वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
DevanagariHindipublished530 पृष्ठ
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३८४ वरिवस्यारहस्ये
(मंत्रार्थ की दिशा में विशेषक की अपेक्षा सर्वबोध का प्रतिपादन)
प्रस्तुत प्रसङ्ग (या विषय) में समस्त तात्पर्य अभीष्ट हैं किसी भी विशेषक की
आवश्यकता नहीं है, या (अर्थात्) (इस मंत्र में) एक ही शक्ति 'पुष्पवन्त' पद की
भाँति यहाँ समस्त अर्थों को द्योतित करती है ॥ १५४ ॥
- प्रकाश *
अनेकार्थतायाः प्रमाणबलायातत्वाददोषत्वम् । सर्वत्रानेकार्थस्थले ऽन्यतमस्यै-
कस्यैव बोधनार्थं प्रकरणादिज्ञानस्य कारणत्वादिकल्पनदोषः, प्रकृते तु तदभाव इत्याह
—अन्यतमेत्यादिना। अथ वा, ईश्वरेच्छाविषयीभूतबोधीयविशेष्यता यथा सूर्यचन्द्रमसोः
पर्याप्तैकैव स्वीक्रियत इति न तत्र पुष्पवन्तपदे शक्त्यनेकत्वम्, तद्वदिहाप्यस्त्वित्याह—
अथ वेति ॥ १५३-१५४ ॥ - सरोजिनी *
'एकस्य' = एक शब्द का । 'अनेकार्थ' = अनेक अर्थ, यथा—शब्दार्थ,
भावार्थ, संप्रदायार्थ, निगर्भार्थ, कौलिकार्थ, रहस्यार्थ, महत्त्वार्थ, नामार्थ, शब्दरूपार्थ,
शाक्तार्थ, सामरस्यार्थ, समस्त सगुणार्थ, महावाक्यार्थ आदि ॥
'दृष्टा' = देखे गए हैं । लोक में प्रचलित हैं । व्यवहृत है, लोगों को
परिज्ञात हैं । 'हरि' = विष्णु । बन्दर । हरा । भूरा । पीला । इन्द्र । यम ।
चन्द्रमा । कृष्ण । किरण । कोयल । इन्द्राश्व । सर्प । मयूर । सिंहराशि । शृगाल ।
बाँस । मूँगा ॥ मेढक । तोता ॥ शिव । अग्नि । घोड़ा । साठ संवत्सरों में से
एक संवत्सर विशेष का नाम ॥
'विशेषकता' = वैशिष्ट्य । भेदकता । व्यावर्तकता ॥ सामान्य से व्यक्ति को
पृथक् करने का भाव ॥ (Indices; व्यावर्तक चिन्ह) ॥ निश्चायक, निर्णायक
बिन्दु ॥ 'विशेषक' = (वि + शिष् + ण्वुल) = भेद स्पष्ट करने वाला, (पुं० नं०)
विशेष + कन = । विशेषण ॥ टीका । तिलक ॥ 'विशेषित' = वि + शिष् +
णिच् + क्त । विशेषण द्वारा पहिचाना हुआ । उत्कृष्ट, उत्तम । परिभाषित ।
जिसकी पहिचान बतायी गई हो ।
“सैन्धव”—सेंधा नमक । सिन्धु देश का घोड़ा ॥ (सिन्धु + अण = सैन्धव)
सिन्धुदेशोत्पन्न, सिन्धु नदी सम्बंधी । नदी में उत्पन्न । सामुद्रिक । सिन्धु-निवासी ।
(सैन्धव-शब्द-सिन्धु में उत्पन्न सभी वस्तुओं यथा १४ रत्न आदि—सभी वस्तुओं का
द्योतक हो सकता है ।)
'पद' = किसी भी प्रातिपदिक में जब, वाक्य में प्रयोगार्थ, सुप्या तिङ्
प्रत्यय लगा दिया जाता है तब उसे 'पद' की आख्या प्राप्त हो जाती है ।
“सुप्तिङन्तंपदम्” ॥
'अन्यतम' = वस्तुओं में से जिसके बराबर कोई अन्य वस्तु हो ही नहीं वह