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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 479, कुल 530 में से

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पृष्ठ 479

द्वितीयोऽंशः ३७७
भर्गो देवस्यधीत्यनेनाधाररूप शिवात्माक्षरं गण्यते महीत्यादिना शेषं काम्यं
रमणीयं दृश्यं काम्यं रमणीयं शक्तिकूटं स्पष्टीकृतमिति ॥ २५ ॥
पंचदशी मंत्र गायत्री मंत्र
('स' का समानार्थी है गायत्री का 'सवितुर्वरेण्यं')
'स' का समानार्थी 'सवितुर्वरेण्यम्'
'क' का समानार्थी 'भर्गो देवस्य धी'
'ल' का समानार्थी 'महि' (धीमहि)
‘ह्रीं’ का समानार्थी— ┌ 'धियो योनः प्रचोदयात परो रजसेऽसावदोम्'
“शेषं धियो यो नः प्रचोदयात् │ “तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो
परो रजसेऽसा वदोमिति काम्यं │ नः प्रचोदयात् परो रजसेऽसा वदोम् ॥”
रमणीयं दृश्यं काम्यं रमणीयं │ —(त्रिपु० ता० ३०)
हल्लेखाऽपि समन्विता स्यात् । │ 'ह्रीं' (पं०मंत्र) प्रणव या ओम = (गा०मंत्र)—
एवं शक्तिकूटमपि स्पष्टीकृत- │ 'परोजसेऽसावदोम् ॥'
मित्यर्थः ॥”
'परोरजसे सावदोम' में 'परोरजसे' [ = 'रजसः परं परोरजसे ॥'
रजेऽतीतम् । निर्मलमिति निर्गुणमितिवार्थः । रजः शब्दस्य धूली वाचकत्ववद्
गुणत्रयोपलक्षकत्वसंभवात् । त्रिगुणातीतमिति यावत् ॥
भाव यह कि—यावत् “भाव यह कि—'रज' का अर्थ है धूल, कल्मष,
गुणत्रय। 'परो रजसे' का अर्थ है। 'रज' से परे' 'रजातीत' अर्थात निर्मल, निर्गुण,
त्रिगुणातीत । गायत्री के 'ओम' का अर्थ भी 'हीं' ही है—'एतावान व्यर्थो
हल्लेखायाः' (—आचार्य भास्करराय)
'सावदोम' का अर्थ—'सवदोऽवदश्च यः प्रणवः । 'वक्तु शक्यो वक्तुम-
शक्यश्चेति ।।' अर्थात् कथनीय एवं अकथनीय सवद एवं अवद ।। सवद एवं
अनद—अर्थात् प्रणव = ओंकार ।। शब्द की एक मर्यादा (सीमा) है अतः ओंकार
सीमा में बँध न सकने के कारण अकथ्य है । ('शब्दैः शक्तिमर्यादया न बोध्यः ।
शक्यतावच्छेदकधर्ममात्रस्य पर तत्वेविरहात्')
इसीलिए कहा गया है—“यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” 'लक्षणा'
के द्वारा इसका जानना शक्य भी है क्योंकि सत्य ज्ञान आदि पदों का उसके लिए
प्रयोग किया गया है । 'वेदैश्च सर्वैरहमेववेद्यः' होते हुए भी वह 'लक्ष्यार्था
लक्षणागम्या' (स्मृति) कहे जाने के कारण 'अवद' होते हुए भी 'सवद' भी है ।
'ओम' = 'प्रणव' । 'ओम्' = परमतत्त्व । अकार-उकार-मकार के वाचक
ब्रह्मा-विष्णु-महेश से युक्त । यही हल्लेखा का अर्थ है ।