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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 493, कुल 530 में से

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पृष्ठ 493

द्वितीयोऽंशः ३९१
'ऋषि' = हयग्रीव, अगस्त्य, लोपामुद्रा, मन्मथ, आदि आचार्य ही ऋषि हैं । २.
'छन्द' = पंक्त्यादि छन्द हैं । ३. 'देवता' = त्रिपुरसुन्दरी ॥ ४. विनियोग =
इष्टार्थजनकत्व ॥ ५. 'बीज' = वाग्भव आदि ॥ ६. 'शक्ति' = परा आदि देवता ॥
७. 'कीलकं' = कामराज आदि ॥ ८. 'न्यास' = ऋष्यादि न्यास जाल । ९.
'ध्यान' = 'अरुणां करुणातरंगिताक्षीम्' आदि स्तुतियों द्वारा किया गया ध्यान ।
१०. 'नियम' = पुण्ड्र-इक्षु, दण्डभक्षणवर्जन सङ्कल्पादिक नियम ॥ ११. 'पूजा' =
पात्र-आसन-शान्ति-स्तव आदि ॥ १२. 'आदीनि' = आदि-आदि । अर्थात् होम.
तर्पण आदि परिग्रह ॥ 'प्रायः'—प्रख्यात ॥¹
इन अङ्गों का एक उदाहरण लें—"अस्य श्रीललितासहस्र नामसहस्रनाम्स्तोत्र-
मालामन्त्रस्य वशिन्यादिवाग्देवता, अनुष्टप् छन्दः, श्रीललितापरमेश्वरी देवता,
श्रीमद्वाग्भवकूटेति मध्यकूटेति शक्तिः । शक्तिकूटेति कीलकम्, श्रीललिता महात्रिपुर-
सुन्दरीसिद्धि द्वारा चिन्तितकलावाप्त्यर्थे जपे विनियोगः ।।" 'ध्यान'—
सिन्दूरारुणविग्रहं त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुर
त्तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं बिभ्रतीं,
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत् परामम्बिकाम् ॥²
उपर्युक्त बहिरांगों में कतिपय का स्वरूप निम्नांकित है—
१. 'पूजा' = न पूजा बाह्यपुष्पादिद्रव्यैर्या प्रथिताऽनिशम् । महिमन्द्वये धाम्नि
सा 'पूजा' या परा स्थितिः ॥³
"तन्त्रालोक" में अभिनवगुप्तपादाचार्य पूजा के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश
डालते हुए कहते हैं—
'पूजा नाम विभिन्नस्य भावौघस्यापि सङ्गतिः ।
स्वतंत्र विमलानन्तभैरवीय चिदात्मना ॥ (४।१२१)
आचार्य भट्टउत्पल ने 'शिवस्तोत्रावली' में पूजा-विधि का वर्णन इस प्रकार
किया है—'ध्यानायासतिरस्कारसिद्ध स्वतत्स्पर्शनोत्सवः । पूजाविधिरिति ख्यातो भक्तानां
स सदाऽस्तु मे । (१७।४)४
'ध्यान' का स्वरूप क्या है—'ध्यानं निर्विषयं मनः ॥' मन की निर्विषयाकार
स्थिति ही ध्यान है । मन की देवाकर परिणति ही ध्यान है । बारह धारणाओं
से उत्पन्न मन की निर्विषयात्मक एकाग्रावस्था ही 'ध्यान' है । 'शक्ति' के दूसरे भी
अर्थ हैं ।५
१. भास्करराय—'प्रकाश' २. ललितासहस्रनाम
३. संकेतपद्धति ४. तन्त्रालोक
५. 'शक्ति' = वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, शान्ता, इच्छा, ज्ञान, क्रिया, अम्बिका,
कामेश्वरी-वज्रेश्वरी-भगमालिनी, महात्रिपुरसुन्दरी । आदि ॥