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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 487, कुल 530 में से

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पृष्ठ 487

द्वितीयोंऽशः ३८५
है अन्यतम् । (अन्य + तमप् = अन्यतम) ।। एक शब्द के अनेक अर्थ होते
हैं किन्तु उनमें से किसी एक अर्थ को उस शब्द का वास्तविक अर्थ गृहीत करने
के पीछे विशिष्ट प्रसङ्ग, विशिष्ट प्रयोजन आदि कारक शक्तियाँ काम करती हैं ।
इसके अतिरिक्त लक्ष्यार्थ एवं व्यंग्यार्थ-बोधक शाब्दी शक्तियाँ (लक्षणा व्यञ्जना) भी
काम करती हैं ।
जिस प्रकार 'हरि', 'सैन्धव' पदों में एक पद के अनेक अर्थ निहित हैं ।
अनेक अर्थों में एक अर्थ का ग्रहण या बोध—संदर्भ एवं विशिष्ट तात्पर्य (उद्देश्य)
के कारण होता है । प्रस्तुत विषय में सभी तात्पर्य अभीष्ट हैं । किसी भी विशेषक
(सूचक) की आवश्यकता नहीं है । इस मंत्र में एक ही शक्ति 'पुष्पवन्त' पद की
तरह ही सभी अर्थों को व्याप्त करती है ।
अखण्ड रूप अर्थ वर्णों से नितान्त भिन्न हैं । आवश्यक होने पर समस्त मंत्र
को एक इकाई (पद) के रूप में मानना चाहिए । जैसा कि—'आसेचनक' 'व्याप्ति'
आदि पदों के सम्बन्ध में किया जाता है—
“प्रतिपदमर्थविशेषा