वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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बाह्याङ्ग—
१. ‘ऋषि’—ऋषि उसे कहते हैं जिसने मंत्रों का दर्शन किया हो—‘ऋषयो मंत्र
द्रष्टारः’,१ ‘मध्यमाभूमि’ एवं ‘पश्यन्तीभूमि’ ऋषि भूमि है । ‘मध्यमा’ मन्त्र-
मयी भूमि है क्योंकि मंत्ररूप में ही ‘मध्यमावाक्’ आत्मप्रकाश करता है ।
चिद्-उन्मेष के अभाव के कारण मानवीय वाक् वैखरी भूमि को अतिक्रान्त
करके मध्यमा में प्रवेश नहीं कर सकता ।। चूँकि ‘मंत्र’ चिद् रश्मियुक्त है
अतः वैखरी भूमि में (चिद्भाव) गुप्त होने के कारण वैखरी के वर्णों की
मंत्रमयता कभी स्वीकार नहीं की जाती क्योंकि ‘मंत्र’ चेतन् तत्त्व की
रश्मियाँ हैं । ‘‘मंत्राश्चिन्मरीचयः । तद्वाचकत्वाद् वैखरी वर्ण विलासभूतानां
विद्यानां मननात् त्राणता ।।’’—इन चिद्रश्मि-सञ्जात, त्रिद्रूप, चेतन मंत्रों का
जो दर्शन करता है या जिसने इनका प्रथम बार साक्षात्कार किया हो वही
ऋषि कहलाता है । यही किसी भी मंत्र का प्रथम आचार्य है ।
‘ऋष’ का अर्थ है अपरोक्षदर्शन । ऋषि मंत्रों के आविष्कारक हैं
सृष्टिकर्ता नहीं—‘ऋषयोमंत्र द्रष्टारः स्मारकाः न तु कारकाः ।।' यथा—
२. ‘छन्द’—जिस पद्धति द्वारा जिस छन्द से जिस भाव का कम्पन उत्पन्न
करके साधक की साधना के उद्देश्य को पूरा कराया जाता है वह छन्द ही
उस निर्दिष्ट साधन-प्रणाली का छन्द है ।
३. ‘देवता’—दिव्धातु से निष्पन्न देवताशब्द क्रीडार्थक एवं प्रकाशार्थक है ।
प्रकृति के विभिन्न तत्त्वों में, विभिन्न स्तरों में, चैतन्य परमात्मा किस प्रकार
प्रकाशित एवं लीलारत हैं—यह देवता तत्त्व के अंतर्गत है । भगवच्चैतन्य
के विभिन्न प्रतिबिम्ब या विभूति—विभिन्न भाव के लीला भाव का नाम
देवता तत्त्व है । ‘देवता’ भक्त के देह स्थित होकर एवं भक्तों को वरदान
देकर उसके तापत्रय का नाश करता है—इसीलिए उसे देवता कहते हैं—
(‘दे’ = भक्त-देह । ‘व’ = वरदान ।। ‘ता’ = ताप त्रय से त्राण ।)—
‘देहमास्थायभक्तानां वरदानाच्च पार्वति । तापत्रयादिशमनाद्देवता
परिकीर्तिता ।।'२
४. ‘विनियोग’—कौन साधना किस भाव से अनुष्ठित हुई और उसे क्या
प्रयोजन सिद्ध हुआ—यही विनियोग तत्त्व है । ‘‘हमारा लक्ष्य क्या है?’’
‘हम चाहते क्या हैं?’ इसका निर्धारण करके फिर यह पता लगाना चाहिए
कि इस लक्ष्य की सिद्धि करने वाला प्रथम पुरुष कौन था? यही व्यक्ति
मंत्र का ‘‘ऋषि’’ कहलाता है । जिस उपाय से सिद्धि प्राप्त होती है उसे
कहते हैं—‘छन्द’ ।। जिस स्नायुकेन्द्र में वह शक्ति निहित है । उस
स्नायुकेन्द्र में प्राणवायु एवं मनन शक्ति को एकाग्र करके, वहाँ की
प्रसुप्तशक्ति को जगाकर उस केन्द्र में उस शक्ति के प्रकाश एवं
१. यास्क—निरुक्त २. कुलार्णव तन्त्र