वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८० वरिवस्यारहस्ये
कादि मत के ३५ वें पटल में व्याकुलाक्षरों द्वारा श्लोकों का अर्थ वर्णित
किया गया है—
'णैःयामिलिर्वतास्त्रिल तेर्थोधीकयलाऽभिस ।
णदेरूपेपेणवीशे तम् दिमीनरिस्त्यादते ॥ १ ॥
त्सनतोगशेत्कृषअ त्मत्ममील्लेरिखाकह ।
तःर्थकस्याथिश्चास्तुत तःन्ग्रेगोर्वपितषुरु ॥ २ ॥
त्वङ्गामाम्नानप्रशव्यो नानमसग्निामात्वग्र ।
रोमईयोकार्विशंत न्मृतभान्दुलनान्त्रिबि ॥ ३ ॥
इनका वचनक्रम देखें—"देवतार्थगोमूक (८४६२७३५१) इति यो वेत्ति न
कमम् । स व्याकुलाक्षरे मूको देवतारथगोऽपि सन् ।।" १
तृतीयकूट में वर्णत्रय सर्वार्थक हैं, तुर्य अक्षर देव्यर्थक है, इससे यह अर्थ
प्रतिपादित किया गया—यही प्रथम श्लोक का अर्थ होगा । 'समस्त जगत् देवी का
रूप ही है'—यह अर्थ तंत्रान्तर में गुप्त रखा गया है । द्वितीय श्लोक का यही
अभिप्राय है । लज्जाबीज में स्थित चार अक्षरों द्वारा जो प्रकाशक है—जो ग्रसिष्णु
है—उन दोनों का सामरस्य तत्तादात्म्य द्वितीय में प्रतिपादित किया गया है । २ प्रकाश
ग्राम शब्द उत्पत्ति एवं संहार, विद्या एवं अविद्या के वाचक हैं । 'अत्यल्पमिदं
कथितं' (१४६) कहकर यही सङ्केतित किया गया है । 'पुटधाम'—वाले श्लोक में
१३ अर्थ, गायत्री आदि के १५ अर्थ, भावार्थ ४, नामार्थ ३, शाक्तार्थ २,
कौलिकार्थ (गणेशरूपादि, देवी विद्याचक्र भेद से) ३, महावाक्यार्थ में १४, शेष
१०—सब मिलाकर ३७ अर्थों का प्रतिपादन किया गया है । 'नामैकदेशार्थेत्वनन्ताः
भेदाः उक्ताः' नामैकदेशार्थ में अनन्त अर्थों की संभावनायें हैं । इसी प्रकार अन्य
तंत्रों में अनेक अन्य अर्थों का प्रतिपादन किया गया है—"एवं बहुतंत्रद्रष्टृभिरन्ये
ऽप्यर्थाः संग्राह्याः ।।" ३
शक्त्या लक्षणया वा ये ये ऽर्था दर्शिता मनोरस्य ।
तेषु न को ऽपि विवादः प्रत्यक्षेणैव सिद्धत्वात् ॥ १४८ ॥
(मन्त्रार्थ विषयक सर्वमान्यता का प्रतिपादन)
इस मन्त्र के शक्ति (अभिधाशक्ति) या लक्षणाशक्ति के द्वारा जो-जो अर्थ
प्रदर्शित किये गये उनके विषय में, उनके प्रत्यक्षतया सिद्ध होने के कारण, कोई
विवाद नहीं है ॥ १४८ ॥
- प्रकाश *
मनोर्मन्त्रस्य । प्रत्यक्षेणेति । शक्तिग्राहकव्याकरणकोशादेः शक्य-संबन्धस्य च
स्फुटं प्रदर्शनादिति भावः ॥ १४८ ॥
१-३. भास्करराय—'प्रकाश'