वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोंऽशः ३७९
‘स्वरूप लक्षण’ है तो “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते” ब्रह्म का ‘तटस्थ लक्षण’
है। इस प्रकार ‘त्वं’ पद का वाच्यार्थ होगा—‘जाग्रत आदि अवस्था पंचक
विशिष्ट”—“तद्यथाऽस्मिन्नाकाशे श्येनो वा सुपर्णो वा विपरिपत्य संहृत्यपक्षौ संलयायैव
ध्रियत एवमेवायं पुरुष एतस्मा अन्ताय धावति। तद्यथा महामत्स्यः ।। इस प्रकार भी
ब्रह्म का स्वरूप निरूपित किया गया है। यहाँ लक्ष्यार्थ होगा—‘अवस्थाद्यतीत
ब्रह्म’ । फिर भी “योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योति पुरुषः, न दृष्टेर्द्रष्टारं
पश्येः”—कहा गया है। इस प्रकार अवान्तर वाक्यों द्वारा—वाच्यार्थ एवं लक्ष्यार्थ
दोनों का निर्णय होने पर महावाक्य में लक्ष्यार्थों का अभेद सिद्ध हो जाता है।
यद्यपि श्रुतियों में कृत्यत्रय, अवस्थात्रय का ही वर्णन पाया जाता है तथापि तंत्र के
अनुसार उसके पंचकोपलक्षणपरक् होने के कारण उसका पंचकोपलक्षण वर्णित
करना चाहिए यथा—त्रिवृत्करण का पंचीकरण परत्व प्रतिपादित किया गया है। इस
प्रकार प्रकृत प्रसङ्ग में तृतीय कूटस्थ ‘स क ल’ पद के द्वारा कलाओं एवं
अवस्थाओं के सहित इस अर्थ को ग्रहण करते हुए वाच्यार्थ का कथन करने पर
भी लक्ष्यार्थों को कहने में न्यूनता आएगी। कूटद्वय आवृत्ति द्वारा ‘त्वं’ पद का
वाच, तात्च्यार्थ एवं लक्ष्यार्थ—दोनों का समर्पणाभाव से व्याख्यान किया जाना
चाहिए।। तांत्रिकों के मतानुसार दोनों वाच्यार्थों में अभेद होने से शांभवानन्द
कल्पलताकार आदि के द्वारा उपपादन किये जाने के कारण कूटद्वय द्वारा
सृष्टिकर्तृत्वादिकविशिष्ट अवस्थाविशिष्ट वाच्यार्थ का ही समर्पण अभिप्रेत है।
तृतीयकूट में उन दोनों में अभेद एवं ब्रह्म जगत् में अभेद—सम्पूर्ण अभेद—
सङ्केतित है। यहाँ जो भी वक्तव्य प्रस्तुत है, वह सब वेदान्तानुमोदित है। १
‘महावाक्य’ की = “महाशब्दः पूर्वो यस्मिन् वाक्ये शब्दे तस्य महावाक्यार्थ’—
यही निरुक्ति है। ये अर्थ उपलक्षणभूत हैं। उसके द्वारा तंत्रों में अनेक अर्थों का
संग्रह प्राप्त होता है—“तत्रोक्तानामन्येषामव्यर्थानां संग्रहः”। ‘योगिनीहृदय’ में कहा
गया है—“आत्मनः स्फुरणं पश्येद् यदा सा परमा कला” —इस वाक्य से प्रारंभ
करके ‘कांश्चिच्वतुश्चतुरः’ पदार्थों को कहने के कारण ‘चतुर’ शब्दों का वाचकत्व
प्रतिपादित किया गया है। कूटत्रितय तुरीय विद्या का स्वरूप—
‘कूटत्रितययुक्तस्य सकलस्य मनोः पुनः ।
एतानि वाच्यरूपाणि कुलकौलमयानि तु ।।' २
जितने चतुष्क हैं उतने मंत्रार्थ हैं। ‘पुटधाम’ आदि श्लोकों में इसे प्रतिपादित
किया गया है। वहाँ कूटों की पुटो अ के साथ अभेदात्मकता प्रतिपादित की गई
है। यद्यपि वहाँ कूटों की पुटादिक से अभेदात्मकता प्रतिपादित की गई है तथापि
उसका पर्यवसान वाच्यवाचकभाव में ही है। ३ पांतञ्जल मञ्जूषा में दोनों प्रकार के
शब्दार्थों के तादात्म्य की शक्ति के रूप में संपुष्टि भी की गई है अतः उपर्युक्त +
कथन स्वयमेव संपुष्ट हो जाता है।
१-३. भास्करराय—‘प्रकाश’