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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 498, कुल 530 में से

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पृष्ठ 498

३९६ वरिवस्यारहस्ये
विद्योद्धार—
क्रोधीशः श्रीकण्ठरूढः कोणत्रयं लक्ष्मी ।
मांसमनुत्तररुढं वाग्भवकूटं प्रकीर्तितं प्रथमम् ।। ९ . ।।
शिवहंसब्रह्मवियच्छका प्रत्येकमक्षरारुढा द्वित्तीयैक कूटं कथितं तत् काम-
राजाख्यम् ।। १० ।। शिवतो वियतो मुक्त तृतीयमिदमेव शक्तिकूटाख्यम् ।।
हल्लेखानां त्रितयं कूटत्रितयेऽपि योज्यमन्ते स्यात् ।। ११ ।।
कालमात्रा—(१) ई, ए = २ मात्रायें (२) 'ह्रीं' = (बिन्दुरहित) = ३
मात्रा (३) अन्य वर्णों के उच्चारण का काल = आधामात्रा सहित मात्राकाल
१(१/२) मात्रा । (४) बिन्दु का मात्रा-काल = अर्धमात्रा (५) उत्तरवर्ती वर्णों का
उच्चारण-काल अपने पूर्ववर्ती वर्ण का आधा ।
एतामुत्सृज्य जडैः क्रियमाणा बाह्याडम्बरोपारितः ।
प्राणविहीनेव तनुर्विगलितसूत्रेव पुत्तलिका ॥ १६३ ॥
(बाह्याडम्बरोपासना का खण्डन)
इसका परित्याग करके जड़ों के द्वारा जो बाह्याडम्बरों की उपासना की
नराधना की जाती है वह प्राण-विरहित कलेवर एवं सूत्र विरहित कठपुतली की
भाँति (अग्राह्य एवं निरर्थक) है ॥ १६३ ॥

  • प्रकाश *
    बाह्यो डम्बरो ऽङ्गविस्तारो यस्यां सा । प्राणसूत्रयोरन्तरङ्गत्वात् तदभावेन तथा
    तयोर्न कार्यक्षमता तथेति भावः ॥ १६३ ॥
  • सरोजिनी *
    ‘कुलार्णव तंत्र’ में समस्त बाह्योपचारों, बाह्याडम्बरों एवं बाह्योन्मुखी साधनाङ्गों
    का प्रत्याख्यान करते हुए कहा गया कि—
    १. सर्वोच्च साधना है—'ब्रह्मसद्भाव' (१)
    २. मध्य साधना है—'ध्यान धारणाभाव' 'उत्तमो ब्रह्मसद्भावो ध्यानभावस्तु
    ३. अधमा साधना है—'जपभाव एवं स्तुति' मध्यमः । स्तुतिर्जपोधमो भावो
    ४. अधमाधमा साधना है—'बाह्यपूजा' बाह्यपूजा धमाधमा ।।'
    सारांश यह कि बाह्यपूजा अधमाधमा
    साधना है ।
    (२)
    १. उत्तमा साधना—सहजावस्था 'उत्तमा सहजावस्था मध्यमा
    २. मध्यमा साधना—ध्यान-धारणा ध्यानधारणा । जपस्तुतिःस्याद
    ३. अधमा—शास्त्रचिन्तन धमा होमपूजाधमाधमा ।।'
    ४. अधमाधमा—लोकचिन्ता