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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 492, कुल 530 में से

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पृष्ठ 492

३९० वरिवस्यारहस्ये
आदि के द्वारा उद्धार किया जाना चाहिए ॥
मंत्र का उत्पत्तिस्थान—'कण्ठे च कण्ठतालुनि तालुनि दन्तेषु मूर्ध्नि
नासायाम्। स्पृष्टविवाराद्यान्तर बाह्यैर्यत्नैस्तदक्षरोत्पत्तिः ॥ १९ ॥
कण्ठ, तालु, दाँत, मूर्द्धा आदि वर्णों के उत्पत्ति स्थान हैं ।
यत्न—वर्णोच्चारण में किये गए प्रयत्न को ही यत्न कहते हैं । यत्न दो
प्रकार के होते हैं—१. बाह्य २. आन्तर ॥१
प्रथम प्रयत्न—वर्णों के स्फुट रूप से उच्चारित होने के पूर्व किया यत्न =
आभ्यन्तर
द्वितीय प्रयत्न—वर्णों के उच्चारण करने की क्रिया के पश्चात् होने वाला
प्रयत्न = बाह्य ॥२
आभ्यन्तर प्रयत्न के भेद—स्पृष्ट । ईषत्स्पृष्ट । ईषद्विवृत । विवृत । संवृत ॥
यथा—स्पर्श वर्ण = स्पृष्ट प्रयत्न ॥ अन्तस्थ वर्ण = ईषत् स्पृष्ट ॥ ऊष्म वर्ण =
ईषद्विवृत । स्वर = विवृत । ह्रस्व स्वर = संवृत । बाह्य प्रयत्न ग्यारह है—
विवार । संवार । श्वास । नाद । घोष । अघोष । अल्पप्राण । महाप्राण । उदात्त
अनुदात्त । स्वरित ॥३
'रूपम्'—१. प्रलयाग्निनिभं प्रथमं मूलाधारदनाहतं रूपाद्दित्रय ॥ २.
तस्मादाज्ञा चक्रं द्वितीयकूटं तु स्पृशति । ३. तस्माल्ललाटमध्यं तार्तीयं कोटिचन्द्राभम्
कोटिसूर्याभम् ॥ १. प्रलयाग्निनिभं २. कोटिसूर्याभ ३. कोटिचन्द्राभ ॥
'स्वरूप'— 'व्यष्टि समष्टिविभेदादस्यां चत्वारि बीजानि ।
सृष्टि स्थिति संहारा नाख्यारूपाणि भावनीयानि ॥ आदि
'विभाव्यम्'—अवस्थापंचक आदि ॥४
'अर्थो'—गायत्री के १५ अर्थ । ये अंतरङ्ग उपासकों के लिए अत्यावश्यक
है—'इमानि अंतरङ्गत्वार्द् उपासकानाम् अत्यावश्यकानि ॥'५
ऊपर जिस 'मात्राकाल' का उल्लेख हुआ है उसके विषय में नियम यह है
कि—प्रथमकूट में १० मात्रा, मध्यकूट में १० मात्रा एवं तृतीयकूट में एक लवकम
८ मात्रा—अर्थात् सब मिलाकर एक लव कम २९ मात्रा-काल जप में होना
चाहिए—"आद्येदश मध्ये ताः सार्धास्तार्तीयकूटेऽष्टौ । एकलवोना ऊनत्रिंशन्मात्रा
मनोर्र्जपे कालः ॥'६
वर्णों के स्थान को जानकर ही यत्नानुसार शब्दोच्चारण करना चाहिए—इत्येवं
वर्णानां स्थानं ज्ञात्वोच्चरेद्यत्नात् ॥ २७ ॥७
प्रस्तुत ग्रन्थ एवं श्रीविद्या के प्रसङ्ग में श्रीविद्या के निम्न बाह्याङ्ग हैं—१.
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१-५. भास्करराय—'प्रकाश'। ६-७. वरिवस्यारहस्यम्