कलाओं एवं
अवस्थाओं के सहित इस अर्थ को ग्रहण करते हुए वाच्यार्थ का कथन करने पर
भी लक्ष्यार्थों को कहने में न्यूनता आएगी। कूटद्वय आवृत्ति द्वारा ‘त्वं’ पद का
वाच, तात्च्यार्थ एवं लक्ष्यार्थ—दोनों का समर्पणाभाव से व्याख्यान किया जाना
चाहिए।। तांत्रिकों के मतानुसार दोनों वाच्यार्थों में अभेद होने से शांभवानन्द
कल्पलताकार आदि के द्वारा उपपादन किये जाने के कारण कूटद्वय द्वारा
सृष्टिकर्तृत्वादिकविशिष्ट अवस्थाविशिष्ट वाच्यार्थ का ही समर्पण अभिप्रेत है।
तृतीयकूट में उन दोनों में अभेद एवं ब्रह्म जगत् में अभेद—सम्पूर्ण अभेद—
सङ्केतित है। यहाँ जो भी वक्तव्य प्रस्तुत है, वह सब वेदान्तानुमोदित है। १
‘महावाक्य’ की = “महाशब्दः पूर्वो यस्मिन् वाक्ये शब्दे तस्य महावाक्यार्थ’—
यही निरुक्ति है। ये अर्थ उपलक्षणभूत हैं। उसके द्वारा तंत्रों में अनेक अर्थों का
संग्रह प्राप्त होता है—“तत्रोक्तानामन्येषामव्यर्थानां संग्रहः”। ‘योगिनीहृदय’ में कहा
गया है—“आत्मनः स्फुरणं पश्येद् यदा सा परमा कला” —इस वाक्य से प्रारंभ
करके ‘कांश्चिच्वतुश्चतुरः’ पदार्थों को कहने के कारण ‘चतुर’ शब्दों का वाचकत्व
प्रतिपादित किया गया है। कूटत्रितय तुरीय विद्या का स्वरूप—
‘कूटत्रितययुक्तस्य सकलस्य मनोः पुनः ।
एतानि वाच्यरूपाणि कुलकौलमयानि तु ।।' २
जितने चतुष्क हैं उतने मंत्रार्थ हैं। ‘पुटधाम’ आदि श्लोकों में इसे प्रतिपादित
किया गया है। वहाँ कूटों की पुटो अ के साथ अभेदात्मकता प्रतिपादित की गई
है। यद्यपि वहाँ कूटों की पुटादिक से अभेदात्मकता प्रतिपादित की गई है तथापि
उसका पर्यवसान वाच्यवाचकभाव में ही है। ३ पांतञ्जल मञ्जूषा में दोनों प्रकार के
शब्दार्थों के तादात्म्य की शक्ति के रूप में संपुष्टि भी की गई है अतः उपर्युक्त +
कथन स्वयमेव संपुष्ट हो जाता है।
१-३. भास्करराय—‘प्रकाश’

३८० वरिवस्यारहस्ये
कादि मत के ३५ वें पटल में व्याकुलाक्षरों द्वारा श्लोकों का अर्थ वर्णित
किया गया है—
'णैःयामिलिर्वतास्त्रिल तेर्थोधीकयलाऽभिस ।
णदेरूपेपेणवीशे तम् दिमीनरिस्त्यादते ॥ १ ॥
त्सनतोगशेत्कृषअ त्मत्ममील्लेरिखाकह ।
तःर्थकस्याथिश्चास्तुत तःन्ग्रेगोर्वपितषुरु ॥ २ ॥
त्वङ्गामाम्नानप्रशव्यो नानमसग्निामात्वग्र ।
रोमईयोकार्विशंत न्मृतभान्दुलनान्त्रिबि ॥ ३ ॥
इनका वचनक्रम देखें—"देवतार्थगोमूक (८४६२७३५१) इति यो वेत्ति न
कमम् । स व्याकुलाक्षरे मूको देवतारथगोऽपि सन् ।।" १
तृतीयकूट में वर्णत्रय सर्वार्थक हैं, तुर्य अक्षर देव्यर्थक है, इससे यह अर्थ
प्रतिपादित किया गया—यही प्रथम श्लोक का अर्थ होगा । 'समस्त जगत् देवी का
रूप ही है'—यह अर्थ तंत्रान्तर में गुप्त रखा गया है । द्वितीय श्लोक का यही
अभिप्राय है । लज्जाबीज में स्थित चार अक्षरों द्वारा जो प्रकाशक है—जो ग्रसिष्णु
है—उन दोनों का सामरस्य तत्तादात्म्य द्वितीय में प्रतिपादित किया गया है । २ प्रकाश
ग्राम शब्द उत्पत्ति एवं संहार, विद्या एवं अविद्या के वाचक हैं । 'अत्यल्पमिदं
कथितं' (१४६) कहकर यही सङ्केतित किया गया है । 'पुटधाम'—वाले श्लोक में
१३ अर्थ, गायत्री आदि के १५ अर्थ, भावार्थ ४, नामार्थ ३, शाक्तार्थ २,
कौलिकार्थ (गणेशरूपादि, देवी विद्याचक्र भेद से) ३, महावाक्यार्थ में १४, शेष
१०—सब मिलाकर ३७ अर्थों का प्रतिपादन किया गया है । 'नामैकदेशार्थेत्वनन्ताः
भेदाः उक्ताः' नामैकदेशार्थ में अनन्त अर्थों की संभावनायें हैं । इसी प्रकार अन्य
तंत्रों में अनेक अन्य अर्थों का प्रतिपादन किया गया है—"एवं बहुतंत्रद्रष्टृभिरन्ये
ऽप्यर्थाः संग्राह्याः ।।" ३
शक्त्या लक्षणया वा ये ये ऽर्था दर्शिता मनोरस्य ।
तेषु न को ऽपि विवादः प्रत्यक्षेणैव सिद्धत्वात् ॥ १४८ ॥
(मन्त्रार्थ विषयक सर्वमान्यता का प्रतिपादन)
इस मन्त्र के शक्ति (अभिधाशक्ति) या लक्षणाशक्ति के द्वारा जो-जो अर्थ
प्रदर्शित किये गये उनके विषय में, उनके प्रत्यक्षतया सिद्ध होने के कारण, कोई
विवाद नहीं है ॥ १४८ ॥

  • प्रकाश *
    मनोर्मन्त्रस्य । प्रत्यक्षेणेति । शक्तिग्राहकव्याकरणकोशादेः शक्य-संबन्धस्य च
    स्फुटं प्रदर्शनादिति भावः ॥ १४८ ॥
    १-३. भास्करराय—'प्रकाश'

द्वितीयोऽंशः ३८१

  • सरोजिनी *
    'शक्त्यालक्षणाया' = लक्षणा शब्द शक्ति के द्वारा । शब्दों से अर्थावगाहन
    कराने वाली शक्तियों को साहित्य में 'शब्द-शक्ति' कहते हैं । ये तीन प्रकार की
    हैं— १. अभिधा शक्ति = अभिधेयार्थ, सङ्केतितार्थ, शक्यार्थ
    २. लक्षणा शक्ति = लक्ष्यार्थ
    ३. व्यञ्जना शक्ति = व्यंग्यार्थ
    'लक्षणा' के निम्न भेद हैं—
    १. जहल्लक्षणा ॥ २. अजहल्लक्षणा ॥ ३. जहज्जहल्लक्षणा ॥
    किसी भी पद का अभिधा शक्ति से अर्थावगाहन हो पाना संभव न होने पर
    वहाँ लक्षणा शक्ति का प्रयोग किया जाता है ।
    ये पुनरिह भावार्थादयः षडर्था मनोरुक्ताः ।
    तेषु यदि शक्तिभक्ती न हि संभवतस्तदापि का हानिः ॥ १४९ ॥
    (भावार्थादिक अर्थ-प्रकारों का महत्व)
    जो यहाँ पुनः मंत्र के भावार्थ आदि छः अर्थ कहे गए हैं यदि उनमें
    शक्ति-भक्ति (अभिधेयार्थ-लक्ष्यार्थ) (का ग्रहण) संभव न भी हो तथापि क्या हानि
    है? ॥ १४९ ॥
  • प्रकाश *
    शक्तिग्राहकव्याकरणाद्यभावान्न शक्तिः; अत एव च न शक्यसंबन्धरूपा
    भक्तिरपि । व्यक्तिरूपा तृतीया वृत्तिर्भविष्यति,
    'वक्तृबोद्धव्यकाकूनामन्यसंनिधिवाच्ययोः ।
    प्रस्तावदेशकालादेवैशिष्ट्यात् प्रतिभाजुषाम्' ॥
    इत्यत्रादिपदेनोपासनापि ग्रहीष्यत इत्याशयेन समाधत्ते—का हानिरिति ॥ १४९ ॥
  • सरोजिनी *
    ग्रन्थकार का कथन है कि यदि भावार्थ प्रभृति जो छः अर्थ बताए गए हैं
    यदि अभिधा एवं लक्षणा शब्द शक्तियों द्वारा उनका अर्थ-साङ्गत्य सिद्ध न भी
    हो सके तथापि किसी असङ्गति अनौचित्य एवं अप्रामाणिकता की दोषापत्ति नहीं
    आएगी ॥ १४८ ॥
    व्यञ्जनाया बहुभिरनङ्गीकारादाह—
    आस्तामन्या वृत्तिर्विलक्षणा तद्ग्रहस्तु मनोः ।
    शिववचनेन भविष्यति यद्वैषा शक्तिरेवास्तु ॥ १५० ॥

३८२ वरिवस्यारहस्ये
एतस्मादयमर्थो बोद्धव्य इतीश्वरेच्छात्वात् ।
प्रतिपदमर्थविशेषाज्ञाने ऽप्यास्तामखण्डवाक्यस्य ॥ १५१ ॥
अर्थो ऽप्यखण्डरूपो विशिष्टमतिरिक्तमिति हि सिद्धान्तः ।
आसेचनकव्याप्त्यादिपदवदास्तां पदत्वमपि ॥ १५२ ॥
(मन्त्र के अर्थ के निर्णय के विषय में भगवान् शिव के वचनों की
निर्णायक भूमिका का प्रतिपादन)
(शक्ति-भक्ति-व्यक्ति से) भिन्न कोई अन्य विलक्षण प्रक्रियाशालिनी वृत्ति
मान ली जाय (किन्तु) मन्त्र के किसी ऐसे अर्थ का ग्रहण भगवान् शिव के
वचनानुसार ही (मान्य) होगा या तो इस शक्ति (अभिधा शक्ति) को ही गृहीत किया
जाय ॥ १५० ॥
(शब्द के अर्थग्रह में ईश्वरेच्छा की भूमिका)
अमुक-अमुक शब्द से अमुक-अमुक अर्थ (ही) बोधित हो—यह (मात्र) ईश्वर
की इच्छा के कारण (ही होता है।) प्रत्येक पद का विशेषार्थ न भी परिज्ञात हो तो
क्या अन्तर पड़ता है यदि समस्त वाक्य का समस्त भाव (हस्तामलकवत) परिज्ञात
हो जाय तो ॥ १५१ ॥
(वर्ण एवं उनके अर्थ का अन्तर्संबंध)
(इस संदर्भ में) प्रस्थापित सिद्धान्त यही है कि अखण्डरूप अर्थ वर्णों से
नितान्त भिन्न है । यदि आवश्यक हो तो समस्त मंत्र को एक इकाई के रूप में
गृहीत कर लिया जाय तथा 'आसेचनक' 'व्याप्ति' आदि पदों (के संबंध) में (किया
जाता है ।) ॥ १५२ ॥

  • प्रकाश *
    अन्या शक्तिभक्तिव्यक्तिभ्यो विलक्षणा शक्त्यादित्रितयप्रक्रियातो विलक्षण-
    प्रक्रियाशालिनी । उच्छृङ्खलस्य पन्थानं परित्यज्याह—यद्वेति । शिवनैवास्यायमर्थ इति
    स्पष्टमुक्तत्वादिति भावः ॥ १५० ॥
    इदं पदमिममर्थं बोधयत्वितीच्छायामर्थबोधजनकत्वनिष्ठप्रकारतानिरूपितविशेष्य-
    ताशालित्वेन पदस्यापि विषयत्वात् प्रकृते प्रतिपदमर्थानुक्तेः कथं शक्तिरिति चेन्न; इदं
    वाक्यमिममखण्डार्थं बोधयत्वित्याकारिकाया एवेच्छायाः कल्पनात् । वाक्यस्याखण्डत्वं
    वैयाकरणानामिष्टमेव । अर्थस्याखण्डत्वम् 'प्रकृष्टप्रकाशश्चन्द्रः' इत्यादिवाक्यार्थं वर्णय-
    तामौपनिषदानामिष्टमेव । तच्च विचार्यमाणे विशिष्टस्यातिरिक्तत्व एव पर्यवस्यति । तथा
    च यत्र प्रतिपदमर्थविवेकस्तत्रेयं रीतिः; यत्र यत्र न स तत्र संपूर्णस्यैकपदत्वमेवास्तु । न
    चैकस्य पदस्य विशिष्टबह्वर्थवाचकत्वमदृष्टमिति वाच्यम्, घटत्वघटसमवायानां घटपद-
    वाच्यत्वात्, 'तदासेचनकं तृप्तेर्नास्त्यन्तो यस्य दर्शनात्' इति कोशात्, हेतुसमानाधि-
    करणात्यन्ताभावाप्रतियोगिसाध्यसामानाधिकरण्यस्य व्याप्तिपदार्थत्वाच्चेत्याह—

द्वितीयोंऽशः ३८३
आसेचनकेति । आदिनोपाधिपरिग्रहः । तेनेश्वरेच्छायां पदस्यैव विशेष्यत्वे ऽपि न
प्रकृतनिर्वाहाय विलक्षणेच्छाकल्पनापत्तिः ॥ १५१-१५२ ॥

  • सरोजिनी *
    ग्रन्थकार का कथन है कि अर्थ-ग्रहण का नियमन भगवान् शिव ने किया है
    अतः उनके नियमों को आधार मान कर ही किसी भी शब्द से उसका अर्थ-ग्रहण
    प्रामाणिक होगा अन्यथा नहीं ।
    वैयाकरण वाक्य के अखण्डत्व को तो मानते ही हैं । अर्थ का भी
    अखण्डत्व भी मान्य है । 'प्रकृष्टप्रकाशश्चन्द्रः'—इत्यादि वाक्य के अर्थ को वर्णित
    करने में उपनिषदों में भी अर्थ के अखण्डत्व की पुष्टि की गई है ॥ १५० ॥
    प्रत्येक शब्द के अर्थ का निर्धारण या प्रत्येक शब्द से किसी अर्थ विशेष का
    ग्रहण ईश्वरेच्छा के कारण ही हुआ करता है—मानवीय इच्छा या प्रयास से नहीं ।
    शब्द का विशेष अपरिज्ञात भी हो तथापि कोई व्यवधान उपस्थित नहीं होता किन्तु
    वाक्य का भाव अवश्य ज्ञात होना चाहिए ॥ १५१ ॥
    वैयाकरण लोग वाक्यों के अखण्डत्व की बात तो स्वीकार ही करते है—
    'वाक्यस्याखण्डत्वं वैयाकरणानामिष्टमेव ॥'१ इसी प्रकार अर्थ के अखण्डत्व को भी
    स्वीकार करना चाहिए ॥
    'प्रकृष्ट प्रकाशश्चन्द्रः' इत्यादि वाक्यार्थ की व्याख्या करते हुए उपनिषदों में अर्थ
    के अखण्डत्व का भी प्रतिपादन (व्याख्याकारों द्वारा) किया ही गया है । जहाँ एक
    एक पद के अर्थ की विवक्षा अपरिहार्य हो वहाँ तो उसका उसी प्रकार खण्डित
    अर्थ ग्रहण करना चाहिए किन्तु जहाँ यह अनिवार्य न हो वहाँ शब्द-समुदाय या
    वाक्य का अखण्ड अर्थ ग्रहण करना समीचीन ही है ॥ १५२ ॥२
    नन्वस्य पदत्वे ऽनेकार्थत्वं दोष इत्यत आह—
    एकस्यानेकार्था दृष्टा हरिसैन्धवादिषु पदेषु ।
    अन्यतमैकावगतौ प्रकरणातात्पर्ययोर्विशेषकता ॥ १५३ ॥
    प्रकृते तु सर्वबोधस्येष्टत्वान्नो विशेषाकाङ्क्षा ।
    अथ वा सकलार्थेष्वपि शक्त्यैक्यं पुष्पवन्तपदवदिह ॥ १५४ ॥
    (अनेकार्थी शब्दों से विशेषार्थ-ग्रहण के कारक तत्त्व)
    'हरि' 'सैन्धव' आदि शब्दों में एक शब्द के अनेक अर्थ देखे जाते हैं । (इन
    विभिन्न अर्थों में से) एक अर्थ को ग्रहण करने में प्रकरण एवं तात्पर्य (एक निश्चित
    अर्थ मात्र को ही ग्रहण करने के) निश्चायक चिन्ह हैं ॥ १५३ ॥
    १-२. भास्करराय—'प्रकाश'

३८४ वरिवस्यारहस्ये
(मंत्रार्थ की दिशा में विशेषक की अपेक्षा सर्वबोध का प्रतिपादन)
प्रस्तुत प्रसङ्ग (या विषय) में समस्त तात्पर्य अभीष्ट हैं किसी भी विशेषक की
आवश्यकता नहीं है, या (अर्थात्) (इस मंत्र में) एक ही शक्ति 'पुष्पवन्त' पद की
भाँति यहाँ समस्त अर्थों को द्योतित करती है ॥ १५४ ॥

  • प्रकाश *
    अनेकार्थतायाः प्रमाणबलायातत्वाददोषत्वम् । सर्वत्रानेकार्थस्थले ऽन्यतमस्यै-
    कस्यैव बोधनार्थं प्रकरणादिज्ञानस्य कारणत्वादिकल्पनदोषः, प्रकृते तु तदभाव इत्याह
    —अन्यतमेत्यादिना। अथ वा, ईश्वरेच्छाविषयीभूतबोधीयविशेष्यता यथा सूर्यचन्द्रमसोः
    पर्याप्तैकैव स्वीक्रियत इति न तत्र पुष्पवन्तपदे शक्त्यनेकत्वम्, तद्वदिहाप्यस्त्वित्याह—
    अथ वेति ॥ १५३-१५४ ॥
  • सरोजिनी *
    'एकस्य' = एक शब्द का । 'अनेकार्थ' = अनेक अर्थ, यथा—शब्दार्थ,
    भावार्थ, संप्रदायार्थ, निगर्भार्थ, कौलिकार्थ, रहस्यार्थ, महत्त्वार्थ, नामार्थ, शब्दरूपार्थ,
    शाक्तार्थ, सामरस्यार्थ, समस्त सगुणार्थ, महावाक्यार्थ आदि ॥
    'दृष्टा' = देखे गए हैं । लोक में प्रचलित हैं । व्यवहृत है, लोगों को
    परिज्ञात हैं । 'हरि' = विष्णु । बन्दर । हरा । भूरा । पीला । इन्द्र । यम ।
    चन्द्रमा । कृष्ण । किरण । कोयल । इन्द्राश्व । सर्प । मयूर । सिंहराशि । शृगाल ।
    बाँस । मूँगा ॥ मेढक । तोता ॥ शिव । अग्नि । घोड़ा । साठ संवत्सरों में से
    एक संवत्सर विशेष का नाम ॥
    'विशेषकता' = वैशिष्ट्य । भेदकता । व्यावर्तकता ॥ सामान्य से व्यक्ति को
    पृथक् करने का भाव ॥ (Indices; व्यावर्तक चिन्ह) ॥ निश्चायक, निर्णायक
    बिन्दु ॥ 'विशेषक' = (वि + शिष् + ण्वुल) = भेद स्पष्ट करने वाला, (पुं० नं०)
    विशेष + कन = । विशेषण ॥ टीका । तिलक ॥ 'विशेषित' = वि + शिष् +
    णिच् + क्त । विशेषण द्वारा पहिचाना हुआ । उत्कृष्ट, उत्तम । परिभाषित ।
    जिसकी पहिचान बतायी गई हो ।
    “सैन्धव”—सेंधा नमक । सिन्धु देश का घोड़ा ॥ (सिन्धु + अण = सैन्धव)
    सिन्धुदेशोत्पन्न, सिन्धु नदी सम्बंधी । नदी में उत्पन्न । सामुद्रिक । सिन्धु-निवासी ।
    (सैन्धव-शब्द-सिन्धु में उत्पन्न सभी वस्तुओं यथा १४ रत्न आदि—सभी वस्तुओं का
    द्योतक हो सकता है ।)
    'पद' = किसी भी प्रातिपदिक में जब, वाक्य में प्रयोगार्थ, सुप्या तिङ्
    प्रत्यय लगा दिया जाता है तब उसे 'पद' की आख्या प्राप्त हो जाती है ।
    “सुप्तिङन्तंपदम्” ॥
    'अन्यतम' = वस्तुओं में से जिसके बराबर कोई अन्य वस्तु हो ही नहीं वह

द्वितीयोंऽशः ३८५
है अन्यतम् । (अन्य + तमप् = अन्यतम) ।। एक शब्द के अनेक अर्थ होते
हैं किन्तु उनमें से किसी एक अर्थ को उस शब्द का वास्तविक अर्थ गृहीत करने
के पीछे विशिष्ट प्रसङ्ग, विशिष्ट प्रयोजन आदि कारक शक्तियाँ काम करती हैं ।
इसके अतिरिक्त लक्ष्यार्थ एवं व्यंग्यार्थ-बोधक शाब्दी शक्तियाँ (लक्षणा व्यञ्जना) भी
काम करती हैं ।
जिस प्रकार 'हरि', 'सैन्धव' पदों में एक पद के अनेक अर्थ निहित हैं ।
अनेक अर्थों में एक अर्थ का ग्रहण या बोध—संदर्भ एवं विशिष्ट तात्पर्य (उद्देश्य)
के कारण होता है । प्रस्तुत विषय में सभी तात्पर्य अभीष्ट हैं । किसी भी विशेषक
(सूचक) की आवश्यकता नहीं है । इस मंत्र में एक ही शक्ति 'पुष्पवन्त' पद की
तरह ही सभी अर्थों को व्याप्त करती है ।
अखण्ड रूप अर्थ वर्णों से नितान्त भिन्न हैं । आवश्यक होने पर समस्त मंत्र
को एक इकाई (पद) के रूप में मानना चाहिए । जैसा कि—'आसेचनक' 'व्याप्ति'
आदि पदों के सम्बन्ध में किया जाता है—
“प्रतिपदमर्थविशेषा

३८६ वरिवस्यारहस्ये
महावाक्य तो—'अहंब्रह्मास्मि' 'अयमात्माब्रह्म' 'प्रज्ञानंब्रह्म' 'तत्त्वमसि'
'सोऽयमात्मा' आदि आप्त वाक्य हैं ।
एकस्यानेकार्थे विनियोगादर्थ बाहुल्यम् ।
वेदे बहुशः स्वीकृतमत्र त्वेकत्र विनियोगात् ॥ १५६ ॥
अखिलार्थबोधनियमो नियमादृष्टं प्रकल्पयति ।
सिद्धे प्रमाणदार्थ्ये सकलं कल्प्यं हि तदविरोधाय ॥ १५७ ॥
(मन्त्र-विनियोग की दो दिशाएँ)
वेद में इस तथ्य को अनेक प्रकार से स्वीकार किया गया है कि एक मंत्र
का अनेक प्रसङ्गों में विनियोग करने पर उसके अनेक अर्थ हो जाते हैं किन्तु इस
प्रसङ्ग में जहाँ कि मंत्र का विनियोग केवल एक संदर्भ में होता है—उस विनियोग
से ॥ १५६ ॥
('निगमन' के प्रमाणार्थ मुख्योपाय)
समस्त अर्थों को बोधित करने का नियम नियमादृष्ट की रचना करता है ।
(एक बार किसी भी कथन के) सिद्ध या प्रस्थापित हो जाने के बाद उसके प्रमाण्य
की दृढ़ता के लिए शेष सभी (तर्क या प्रमाण) उसके अनुकूल स्वीकृत (अङ्गीकृत)
किये जाने चाहिए ॥ १५७ ॥
* प्रकाश *
पदपक्षे ऽनेकार्थतादोषपरिहारवद्वाक्यपक्षे ऽपि संभवति, पुरुषसूक्तस्य
तद्देवतापूजायां विनियोगेनानेकार्थत्वस्येष्टत्वात् । इयांस्तु विशेषः—तत्तत्पूजायां
तस्य तस्यैवार्थस्य स्मरणं पुरुषसूक्ते; प्रकृते तु सर्वेषामर्थानां स्मरणेनैवादृष्टोत्पत्तिरिति
भावः ॥ १५६-१५७ ॥
* सरोजिनी *
वेदों में विनियोगों के वैविध्य से मंत्रों के अर्थों में भी वैविध्य पाया जाता है ।
प्रस्तुत प्रसङ्ग में एक ही प्रसङ्ग में प्रयुक्त मंत्र के भी अनेक अर्थ होते हैं । इसका
नियमन नियमादृष्ट द्वारा हुआ करता है । ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में पृथक्-पृथक्
देवताओं के विनियोग-वैविध्य के कारण उन सभी मंत्रों के पृथक्-पृथक् अर्थ ग्रहण
किये गए हैं । पुरुषसूक्त में उन-उन देवताओं की पूजा में उन-उन अर्थों का ग्रहण
किया जाता है । प्रकृत प्रसङ्ग में समस्त अर्थों के स्मरण से ही अदृष्टोत्पत्ति हो
जाती है । समस्त संभाव्य अर्थों को बोधित करने का नियम नियमादृष्ट आविर्भूत
करता है ।
प्रस्थापित नियम सिद्धान्त की पुष्टि का आधार बनता है और निगमन को पुष्ट
करता है ।

द्वितीयोऽंशः ३८७
सिद्धे प्रमाणदार्ढ्य इत्यत्र दृष्टान्तमाह—
यागस्य स्वर्गं प्रति संसिद्धे हेतुहेतुमद्भावे ।
तदनुपपत्तिं निरसितुमलौकिकापूर्वमपि कॢप्तम् ॥ १५८ ॥
(अलौकिक अपूर्व प्रयोजन)
स्वर्ग-प्राप्ति के लिए यज्ञ के कारण-कार्यभाव के स्वसिद्ध (प्रमाणित) होने पर
भी उसकी अनुपपत्ति (प्रमाणाभाव) के दूरीकरण के लिए अलौकिक 'अपूर्व' की भी
रचना की गई ॥ १५८ ॥

  • प्रकाश *
    'ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत' इत्यत्र तृतीयाश्रुत्या यागस्य जनकत्वे काम्यमान-
    तया स्वर्गस्य जन्यत्वे च बोधिते ऽपि भिन्नकालीनयोस्तदयोगाद्देवताप्रसाद्यागध्वंसादिना
    ऽत्र निर्वाहाभावादपूर्वेणैवानुपपत्तिनिरास इत्यादि तन्त्रान्तरेषु विस्तरः ॥ १५८ ॥
  • सरोजिनी *
    'याग' = यज्ञ ॥ 'यज्ञः सवोऽध्वरो यागः सप्ततन्तुर्मखः क्रतुः ॥'१ 'यज्ञः
    स्यादात्मनि मखे नारायणहुताशयोः ॥'२
    'सवो यज्ञे च संधाने ।'३ 'ऋतुर्यज्ञे गुणौ पुंसि' = याग (यज्ञ) ऋतु ॥४ 'यज
    देवपूजादौ' (भ्वा० ३० अ०) धातु से निष्पन्न ॥ 'स्वर्गे' = स्वरव्ययं स्वर्ग नाक
    त्रिदिवत्रिदशालयाः । सुरलोकोद्यो दिवौ द्वे स्त्रियां क्लीबे त्रिविष्टपम् ॥'५ स्वर्यतेस्तूयते
    इति स्वः । 'स्वः प्रेत्य व्योम्नि नाके च' ।
    “ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत्” स्वर्ग की आकांक्षा रखने वालों को
    ज्योतिष्टोम यज्ञ करना चाहिए । अतः योग के द्वारा स्वर्ग मिलना तो स्वतः सिद्ध है
    किन्तु देवतादिक के अप्रसन्न होने पर स्वर्ग का मिलना संभव भी नहीं रह जाता ।
    इसका कारण है—'अपूर्व' ॥६
    'कॢप्त' = कॄप् + क्त, लत्व । रचित, निर्मित, सजा हुआ, टुकड़े किया
    हुआ, उत्पन्न किया हुआ, स्थिर किया हुआ, आविष्कृत । 'कॢप्ति = पूर्णता,
    साकल्य, आविष्कार, सुव्यवस्था ।
    अस्मिन् प्रकरणे पूर्व वर्णितान् पञ्चदशार्थान् संगृह्यानुवदति—
    विद्यावर्णैयत्तोद्धारः कालस्तदुच्चारः ।
    उत्पत्तिस्थानं तद्यत्नो रूपं स्थितिस्थानम् ॥ १५९ ॥
    १. अमरकोष २. हैमकोष
    ३-४. मेदिनीकोष ५. अमरकोष
    ६. भास्करराय—'प्रकाश'

३८८ वरिवस्यारहस्ये
आकारः स्वं रूपं विभाव्यमर्थो ऽन्तरङ्गानि ।
ऋषयश्छन्दोदैवतविनियोगा बीजशक्तिकीलानि ॥ १६० ॥
न्यासा ध्यानं नियमाः पूजादीनि बहिरङ्गानि ।
बाह्यान्यङ्गानि पुनः प्रायो लोके प्रसिद्धकल्पानि ॥ १६१ ॥
(श्रीविद्या की उपासना के आन्तरिक अङ्ग)
इस श्रीविद्या में निहित मंत्राक्षर (५८), उद्धार, काल (मात्राकाल), उच्चारण
(एकलवोना ऊनत्रिंशन्मात्रा), उद्भवस्थान, प्रयत्न, रूप, विभिन्न स्थितियाँ, स्थान,
आकार, अर्थ, (गायत्री) विभाव्य (अवस्था पंचकादि) (इस श्रीविद्या के) आन्तरिक
अङ्ग हैं ॥ १५९ ॥
(श्रीविद्या के बाह्य अङ्गों का विवेचन)
(इस श्रीविद्या के) ऋषि, छन्द, देवता, विनियोग (प्रयोग) बीज, शक्ति,
कीलक, न्यास, ध्यान, नियम एवं पूजा आदि बाह्य अङ्ग हैं । (इसके) बाह्य अङ्ग
लोक में प्रायशः प्रख्यात ही हैं ॥ १६०-१६१ ॥

  • प्रकाश *
    विद्यायां वर्णेयत्ता अष्टपञ्चाशद्रूपा वर्णसंख्या । उद्धारः 'क्रोधिशः श्रीकण्ठारूढः'
    इत्यादिनोक्तः । कालस्त्रिलवोनेकत्रिंशन्मात्रात्मको विद्यायाः, एकलवोना ऊनत्रिंशन्मात्रा
    उच्चारणस्य । उच्चारणम् 'इत्येवं वर्णानाम्' इत्यादिसार्धश्लोकत्रयेणोक्तम् । उत्पत्ति-
    स्थानम् 'कण्ठे च कण्ठतालुनि' इत्यत्रोक्तम् । यत्नो बाह्याभ्यान्तरश्च । रूपादित्रयम्
    'प्रलयाग्निनिभम्' इत्यादिनोक्तम् । स्वं रूपम् 'व्यष्टिसमष्टिविभेदात्' इत्यादिनोक्तम् ।
    विभाव्यमवस्थापञ्चकादि । अर्थो गायत्र्यर्थादिरूपः । इमान्यन्तरङ्गत्वादुपासकानामत्य-
    वश्यकानि ॥ १५९ ॥
    ऋषयो हयग्रीवादयः । छन्दांसि पङ्क्त्यादीनि । दैवतं त्रिपुरसुन्दरी । विनियोग
    इष्टार्थजनकत्वे । बीजं वाग्भवादि । शक्तिः परादिः । कीलकं कामराजादि । न्यासा
    ऋष्यादिन्यासजालम् । ध्यानम् 'अरुणां करुणातरङ्गिताक्षीम्' इत्यादिना कथितम् ।
    नियमाः पुण्ड्रेक्षुदण्डभक्षणवर्जनसङ्कल्पादयः । पूजाः पात्रासादनादिशान्तिस्तवान्ता
    नित्यादिभेदेन त्रिविधाः, परादिभेदादपि त्रिविधाः, केवलादिभेदात् पञ्चविधा अपि ।
    आदिना होमतर्पणादिपरिग्रहः । एतानि बहिरङ्गत्वेनावश्यकानि । प्रसिद्धकल्पानि,
    ईषन्न्यूनप्रसिद्धिमन्ति ॥ प्रायः प्रसिद्धानीत्यर्थः । कल्पप्रत्ययः । तानि च प्रकाशवरि-
    वस्याविधौ प्रपञ्चितान्यस्माभिः । अतो ऽत्र ग्रन्थे नोक्तानीति भावः ॥ १६०-१६१ ॥
  • सरोजिनी *
    १. 'विद्यावर्णेयत्ता' = श्रीविद्या के वर्णों की इयत्ता (वर्ण-संख्या) ॥ वर्णों की
    संख्या अट्ठावन है । १. प्रथम में—१८ वर्ण २. मध्य में—२२ वर्ण ३. अन्तिम
    में १८ । १८ + २२ + १८ = ५८ ॥

द्वितीयोऽंशः ३८९
'प्रथमेऽष्टादश वर्णाद्वाविंशतिरक्षराणि मध्ये स्युः ।
प्रथमेन तुल्यमन्त्यं संघातेनाष्टपंचाशत् ।। १४ ।।१'
२. मात्रा-काल—कामकला (ई) एवं त्रिकोण (ए) द्विमात्रिक है । बिन्दुरहित
हल्लेखा (ह्रीं) त्रिमात्रिक है । तीन मात्रकाल के बराबर है । अन्य वर्णों का
उच्चारणकाल (या मात्रा) अर्धमात्रा सहित मात्राकाल (अर्थात् डेढ़ मात्रा-काल) एवं
बिन्दु का अर्धमात्रा काल है । उत्तरवर्ती वर्णों का उच्चारण काल अपने पूर्ववर्ती
वर्णों का आधा होना चाहिए—
मात्राद्वितयोच्चार्या कामकला च त्रिकोणा च ।
बिन्दुरहित हल्लेखा मात्राकाल त्रयोच्चार्याः ।। १५ ।।
अन्येषां वर्णानां मात्राकालोऽर्धमात्रया सहितः ।
बिन्दोरर्ध मात्रा परे परे चापि पूर्वपूर्वार्धाः ।। १६ ।।
'मात्रा'—लघु अक्षर का काल—'मात्रा लघ्वक्षरस्य कालः ॥'
एकमात्रो भवेद् ह्रस्वो द्विमात्रो दीर्घ उच्यते ।
त्रिमात्रस्तु प्लुतो ज्ञेयो व्यञ्जनं त्वर्धमात्रकम् ।।
भागांश—'बिन्दु' १।२ मात्रा, 'अर्धचन्द्र' १।४ मात्रा; 'निरोधिनी' १।८ मात्रा,
'नाद'—१।१६ मात्रा; 'नादान्त'—१।३२ मात्रा; 'शक्ति' १।६४ मात्रा, 'व्यापिनी'
१।१२८ मात्रा, 'समना' १। मात्रा ।।
१।२, १।४, १।८, १।१६ १।३२ १।६४, १।१२८, १।१२८ = जोड़
= १ मात्रा ।। 'उच्चारण'—मंत्रोच्चारण की भी एक मर्यादा है, विज्ञान है,
अनुशासन है और पद्धति है और वह यह है—
'माधुर्यमक्षरव्यक्तिः पदच्छेदस्तु सुस्वरः । धैर्यं लयसमर्थं षडेते पाठकाः गुणाः ।
गीतो शीघ्री, शिरः कम्पी तथा लिखित पाठकः । अनर्थोऽल्पकण्ठश्च षडेते
पाठकाधमाः । यावन्न पूर्यतेऽध्यायस्तावन्न विरमेत्यपठन ।। यदि प्रमादादध्यायो विरामो
भवति प्रिये । पुनरध्याय मारभ्य पठेत्सर्वं मुहुर्मुहुः । अज्ञानात्स्थापिते हस्ते पाठे ह्यर्थ
फलम् ध्रुवम् । न मानसे पठेत्स्तोत्रं वाचिकं तु प्रशस्यते ।। उच्चैः पाठं निषिद्धं
स्यात्त्वरां च परिवर्जयेत् । शुद्धेनाचलचित्तेन पठितव्यं प्रयत्नतः ।।
'उद्धारः'—'क्रोधीशः श्रीकण्ठारुढः कोणत्रयं लक्ष्मीः मांसमनुत्तररुढं वाग्भवकूटं
प्रकीर्तितं प्रथमम् ।। ९ ।।
शिवहंस ब्रह्मवियच्छक्राः प्रत्येकमक्षररुढाः ।
द्वितीयैकं कूटं कथितं तत् कामराजाख्यम् ।। १० ।।
शिवतो वियतो मुक्तं तृतीयमिदमेव शक्तिकूटाख्यम् ।
हल्लेखानां त्रितयं कूट त्रितयेऽपि योजयमन्ते स्यात् ।। ११ ।।
१. वरिवस्यारहस्यम्

३९० वरिवस्यारहस्ये
आदि के द्वारा उद्धार किया जाना चाहिए ॥
मंत्र का उत्पत्तिस्थान—'कण्ठे च कण्ठतालुनि तालुनि दन्तेषु मूर्ध्नि
नासायाम्। स्पृष्टविवाराद्यान्तर बाह्यैर्यत्नैस्तदक्षरोत्पत्तिः ॥ १९ ॥
कण्ठ, तालु, दाँत, मूर्द्धा आदि वर्णों के उत्पत्ति स्थान हैं ।
यत्न—वर्णोच्चारण में किये गए प्रयत्न को ही यत्न कहते हैं । यत्न दो
प्रकार के होते हैं—१. बाह्य २. आन्तर ॥१
प्रथम प्रयत्न—वर्णों के स्फुट रूप से उच्चारित होने के पूर्व किया यत्न =
आभ्यन्तर
द्वितीय प्रयत्न—वर्णों के उच्चारण करने की क्रिया के पश्चात् होने वाला
प्रयत्न = बाह्य ॥२
आभ्यन्तर प्रयत्न के भेद—स्पृष्ट । ईषत्स्पृष्ट । ईषद्विवृत । विवृत । संवृत ॥
यथा—स्पर्श वर्ण = स्पृष्ट प्रयत्न ॥ अन्तस्थ वर्ण = ईषत् स्पृष्ट ॥ ऊष्म वर्ण =
ईषद्विवृत । स्वर = विवृत । ह्रस्व स्वर = संवृत । बाह्य प्रयत्न ग्यारह है—
विवार । संवार । श्वास । नाद । घोष । अघोष । अल्पप्राण । महाप्राण । उदात्त
अनुदात्त । स्वरित ॥३
'रूपम्'—१. प्रलयाग्निनिभं प्रथमं मूलाधारदनाहतं रूपाद्दित्रय ॥ २.
तस्मादाज्ञा चक्रं द्वितीयकूटं तु स्पृशति । ३. तस्माल्ललाटमध्यं तार्तीयं कोटिचन्द्राभम्
कोटिसूर्याभम् ॥ १. प्रलयाग्निनिभं २. कोटिसूर्याभ ३. कोटिचन्द्राभ ॥
'स्वरूप'— 'व्यष्टि समष्टिविभेदादस्यां चत्वारि बीजानि ।
सृष्टि स्थिति संहारा नाख्यारूपाणि भावनीयानि ॥ आदि
'विभाव्यम्'—अवस्थापंचक आदि ॥४
'अर्थो'—गायत्री के १५ अर्थ । ये अंतरङ्ग उपासकों के लिए अत्यावश्यक
है—'इमानि अंतरङ्गत्वार्द् उपासकानाम् अत्यावश्यकानि ॥'५
ऊपर जिस 'मात्राकाल' का उल्लेख हुआ है उसके विषय में नियम यह है
कि—प्रथमकूट में १० मात्रा, मध्यकूट में १० मात्रा एवं तृतीयकूट में एक लवकम
८ मात्रा—अर्थात् सब मिलाकर एक लव कम २९ मात्रा-काल जप में होना
चाहिए—"आद्येदश मध्ये ताः सार्धास्तार्तीयकूटेऽष्टौ । एकलवोना ऊनत्रिंशन्मात्रा
मनोर्र्जपे कालः ॥'६
वर्णों के स्थान को जानकर ही यत्नानुसार शब्दोच्चारण करना चाहिए—इत्येवं
वर्णानां स्थानं ज्ञात्वोच्चरेद्यत्नात् ॥ २७ ॥७
प्रस्तुत ग्रन्थ एवं श्रीविद्या के प्रसङ्ग में श्रीविद्या के निम्न बाह्याङ्ग हैं—१.
————————————————————————————————————————————————
१-५. भास्करराय—'प्रकाश'। ६-७. वरिवस्यारहस्यम्

द्वितीयोऽंशः ३९१
'ऋषि' = हयग्रीव, अगस्त्य, लोपामुद्रा, मन्मथ, आदि आचार्य ही ऋषि हैं । २.
'छन्द' = पंक्त्यादि छन्द हैं । ३. 'देवता' = त्रिपुरसुन्दरी ॥ ४. विनियोग =
इष्टार्थजनकत्व ॥ ५. 'बीज' = वाग्भव आदि ॥ ६. 'शक्ति' = परा आदि देवता ॥
७. 'कीलकं' = कामराज आदि ॥ ८. 'न्यास' = ऋष्यादि न्यास जाल । ९.
'ध्यान' = 'अरुणां करुणातरंगिताक्षीम्' आदि स्तुतियों द्वारा किया गया ध्यान ।
१०. 'नियम' = पुण्ड्र-इक्षु, दण्डभक्षणवर्जन सङ्कल्पादिक नियम ॥ ११. 'पूजा' =
पात्र-आसन-शान्ति-स्तव आदि ॥ १२. 'आदीनि' = आदि-आदि । अर्थात् होम.
तर्पण आदि परिग्रह ॥ 'प्रायः'—प्रख्यात ॥¹
इन अङ्गों का एक उदाहरण लें—"अस्य श्रीललितासहस्र नामसहस्रनाम्स्तोत्र-
मालामन्त्रस्य वशिन्यादिवाग्देवता, अनुष्टप् छन्दः, श्रीललितापरमेश्वरी देवता,
श्रीमद्वाग्भवकूटेति मध्यकूटेति शक्तिः । शक्तिकूटेति कीलकम्, श्रीललिता महात्रिपुर-
सुन्दरीसिद्धि द्वारा चिन्तितकलावाप्त्यर्थे जपे विनियोगः ।।" 'ध्यान'—
सिन्दूरारुणविग्रहं त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुर
त्तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं बिभ्रतीं,
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत् परामम्बिकाम् ॥²
उपर्युक्त बहिरांगों में कतिपय का स्वरूप निम्नांकित है—
१. 'पूजा' = न पूजा बाह्यपुष्पादिद्रव्यैर्या प्रथिताऽनिशम् । महिमन्द्वये धाम्नि
सा 'पूजा' या परा स्थितिः ॥³
"तन्त्रालोक" में अभिनवगुप्तपादाचार्य पूजा के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश
डालते हुए कहते हैं—
'पूजा नाम विभिन्नस्य भावौघस्यापि सङ्गतिः ।
स्वतंत्र विमलानन्तभैरवीय चिदात्मना ॥ (४।१२१)
आचार्य भट्टउत्पल ने 'शिवस्तोत्रावली' में पूजा-विधि का वर्णन इस प्रकार
किया है—'ध्यानायासतिरस्कारसिद्ध स्वतत्स्पर्शनोत्सवः । पूजाविधिरिति ख्यातो भक्तानां
स सदाऽस्तु मे । (१७।४)४
'ध्यान' का स्वरूप क्या है—'ध्यानं निर्विषयं मनः ॥' मन की निर्विषयाकार
स्थिति ही ध्यान है । मन की देवाकर परिणति ही ध्यान है । बारह धारणाओं
से उत्पन्न मन की निर्विषयात्मक एकाग्रावस्था ही 'ध्यान' है । 'शक्ति' के दूसरे भी
अर्थ हैं ।५
१. भास्करराय—'प्रकाश' २. ललितासहस्रनाम
३. संकेतपद्धति ४. तन्त्रालोक
५. 'शक्ति' = वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, शान्ता, इच्छा, ज्ञान, क्रिया, अम्बिका,
कामेश्वरी-वज्रेश्वरी-भगमालिनी, महात्रिपुरसुन्दरी । आदि ॥

३९२ वरिवस्यारहस्ये
बाह्याङ्ग—
१. ‘ऋषि’—ऋषि उसे कहते हैं जिसने मंत्रों का दर्शन किया हो—‘ऋषयो मंत्र
द्रष्टारः’,१ ‘मध्यमाभूमि’ एवं ‘पश्यन्तीभूमि’ ऋषि भूमि है । ‘मध्यमा’ मन्त्र-
मयी भूमि है क्योंकि मंत्ररूप में ही ‘मध्यमावाक्’ आत्मप्रकाश करता है ।
चिद्-उन्मेष के अभाव के कारण मानवीय वाक् वैखरी भूमि को अतिक्रान्त
करके मध्यमा में प्रवेश नहीं कर सकता ।। चूँकि ‘मंत्र’ चिद् रश्मियुक्त है
अतः वैखरी भूमि में (चिद्भाव) गुप्त होने के कारण वैखरी के वर्णों की
मंत्रमयता कभी स्वीकार नहीं की जाती क्योंकि ‘मंत्र’ चेतन् तत्त्व की
रश्मियाँ हैं । ‘‘मंत्राश्चिन्मरीचयः । तद्वाचकत्वाद् वैखरी वर्ण विलासभूतानां
विद्यानां मननात् त्राणता ।।’’—इन चिद्रश्मि-सञ्जात, त्रिद्रूप, चेतन मंत्रों का
जो दर्शन करता है या जिसने इनका प्रथम बार साक्षात्कार किया हो वही
ऋषि कहलाता है । यही किसी भी मंत्र का प्रथम आचार्य है ।
‘ऋष’ का अर्थ है अपरोक्षदर्शन । ऋषि मंत्रों के आविष्कारक हैं
सृष्टिकर्ता नहीं—‘ऋषयोमंत्र द्रष्टारः स्मारकाः न तु कारकाः ।।' यथा—
२. ‘छन्द’—जिस पद्धति द्वारा जिस छन्द से जिस भाव का कम्पन उत्पन्न
करके साधक की साधना के उद्देश्य को पूरा कराया जाता है वह छन्द ही
उस निर्दिष्ट साधन-प्रणाली का छन्द है ।
३. ‘देवता’—दिव्धातु से निष्पन्न देवताशब्द क्रीडार्थक एवं प्रकाशार्थक है ।
प्रकृति के विभिन्न तत्त्वों में, विभिन्न स्तरों में, चैतन्य परमात्मा किस प्रकार
प्रकाशित एवं लीलारत हैं—यह देवता तत्त्व के अंतर्गत है । भगवच्चैतन्य
के विभिन्न प्रतिबिम्ब या विभूति—विभिन्न भाव के लीला भाव का नाम
देवता तत्त्व है । ‘देवता’ भक्त के देह स्थित होकर एवं भक्तों को वरदान
देकर उसके तापत्रय का नाश करता है—इसीलिए उसे देवता कहते हैं—
(‘दे’ = भक्त-देह । ‘व’ = वरदान ।। ‘ता’ = ताप त्रय से त्राण ।)—
‘देहमास्थायभक्तानां वरदानाच्च पार्वति । तापत्रयादिशमनाद्देवता
परिकीर्तिता ।।'२
४. ‘विनियोग’—कौन साधना किस भाव से अनुष्ठित हुई और उसे क्या
प्रयोजन सिद्ध हुआ—यही विनियोग तत्त्व है । ‘‘हमारा लक्ष्य क्या है?’’
‘हम चाहते क्या हैं?’ इसका निर्धारण करके फिर यह पता लगाना चाहिए
कि इस लक्ष्य की सिद्धि करने वाला प्रथम पुरुष कौन था? यही व्यक्ति
मंत्र का ‘‘ऋषि’’ कहलाता है । जिस उपाय से सिद्धि प्राप्त होती है उसे
कहते हैं—‘छन्द’ ।। जिस स्नायुकेन्द्र में वह शक्ति निहित है । उस
स्नायुकेन्द्र में प्राणवायु एवं मनन शक्ति को एकाग्र करके, वहाँ की
प्रसुप्तशक्ति को जगाकर उस केन्द्र में उस शक्ति के प्रकाश एवं
१. यास्क—निरुक्त २. कुलार्णव तन्त्र

द्वितीयोंऽशः ३९३
कार्य-पद्धति को उपलब्ध करना ही उस साधन-पद्धति का 'देवता तत्त्व'
है। उसके बाद उस जाग्रत शक्ति को उद्देश्य साधन में नियुक्त करके
उद्देश्य को सफल करना 'विनियोग तत्त्व' है। ये ही हैं पूजा के प्रारंभिक
मूल तत्त्व ।३ 'कामधेनुतंत्र' में नौ तत्त्वों का विधान किया है जिसमें देवता
तत्त्व भी अंतर्भुक्त है—'देवतत्त्वं प्राणतत्त्वं बिन्दुतत्त्वं च सुन्दरि । ज्ञान तत्त्वं
शक्तित्त्वं योनितत्त्वं तथैव च ।।'५
५. बीजतत्त्व—बीज से ही देवता का आविर्भाव या जन्म होता है—देवतायाः
शरीरं तु बीजादुत्पद्यते ध्रुवम् ।।'६
६. ध्यान—ध्यान से ही सिद्धि होती है—ध्यानेन परमेशानि यद्रूपं
समुपस्थितम् । तदेव परमेशानि ! मंत्रार्थं विद्धि पार्वति ।।७ 'ध्यान' है
अभीष्टदेव का एकनिष्ठ, संयमप्राणित अनुचिन्तन—"यावदिन्द्रियसन्तापमनसा
संनियम्य च । स्वातेनाभीष्टदेवस्य चिन्तनं ध्यानमुच्यते ।।''८
७. 'शक्ति'—शतकोटिमहादिव्य योगिनी प्रतिकारणात् । तीव्रस्फूर्ति प्रदानाच्च
शक्तिरित्यभिधीयते ।।९
८. 'न्यास'—न्यायोपार्जितवित्तानामङ्गेषु विनिवेशनात् । सर्वरक्षा कराद्देवि! 'न्यास'
इत्यभिधीयते ।। 'न्यास' समस्त प्रकार की रक्षा करने की एक आध्यात्मिक
पद्धति है जिसमें कि मंत्र के प्रत्येक अक्षर को उपासक के प्रत्येक अङ्ग में
सथापित किया जाता है ।
'नि' पूर्वक 'अस्' धातु से न्यास शब्द साधित होता है ।
'अस्क्षेपणे स्थापने च', धातु से न्यास शब्द निर्मित होता है । अस्
धातु = क्षेपण करना एवं स्थापन करना । जिसका जो स्थान नहीं है यदि
वह बलपूर्वक वहाँ बैठ जाय तो उसको उस स्थान से हटाकर वहाँ के
प्रकृत स्वामी को बैठाने का नाम है—'न्यास' ।। 'स्वर्गात् निराकृता देवा
इन्द्रोऽभूत् महिषासुरः ।' (इन्द्र को स्वर्ग से निकाल कर महिषासुर स्वयं
इन्द्र बन गया) इसी प्रकार हमारी देह एवं इसके प्रत्येक अवयव एवं
सृजनतत्त्व हमारे नहीं भगवान् के हैं क्योंकि इनके स्वामी वही हैं हम
नहीं । मानव इन्हें 'मेरा' अपना, कहकर, मिथ्या कर्तृत्व का आवरण
डालकर उनसे अपना तादात्म्य स्थापित कर लेता है जिससे कि बंधन में
पड़ जाता है । 'अङ्गन्यास' इस अज्ञानात्मक बंधन को दूर करके शरीर के
प्रत्येक अङ्ग में विभिन्न देवों, भगवत्शक्तियों एवं मंत्राक्षरों की स्थापना करने
का विधान है । यथा—१. करन्यास—ऐं अंगुष्ठाभ्यां नमः । ॐ ह्रीं
३. पूजा के त्रिविध रूप हैं—(क) नित्य, (ख) नैमित्तिक, (ग) काम्य-'नित्यं
नैमित्तिकं काम्यं त्रिविधं पूजनं स्मृतम् ।। (शा० त०)
४-५. कामधेनु तन्त्र ६. यामल
७. भूतशुद्धि तन्त्र ८-९. कुलार्णव तन्त्र

३९४ वरिवस्यारहस्ये
तर्जनीभ्यां नमः । ॐ क्लीं मध्यमाभ्यां नमः । ॐ चामुण्डायै
अनामिकाभ्यं नमः आदि ।। २. हृदयादि न्यास—ॐ ऐं हृदयायाय नमः ।
ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा । ॐ क्लीं शिखायै वषट् । ॐ विच्चे नेत्रत्रयाय
वौषट् आदि ।। ३. 'अक्षर न्यास'—ॐ ऐं नमः शिखायाम् । ॐ ह्रीं
नमः दक्षिण नेत्रे । ॐ क्लीं नमः वामनेत्रे, ॐ चां नमः दक्षिणकर्णे
आदि । ४. दिङ्न्यास—ॐ ऐं प्राच्यै नमः ॐ ऐं आग्नेय्यै नमः आदि ।।
५. ऋष्यादिन्यास—ब्रह्मविष्णु ऋषिभ्यो नमः शिरसि । गायत्र्युष्णिगनुष्टप्
छन्देभ्यो नमः मुखे ।। महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वती देवताभ्यो नमः हृदि ।।
ऐं बीजाय नमः गुह्ये । ह्रीं शक्तये नमः पादयोः । क्लीं कीलकायै नमः
नाभौ । 'मातृकान्यास' 'व्यापक न्यास' आदि अनेकविध न्यास-प्रकार है ।
९. 'मुद्रा'—मुद्रा भी पूजा का एक अङ्ग है । जो देवों को प्रसन्नता प्रदान
करता है और जो मन को तार देता है वही है मुद्रा । यह शरीराङ्गों द्वारा
प्रदर्शित भाव भंगिमा की एक पद्धति है ।१
१०. 'आसन'—सिद्धि प्रदान करने में विनिर्दिष्ट एवं सहायक शरीरावस्थान ही
आसन है—'आत्मसिद्धिप्रदानाच्च सर्वरोगनिवारणात् । नवसिद्धिप्रदानाच्च
आसनं कथितं प्रिये ।।२
दुर्लभमान्तरमङ्गं प्रायो ऽन्तर्मुखजनैस्तदादृत्यम् ।
तोषायैषा तेषामतः प्रदिष्टा रहस्यवरिवस्या ।। १६२ ।।
(श्रीविद्या की उपासना में आन्तरिक अङ्ग की प्रधानता)
आन्तरिक अङ्ग प्रायः दुष्प्राप्य (अविज्ञेय) हैं । इनका अन्तर्मुखी उपासकों द्वारा
सम्मान किया जाना चाहिए । उनकी संतुष्टि के लिए (ही) इस 'वरिवस्यारहस्यम्'
(नामक मेरा यह ग्रंथ) का उपदेश किया गया है ।। १६२ ।।

  • प्रकाश *
    अन्तर्मुखैर्विषयेष्वनासक्तचित्तैर्जनैः । प्रदिष्टोपदिष्टा, 'विद्ययोः पथि मुनिप्रदिष्टयोः'
    इति कालिदासप्रयोगात् ।। १६२ ।।
  • सरोजिनी *
    आचार्य भास्करराय—विद्या के आन्तर अङ्ग—वर्ण-संख्या, उद्धार, काल
    (मात्रा), उच्चारण, स्थान, प्रयत्न, रूप, विभिन्न स्थितियाँ, आकार आदि को दुर्लभ
    मानते हुए इसे सर्वाधिक महत्व प्रदान करते हैं । उनका कहना है कि मैंने विद्या के
    इन्हीं आन्तरिक गुह्य अङ्गों के उद्घाटन एवं निरूपण के उद्देश्य से ही
    'वरिवस्यारहस्यम्' ग्रन्थ लिखा ।
    १-२. कुलार्णव तन्त्र

द्वितीयोऽंशः ३९५
श्रीविद्या के अङ्ग
बाह्य अङ्ग आन्तरिक अङ्ग
ऋषि छन्द देवता विनियोग बीज शक्ति कीलक न्यास ध्यान नियम पूजा
विद्या के विद्या का काल उच्चारण स्थान प्रयत्न रूप विभिन्न आकार
वर्णों की उद्धार (मात्रा) स्थितियाँ
संख्या
ऋषयश्च्छन्दो दैवतविनियोगा बीजशक्तिकीलािन ।। १६० ।।
न्यासा ध्यानं नियमाः पूजादीनि बहिरङ्गानि ।
बाह्यान्यङ्गानि पुनः प्रायो लोके प्रसिद्ध कल्पानि ।। १६१ ।।
'ऋषि' = हयग्रीव आदि ऋषि ।। 'छन्द' = पंक्ति आदि ।। 'दैवत' =
त्रिपुरसुन्दरी । 'विनियोग' = इष्टार्थजनन् । 'बीज' = वाग्भवादिक ।। 'शक्ति' परा
आदि ।। 'कीलक' = कामराज आदि ।। 'न्यास' = ऋष्यादिन्यास जाल ।।
'ध्यान' = 'अरुणां करुणातरंगिताक्षीम्' आदि ।। 'नियम' = पुण्ड्रेक्षु दण्डभक्षणवर्जन
सङ्कल्पादिक ।। 'पूजा' = पात्र, आसान आदि शान्ति स्तव, नित्य कर्म ; परा
पूजा । केवल पूजा । 'आदि' = होम-तर्पण-परिग्रह ।। 'अन्तर्मुख' = अनासक्त चित्त
वाले लोग ।।
'विद्या के वर्ण'—
(क) 'वाग्भवकूट'—अ + क, ए, ई, अ + ल = (६)
(ख) 'कामराजकूट'—ह + अ, स + अ, क + उ, ह + अ, ल + अ =(१०)
(ग) 'शक्तिकूट'—स + अ, क + अ, ल + अ = (६)

वर्णों की संख्यावर्णह्रींयोग
१. 'वाग्भवकूट' के वर्ण६+१२=१८'ह्रीं' (लज्जा बीज) तीनों कूटों के अन्त में है अतः उसके १२ अवयव सभी कूटो में जोड़े जायेंगे ।
२. 'कामराजकूट' के वर्ण१०+१२=२२
३. 'शक्तिकूट' के वर्ण६+१२=१८

३९६ वरिवस्यारहस्ये
विद्योद्धार—
क्रोधीशः श्रीकण्ठरूढः कोणत्रयं लक्ष्मी ।
मांसमनुत्तररुढं वाग्भवकूटं प्रकीर्तितं प्रथमम् ।। ९ . ।।
शिवहंसब्रह्मवियच्छका प्रत्येकमक्षरारुढा द्वित्तीयैक कूटं कथितं तत् काम-
राजाख्यम् ।। १० ।। शिवतो वियतो मुक्त तृतीयमिदमेव शक्तिकूटाख्यम् ।।
हल्लेखानां त्रितयं कूटत्रितयेऽपि योज्यमन्ते स्यात् ।। ११ ।।
कालमात्रा—(१) ई, ए = २ मात्रायें (२) 'ह्रीं' = (बिन्दुरहित) = ३
मात्रा (३) अन्य वर्णों के उच्चारण का काल = आधामात्रा सहित मात्राकाल
१(१/२) मात्रा । (४) बिन्दु का मात्रा-काल = अर्धमात्रा (५) उत्तरवर्ती वर्णों का
उच्चारण-काल अपने पूर्ववर्ती वर्ण का आधा ।
एतामुत्सृज्य जडैः क्रियमाणा बाह्याडम्बरोपारितः ।
प्राणविहीनेव तनुर्विगलितसूत्रेव पुत्तलिका ॥ १६३ ॥
(बाह्याडम्बरोपासना का खण्डन)
इसका परित्याग करके जड़ों के द्वारा जो बाह्याडम्बरों की उपासना की
नराधना की जाती है वह प्राण-विरहित कलेवर एवं सूत्र विरहित कठपुतली की
भाँति (अग्राह्य एवं निरर्थक) है ॥ १६३ ॥

  • प्रकाश *
    बाह्यो डम्बरो ऽङ्गविस्तारो यस्यां सा । प्राणसूत्रयोरन्तरङ्गत्वात् तदभावेन तथा
    तयोर्न कार्यक्षमता तथेति भावः ॥ १६३ ॥
  • सरोजिनी *
    ‘कुलार्णव तंत्र’ में समस्त बाह्योपचारों, बाह्याडम्बरों एवं बाह्योन्मुखी साधनाङ्गों
    का प्रत्याख्यान करते हुए कहा गया कि—
    १. सर्वोच्च साधना है—'ब्रह्मसद्भाव' (१)
    २. मध्य साधना है—'ध्यान धारणाभाव' 'उत्तमो ब्रह्मसद्भावो ध्यानभावस्तु
    ३. अधमा साधना है—'जपभाव एवं स्तुति' मध्यमः । स्तुतिर्जपोधमो भावो
    ४. अधमाधमा साधना है—'बाह्यपूजा' बाह्यपूजा धमाधमा ।।'
    सारांश यह कि बाह्यपूजा अधमाधमा
    साधना है ।
    (२)
    १. उत्तमा साधना—सहजावस्था 'उत्तमा सहजावस्था मध्यमा
    २. मध्यमा साधना—ध्यान-धारणा ध्यानधारणा । जपस्तुतिःस्याद
    ३. अधमा—शास्त्रचिन्तन धमा होमपूजाधमाधमा ।।'
    ४. अधमाधमा—लोकचिन्ता